भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४१२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ शरभोपनिषत् तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ६ ॥ यो वामपादार्चितविष्णुनेत्रस्तस्मै ददौ चक्रमतीव हृष्टः । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १० ॥ ऐसा एक भद्र ही सब सिद्धियों का दाता और सबका पूजनीय है । जिसने ब्रह्मा का पांचवां मुख नष्ट कर दिया उसको नमस्कार ॥७॥ जो अपने मस्तक के अग्नि द्वारा समस्त जगत को भस्म कर देता है और फिर से उत्पन्न करके उसका पालन भी करता है, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ ८ ॥ जिसने काल को अपने बांये पैर से मार दिया और जलते हुये हलाहल विष को पी लिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ ६ ॥ विष्णु ने जिसके वांये पैर पर अपनी आंख निकाल कर चढ़ाई और इससे संतुष्ट होकर जिसने चक्र दे दिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ १० ॥ यो दक्षयज्ञं सुरसङ्घान्विजित्य विष्णुं बबन्धोरगपाशेन वीरः । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ ११ ॥ यो लीलयैव त्रिपुरं ददाह विष्णुं कविं सोमसूर्याग्निनेत्रः । सर्वे देवाः पशुतामवापुः स्वयं तस्मात्पशुपतिर्बभूव । तस्मै रुद्रात नमो अस्तु ॥ १२ ॥ यो मत्स्यकूर्मादिवराहसिंहान्विष्णुं अवतार क्रमन्तं वामनमादि- विष्णुम् । विविकलवं पीड्यमानं सुरेशं भस्मीचकार मन्मथं यमं च । तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ १३ ॥ एवंप्रकारेण बहुधा प्रतुष्ट्वा क्षमापयामासुर्नीलकण्ठं महेश्वरम् । तापत्रयसमुद्भूतजन्ममृत्यु- जरादिभिः । नानाविधानि दुःखानि जहार परमेश्वरः ॥ १४ ॥ एवं मन्त्रैः प्रार्थ्यमान आत्मा वै सर्वदेहिनाम् । शङ्करो भगवा- नाद्यो ररक्ष सकलाः प्रजाः ॥ १५ ॥ : दक्ष के यज्ञ में सब देवताओं को पराजित कर जिसने विष्णु को भी नागपाश में बांध लिया उस महावीर रुद्र को नमस्कार है ॥ ११ ॥ जिसने लीलामात्र से त्रिपुर को दग्ध कर दिया, जिसके सूर्य, चन्द्र और अग्नि तीन नेत्र हैं, सब देवता जिसके सम्मुख पशुता ( अधीनता ) को : प्राप्त हो गये और इससे जो पशुपति कहलाया, उस रुद्र को नमस्कार Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi