१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें४१६ ] [ शरभोपनिषत् कृतघ्नाय दुर्वृत्ताय दुरात्मने ॥ ३२॥ दाम्भिकाय नृशंस्याय शठायानृतभाषिणे । सुव्रताय सुभक्ताय सुवृत्ताय सुशीलिने ॥३३॥ गुरुभक्ताय दान्ताय शान्ताय ऋजुचेतसे । शिवभक्ताय दातव्यं ब्रह्मकर्मोक्तधीमते ॥ ३४ ॥ स्वभक्ताय दातव्यमकृतघ्नाय सुव्रत । न दातव्यं सदा गोप्यं यत्नेनैव द्विजोत्तम ॥ ३५ ॥ एतत्पैप्पलादं महाशास्त्रं योऽधीते श्रावयेद्द्विजः स जन्ममरणेभ्यो मुक्तो भवति । यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति । गर्भवासाद्वि- मुक्तो भवति । सुरापानात्पूतो भवति । स्वर्णस्तेयात्पूतो भवति । ब्रह्महत्यात्पूतो भवति । गुरुतल्पगमनात्पूतो भवति । स सर्वान्वे- दानधीतो भवति । स सर्वान्देवान्ध्यातो भवति । स समस्तमहा- पातकोपपातकात्पूतो भवति । तस्मादविमुक्तमाश्रितो भवति । स सततं शिवप्रियो भवति । स शिव सायुज्यमेति । न स पुनरा वर्तते न स पुनरावर्तते । इत्याह भगवान् ब्रह्मोत्युपनिषत् । इस पैप्पलाद ऋषि को प्राप्त हुये महाशास्त्र को चाहे जिस किसी को न देना चाहिये । नास्तिक, कृतघ्न, दुर्वृत्त, दुरात्मा, दाम्भिक, नृशंस, शठ, असत्यभाषी को इसे कदापि न दे । जो सुव्रतधारी, सच्चभक्त, शुद्धवृत्तिवाला, सुशील, गुरुभक्त, शम दम वाला, धर्म बुद्धिवाला, शिव- भक्त ब्रह्म कर्म में चित्त लगाने वाला हो और अपने में भक्ति रखता हो कृतघ्न न हो उसी को इसे देना चाहिए। यदि ऐसा न मिले तो किसी को न देकर इसकी रक्षा करनी चाहिए ॥ ३२—३५ ॥ पैप्पलाद के इस महा- शास्त्र को जो स्वयं पढ़ता है तथा अन्य ब्राह्मणों को सुनाता है, वह जन्म- मरण से मुक्त हो जाता है। जो इसे जानता है वह अमृतत्व को प्राप्त होता है, गर्भवास से छुटकारा पा जाता है। सुरापान, स्वर्ण की चोरी ब्रह्महत्या गुरुस्त्री गमन जैसे महा पापों से भी वह छूट जाता है । वह सब वेदों का अध्ययन करने वाला हो जाता है। उसे सब देवों के ध्यान