१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् है और सब का गुरु होता है। मन्त्रराज अनुष्टुप् से ही पूजन और हवन करे। यह महाचक्र राक्षसों के डर से बचाने वाला है, यही मृत्यु से पार लगाने वाला है। गुरु से इसे यन्त्र रूप में लेकर कण्ठ, शिखा या भुजा में बांधे। जो गुरु इस मन्त्र का उपदेश दे, उसे दक्षिणा में समूची पृथिवी भी दे दी जाय तो वह न्यून है। श्रद्धा के अनुसार जितना हो सके भू-भाग दान करे, वही सर्वश्रेष्ठ दक्षिणा है ॥२॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नानुष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नार- सिंहस्य फलं नो ब्रूहि भगव इति स होवाच प्रजापतिर्थ एतं मन्त्रराज नारसिंहमानुष्टुभं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति स वायुपूतो भवति स आदित्यपूतो भवति स सोमपूतो भवति स सत्यपूतो भवति स ब्रह्मपूतो भवति स विष्णुपूतो भवति स रुद्र- पूतो भवति स देवपूतो भवति स सर्वपूतो भवति स सर्वपूतो भवति ॥ ३ देवताओं ने प्रजापति से पुनः पूछा—भगवन् ! आनुष्टुभ मन्त्रराज का फल हमें कृपापूर्वक बताइये।' प्रजापति बोले— 'इस मन्त्रराज का दैनिक जप करने वाला पुरुष अग्नि में तपा कर शुद्ध किये सुवर्ण के समान हो जाता है। वह वायु, सूर्य और चन्द्रमा द्वारा शुद्ध कर दिया जाता है। वह सत्य तथा लोक के द्वारा और ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा वेद के द्वारा शुद्ध हो जाता है ॥३॥ ॥ नृसिंहपूर्वंतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥