भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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दक्षिणामूर्त्युपनिषत् [ ४०७ शरीर के नष्ट होने तक 'सोऽहं' मैं वही परब्रह्म हूँ, यही ब्रह्म- निष्ठा है ।२०। उस परब्रह्म से अभिन्न मानकर पूर्व कहे गये मनुमन्त्रों का बार-बार निरन्तर उच्चारण ही ज्ञान का साधन है । २१ । चित्त से उस परमतत्त्व में एकता लगाकर ध्यान करना ही परिकर 'उपकरण' सामग्री है। २२। अंगों की चेष्टाओं का अर्पण ही बलि है अर्थात् हाथ पाँव आदि चलाना ( भगवत्कार्य में ) ही उसकी पूजा है । २३। स्वअविद्यापद, स्थूल तथा सूक्ष्म बीजरूप तीन धाम ही काल है । २४। द्वादशांत पद अर्थात् हृदय किंवा सहस्रार (सहस्रदलकमल) ही परमात्मा की प्राप्ति का स्थान होने के कारण स्थान है। २५ । ते ह पुनः श्रद्दधानास्तं प्रत्यूचुः—कथं वाऽस्योदयः । किं स्वरूपम् । को वाऽस्योपासक इति ॥ २६ ॥ स होवाच- वैराग्यतैलसंपूर्णे भक्तिवर्तिसमन्विते । प्रबोधपूर्णपात्रे तु ज्ञप्तिदीपं विलोकयेत् ॥२७ मोहान्धकारे निः सारे उदेति स्वयमेव हि । वैराग्यमरणं कृत्वा ज्ञानं कृत्वा तु चित्रगुम् ॥२८ गाढतामिस्रसंशून्यै गूढमर्थं निवेदयेत् । मोहभानुजसंक्रान्तं विवेकाख्यं मृकण्डुजम् ॥२९ तत्त्वाविचारपाशेन बद्धं द्रुतभयातुरम् । उज्जीवयन्निजानन्दे स्वस्वरूपेण संस्थित ॥३० शेमुषी दक्षिणा प्रोक्ता सा यस्याभीक्षणे मुखम् । दक्षिणाभिमुखः प्रोक्तः शिवोऽसौ ब्रह्मवादिभिः ॥३१ सर्गादिकाले भगवान् विरञ्चिरुपास्यैनं सर्गसामर्थ्यमाप्य । तुतोष चित्ते वाञ्छितार्थांश्च लब्ध्वा सोऽस्योपासको भवति धाता ।३२।