भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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शरभोपनिषत् । [ ४१५ वे यद्यपि सब भूतों में व्याप्त होकर सब प्रकार के भोगों को भोगते हैं फिर भी अव्यय रहते हैं ॥ २४ ॥ जिन विष्णु भगवान को चार, चार दो और पाँच आहुतियां दी जाती हैं, वे विष्णु मुझ पर प्रसन्न हों ॥२५॥ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ हुतम् । ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥ २६ ॥ शरा जीवास्तदङ्गेषु भाति नित्यं हरिः स्वयम् । ब्रह्मैव शरभः साक्षान्मोक्षदोऽयं महामुने ॥ २७ ॥ मायावशादेव देवा मोहिता ममतादिभिः । तस्य माहात्म्यलेशांशं वक्तुं केनाप्यशक्यते ॥ २८ ॥ परात्परतरं ब्रह्म यत्परात्परो हरिः । परात्परतरो हीशस्तस्मात्तुल्योऽधिको न हि ॥ २९ ॥ एक एव शिवो नित्यस्ततोऽन्यत्सकलं मृषा । तस्मात्सर्वान्परित्यज्य ध्येयान्विष्ण्वादिकान्सुरान् ॥ ३० ॥ शिव एव सदा ध्येयः सर्व- संसारमोचकः । तस्मै महाग्रासाय महेश्वराय नमः ॥ ३१ ॥ अर्पण हवि ब्रह्म है, उसे ब्रह्म रूप कर्त्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में हवन किया जाता है, यह भी ब्रह्म ही है। इसलिए समाधिस्थ योगी के लिए ब्रह्म ही प्राप्त करने योग्य है ॥ २६ ॥ जीव ही 'शर' है जिसके अङ्ग में स्वयं भगवान नित्य प्रकाशित होते हैं । इस प्रकार ब्रह्म ही 'शरभ' है, जो साक्षात् मोक्ष के प्रदान करने वाले हैं ॥ २७ ॥ जिसकी माया से देवगण भी मोहित रहते हैं, उसकी महिमा एक अल्प अंश भी कोई नहीं कह सकता ॥ २८ ॥ पर से परब्रह्म है, उससे पर विष्णु है, उससे भी पर से पर ईश हैं । उनसे बड़ा या उनके बराबर कोई भी नहीं है ॥ २९ ॥ एक मात्र शिव ही नित्य है और अन्य सब मिथ्या है इसलिये विष्णु आदि समस्त देवों का त्याग कर संसार-बन्धन से छुड़ाने वाले एक मात्र उनका ही ध्यान करना चाहिए । सबका संहार करने वाले उस महेश को नमस्कार है ॥ ३०–३१ ॥ पैप्पलादं महाशास्त्रं न देयं यस्य कस्यचित् । नास्तिकाय