१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०८ ] [ दक्षिणामृत्यु षपनित् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri य इमां परमरहस्यशिवतत्त्वविद्यामधीते स सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति । य एवं वेद स कैवल्यमनुभवतीत्यु- पनिषत् ॥ ३३ ॥ श्रद्धा से युक्त उन ऋषियों ने पुनः मार्कण्डेय से पूछा—इसका उदय कैसे होता है ? क्या इसका स्वरूप है ? और कौन इसका उपासक है ? । २६ (वह बोले) वैराग्यरूपी तेल से लबालब भरे हुये भक्ति रूपी बत्ती से युक्त प्रबोध के ( ज्ञान के ) पूर्व मात्र में ( बर्तन में ) ज्ञप्ति रूपी (अपने अन्दर तथा चराचर में व्याप्त ईश्वर को अपनी आत्मा मानना ) दीप का दर्शन होता है। २७। अर्थात् वैराग्य भक्ति तथा ज्ञान से ही ईश्वर दर्शन होता है ) सारहीन अपनी अज्ञता से कल्पित महान् अज्ञान रूपी अंधकार में वह दीप स्वयं ही उदित होता है। वैराग्य को अरणी बनाकर तथा अपने ज्ञान को ही मथने का डण्डा बनाकर गहन अज्ञान रूपी घने अन्धकार की समाप्ति के लिये गुप्त अर्थ को (परम तत्व को) जानना चाहिये । (अर्थात् निरन्तर वैराग्य तथा ज्ञान के परि- शीलन से ही उस परम तत्व का दर्शन सम्भव है ) तथा परमतत्त्व का विचार न करना रूपी जो पाश उससे बँधे हुए, द्वैतवाद के भय से व्याकुल एवं मोहरूपी शनि या मृत्यु के मुख में पड़े हुये विवेकरूपी मृकंडु के पुत्र (मार्कण्डेय) को ( अपने अज्ञान से ) पुनः उज्जजीवित करते हुए आत्माराम रूपी परमानन्द में अपने स्वरूप से स्थित हो जाता है । । २८--२६--३० । तथा तत्वज्ञानरूपिणी ब्रह्म प्रकाशिक बुद्धि ही जिसमें दक्षिणा है और वही जिस परमतत्व के अभीक्षण में अर्थात् साक्षात्कार में मुख अर्थात् द्वार है वह ब्रह्मवादियों द्वारा दक्षिणामुख नामक शिव Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi