१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशरभोपनिषत् ] [ ४११ बलः ॥ ४ ॥ हरि हरन्तं पादाभ्यामनुयान्ति सुरेश्वराः । माधवोः पुरुषं विष्णुं विक्रमस्व महानसि ॥ ५ ॥ कृपया भगवान्विष्णु विददार नखैः खरैः । चर्माम्बरो महावीरो वीरभद्रो बभूव ह ॥ ६ ॥ एक समय पैप्पलाद ऋषि ने ब्रह्माजी से कहा—"हे भगवन् ! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र इन तीनों में से अधिकतर ध्यान के योग्य कौन है, यह आप ही बतलाइये ? ॥ १ ॥ पितामह ब्रह्मा ने कहा—"हे पैप्पलाद ! मेरे कथन को सुनो कि जिस परमेश्वर के अङ्ग से मैं उत्पन्न हुआ हूँ वह किसी बहुत पुण्यशाली को ही प्राप्त होता है, मुख्य विष्णु, इन्द्र और सुरेन्द्र भी मोहवश उसे नहीं जान पाते ॥१॥ वह सबका प्रभु है, श्रेष्ठ है, पिता है, परमेश्वर है, वही ब्रह्मा को धारण करता है, वही वेदों का पहले निर्णय करता है वही सबका प्रभु और देवताओं का पिता है ॥२॥ वह मेरा और विष्णु का भी पिता है, उसको नमस्कार है, वही अन्तकाल में समस्त विश्व का संहार करता है ॥ ३ ॥ वही एक मात्र सबसे श्रेष्ठ, सबका नियामक और वरिष्ठ है। उसी महाबलशाली ने शरभ का घोर रूप धारण करके नृसिंह को मार दिया ॥ ४ ॥ जब रुद्र विष्णु को पैर पकड़कर ले जा रहे थे तब सब देवताओं ने उनके पीछे-पीछे जाकर उनकी प्रार्थना की "दया करके पुरुषोत्तम विष्णु का वध मत कीजिये आप महान् हैं, आपकी जय हो।" तब रुद्र ने तीक्ष्ण नखों से विष्णु को विदीर्ण किया और वे चर्माम्बर वाले रुद्र महावीर और वीरभद्र के नाम से कहे जाने लगे ॥ ५-६ ॥ स एको रुद्रो ध्येयः सर्वेषां सर्वसिद्धये । यो ब्रह्मणः पंचम- वक्त्रहन्ता तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ७ ॥ यो विस्फुलिङ्गेन ललाटजेन सर्वं जगद्भस्मसात्संकरोति । पुनश्च सृष्ट्वा पुनरप्य- रक्षदेवं स्वतन्त्रं प्रकटीकरोति ॥ तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ८ ॥ यो वामपादेन जघान कालं घोरं पपेऽथो हलाहलं दहन्तम् ।