१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरुद्रोपनिषत् [ ४१६ ] मटमैजी धुएँ के समान तीन तरह की होती है । विरक्त तपस्वियों के लिए शुद्ध गृहस्थियों के लिये स्वच्छ भस्म ठीक हुआ करती है । तपस्वियों को सभी भस्म करनी चाहिये अथवा शिवभक्ति से युक्त जिस भस्म में शिवभक्ति का ज्ञान—भावना कर लिया जाय उसे धारण करना चाहिए, वही देवताओं द्वारा भी धारण करने योग्य है । ॐ अग्निरिति भस्म । वायुरिति भस्म । स्थलमिति भस्म । जलमिति भस्म । व्योमेति भस्म । इत्याद्युपनिषत्कारं- णात् तत् कार्यम् । अन्यत्र "विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोहस्त उत विश्वस्पात् । सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्रै- र्द्यावापृथिवो जनयन् देव एकः ।" तस्मात्प्राणलिङ्गी शिवः । शिव एव प्राणलिङ्गी । जटाभस्मधारोऽपि प्राणलिङ्गो हि श्रेष्ठः । प्राणलिङ्गी शिवरूपः । शिवरूपः प्राणलिङ्गी । जङ्गम- रूपः शिवः । शिव एव जङ्गमरूपः । प्राणलिङ्गिनां शुद्ध- सिद्धिर्न भवति । प्राणलिंगिनां जङ्गमपूज्यानां पूज्यतपस्वि- नामधिकश्चण्डालोऽपि प्राणलिङ्गी । तस्मात्प्राणलिंगी विशेष इत्याह । य एवं वेद स शिवः । रुद्र पव रुद्रः प्राणलिङ्गी नान्यो भवति । अग्नि, वायु, जल, स्थल, बाकाश सभी भस्ममय हैं ऐसा समझ कर इसे धारण करना चाहिये । वह ईश्वर अन्यत्र 'चारों तरफ आँख वाला, चारों तरफ मुँ ह वाला, चारों ओर हाथ वाला, चारों ओर पैर वाला' बतलाया गया है । वह एक मात्र देव पृथ्वी आकाश को हाथों द्वारा उत्पन्न करता है । वह सभी द्वारा प्रणाम करने योग्य है । सभी ( जल, थल, आकाशचारी) उसे प्रणाम करते हैं । अतः प्राणलिङ्गी ही शिव है । शिव ही प्राणलिङ्गी है । जटा तथा भस्म को धारण करने वाला प्राणलिङ्ग श्रेष्ठ है । प्राणलिङ्गी शिवरूप तथा शिव रूप प्राणलिङ्गी है । जङ्गम रूप शिव तथा शिव ही जङ्गमस्वरूप है । प्राण