भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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शरभोपनिषत् [ ४१३ है ॥ १२ ॥ जो मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन आदि विष्णु के अवतारों को भी श्रमित करता है, जिसने कामदेव और यम को भस्म कर दिया, उस रुद्र को नमस्कार है ॥ १३ ॥ देवों ने इस प्रकार विविध भाँति से स्तुति करके नीलकण्ठ महेश्वर से क्षमा प्रार्थना की, तब उस परमेश्वर ने तीनों प्रकार के तापों और जन्म, मृत्यु, जरा आदि तथा अन्य तरह-तरह के दुःखों का नाश किया ॥ १४ ॥ इस प्रकार विविध प्रकार के मन्त्रों से प्रार्थना किये जाने पर उस आदि भगवान् शंकर ने आत्मरूप से सब प्रजा की रक्षा की ॥ १५ ॥ यत्पादाम्भोरुहद्वन्द्वं मृग्यते विष्णुना सह । स्तुत्वा स्तुत्यं महेशानमवाङ्मनसगोचरम् ॥ १६ ॥ भक्त्या नम्रनतोर्विष्णोः प्रसादमकरोद्विभुः । यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कदाचनेति ॥ १७ ॥ अणोरणी- यान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् ॥१८॥ वसिष्ठ- वैयासकिवामदेवविरिञ्चिमुख्यैर्हृदि भाव्यमानः । सनत्सुजाता- दिसनातनाद्यै रीड्यो महेशो भगवानादिदेवः ॥१९॥ सत्यो नित्यः सर्वसाक्षी महेशो नित्यानन्दो निर्विकल्पो निराख्यः । अचिन्त्य- शक्तिर्भगवान्गिरीशः स्वाविद्यया कल्पितमानभूमिः ।! २० ॥ वाणी और मन से भी जो अगोचर हैं और सब प्रकार की स्तुतियों के योग्य हैं, विष्णु जिनके चरण कमलों को प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हैं ऐसे भगवान महेश्वर भक्तिपूर्वक नमस्कार करने वाले विष्णु पर प्रसन्न हुये । जिसको प्राप्त न करके वाणी मन के साथ लौट जाती है, उस ब्रह्मानन्द का ज्ञाता कभी भी भय को प्राप्त नहीं होता ॥ १६—१७ ॥ यह आत्मा छोटे से भी छोटा और बड़े से भी बड़ा है और सब प्राणियों के भीतर हृदय रूपी गुफा में निवास करता है । उस