भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४०२ ]CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri[ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् चिरकाल से जीवित रह रहे हो ? तथा कैसे आप अपार आनन्द का अनुभव करते रहते हो ? । २ । तब उन्होंने उत्तर दिया कि परम गुप्त जो शिव-तत्व का ज्ञान है वही मेरे चिरजीवी होने में कारण है। २ । तब शौनकादि, ऋषि बोले—वह परम गुप्त शिवतत्व ज्ञान क्या वस्तु है ? उसका आराध्य कौन देवता है ? मन्त्र कौन से हैं ? आस्था क्या है ? उस ज्ञान के साधन कौन से हैं ? (क्या सामग्री चाहिये) क्या बलि उसमें अपेक्षित है ? क्या काल है ? उसकी प्राप्ति का स्थान कौन-सा है ? । ३ । मार्कण्डेय बोले—जिससे दक्षिणा मुख नामक शिव दृष्टिगोचर होते हैं वही परम गुप्त शिवतत्व ज्ञान है । ४ । जो सकल विश्व के समाप्ति के समय सारे चराचर को अपने अन्दर लीन करके अपने आप आत्मानन्द के सुख में प्रसन्न रहते हैं (अर्थात् आत्माराम हो जाते हैं ) तथा स्वयं प्रकाशित होते हैं वही इस तत्वज्ञान के देव हैं । ५ । अत्रैते मन्त्र रहस्यश्लोका भवन्ति अस्य श्रीमेधादक्षिणा- मूर्तिमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः । गायत्री छन्दः । देवता दक्षिणाऽऽस्यः । मन्त्रेणाङ्गन्यासः ॥ ६ ॥ ॐ आदौ नम उच्चार्य ततो भगवते पदम् । दक्षिणेति पदं पश्चान्मूर्तये पदमुद्धरेत् ॥७ अस्मच्छब्दं चतुर्थ्यन्तं मेधां प्रज्ञां पदं वदेत् । समुच्चार्य ततो वायुबीजं च्छं च ततः पठेत् ॥ अग्निजायां ततस्त्वेष चतुर्विंशाक्षरो मनुः ॥७ ध्यानम् स्फटिकरजतवर्णं मौक्तिकीमक्षमाला- ममृतकलशविद्यां ज्ञानमुद्रां कराग्रे । दधतमुरगकक्षं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं विधृतविविधभूषं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥८ मन्त्रेण न्यासः— आदौ वेदादिमुच्चार्य स्वराद्यं सविसर्गकम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi