भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 422

४१४ ] [ शरभोपनिषत् दृष्टारूप महान् ईश्वर को शोक से रहित व्यक्ति भगवान् के प्रसाद से ही देखता है ॥ १८ ॥ वसिष्ठ, शुकदेव और वामदेव जैसे ऋषि तथा ब्रह्मादि सब देवता भी जिसका सदैव ध्यान करते हैं और सनत, सनातन आदि जिनकी स्तुति करते रहते हैं, ऐसे आदि भगवान महेश्वर देव हैं ॥ १९ ॥ वे महेश्वर, सत्य, नित्य, सर्वसाक्षी, नित्यआनन्द रूप, निर्विकल्प और कथन न कर सकने योग्य हैं । उनकी शक्ति की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता, अज्ञानता से ही हम उनके स्थान आदि की कल्पना करते रहते हैं ॥ २० ॥ अतिमोहकरी माया मम विष्णोश्च सुव्रत । तस्य पादा- म्बुजध्यानाद्दुस्तरा सुतरा भवेत् ॥ २१ ॥ विष्णुर्विश्वजगद्योनिः स्वांशभूतैः स्वकैः सह । ममांशसंभवो भूत्वा पालयत्यखिलं जगत् ॥ २२ ॥ विनाशं कालतो याति ततोऽन्यत्सकलं मृषा । ॐ तस्मै महाग्रासाय महादेवाय शूलिने । महेश्वराय मृडाय तस्मै रुद्राय नमो अस्तु ॥ २३ ॥ एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकणः । त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥ २४ ॥ चतु- र्भिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां स मे विष्णुः प्रसीदत ॥ २५ ॥ हे सुव्रत ! मेरे (ब्रह्मा) और विष्णु के लिये भी उसकी माया अत्यन्त मोहग्रस्त करने वाली है। यद्यपि उसे पार कर सकना अत्यन्त कठिन है तो भी उनके चरण कमलों का ध्यान करने से उसे सुगमता पूर्वक पार किया जा सकता है ॥ २१ ॥ समस्त सृष्टि के उत्पन्न करने वाले विष्णु हैं, वे अपने अंश रूप जीवों के साथ मेरे ही अंश से होते हैं और विश्व का पालन करते हैं ॥ २२ ॥ कालक्रम से सब कुछ नष्ट हो जाता है और इसलिए यह मिथ्या है । इससे सबका महाग्रास करने वाले उस शूलधारी, महादेव, महेश्वर और कृपा करने वाले रुद्र को नमस्कार है ॥ २३ ॥ सब प्रकार की सृष्टि में विष्णु सबसे भिन्न और महान् हैं ।