भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri दक्षिणामूर्त्युपनिषत ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों एक साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्मावर्ते महाभाण्डीरवटमूले महासत्राय समेता महर्षयः शौनकादयस्त ह समित्पाणयस्तत्त्वजिज्ञासवो मार्कण्डेयं चिरञ्जीवि- नमुपसमेत्य पप्रच्छुः केन त्वं चिरं जीवसि केन वाऽऽनन्दमनु- भवसीति ॥ १ ॥ परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानेनेति स होवाच ॥ २ ॥ किं तत् परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् । तत्र को देवः । के मन्त्राः । का निष्ठा । किं तज्ज्ञानसाधनम् । कः परिकरः । को बलिः कः कालः । किं तत्स्थानमिति ॥ ३ ॥ स होवाच । येन दक्षिणामुखः शिवोऽपरोक्षीकृतो भवति तत् परमरहस्यशिवतत्त्वज्ञानम् ॥ ४ ॥ यः सर्वोपरमे काले सर्वान्त्मन्युपसंहृत्य स्वात्मानन्दसुखे मोदते प्रकाशते वा स देवः ॥ ५ ॥ ब्रह्मावर्त में महाभाण्डीर नामक बरगद के नीचे बड़े भारी दीर्घ- कालीन यज्ञ करने के लिये शौनकादि महाऋषि एकत्रित हुए तथा तत्त्व-ज्ञान की जिज्ञासा से हाथों में समिधायें लेकर (कुशहस्त होकर) चिरञ्जीवी मार्कण्डेय के पास आकर पूछा—महाराज ! आप कैसे Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi