१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०६ ] [ दक्षिणामूर्त्युपनिषत् दायिने पदमुच्चार्य मायिने नम उद्धरेत् ॥१७ आनुष्टुभो मन्त्र राजः सर्वमन्त्रोत्तमोत्तमः ॥१८ मुद्रापुस्तकवह्निनागविलसद्बाहुं प्रसन्नननं मुक्ताहारविभूषणं शशिकलाभास्वत्किरीटोज्ज्वलम् । अज्ञानापहमादिमादिमगिरामर्थं भवानीपतिं न्यग्रोधान्तनिवासिनं परगुरुं ध्यायाम्यभीष्टाप्तये ॥१९ प्रथम 'ओं नमो भगवते तुभ्यं' पुन 'वट' शब्द तब 'मूल' शब्द फिर 'वासिने' शब्द कहकर 'वागीशाय' पुनः 'महाज्ञान' एवं 'दयिने' और 'मायिने' का उच्चारण कर अन्त में नमः शब्द का उच्चारण करे । अर्थात् 'ओं नमो भागवते तुभ्यं' वट मूल वासिने वागीशाय महाज्ञानदायिने मायिने नमः' । यह आनुष्टुभ मंत्रराज है जो कि सभी श्रेष्ठ मन्त्रों में उत्तम है। १६-१७-१८ । ( ध्यान )—अभय ज्ञान मुद्रा, पुस्तक तथा भयानक सर्पों से जिनके हाथ सुशोभित हैं और जो कि प्रसन्नमुख हैं। मोतियों के हार जिनकी शोभा बढ़ा रहे हैं और चन्द्रमा की कला से चमकने वाले मुकुट से जो अधिक शोभायमान लग रहे हैं। साथ ही जो अज्ञान को नाश करने वाले हैं और जो कि आदि पुरुष हैं और वाणी के जो विषय नहीं हैं (यत्र वाचो निवर्तंको) ऐसे पार्वती के पति जो कि सबके गुरु हैं और बरगद के पेड़ के नीचे रहने वाले हैं, उनका मैं अपनी इच्छित वस्तु की प्राप्ति के लिये ध्यान करता हूँ ॥१९॥ सोऽहमिति यावदास्थितिः सा निष्ठा भवतिः ॥२० तदभेदेन मन्त्राम्रेडनं ज्ञानसाधनम् ॥२१ चित्ते तदेकतानता परिकरः ॥२२ अङ्गचेष्टार्पणं बलिः ॥२३ त्रीणि धामानि कालः ॥२४ द्वादशान्तपदं स्थानमिति ॥२५