१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरुड्रोपनिषत विश्वमयो ब्राह्मणः शिवं व्रजति । ब्राह्मणः पञ्चाक्षरमनु- भवति । ब्राह्मणः शिवपूजारताः । शिवभक्तिविहीनश्चेत् स चण्डालं उपचाण्डालः । चतुर्वेदज्ञोऽपि शिवभक्त्यान्तर्भवतीति स एव ब्राह्मणः । अधमश्चाण्डालोऽपि शिवभक्तोऽपि ब्राह्मण- च्छ्रेष्ठतरः । ब्राह्मणस्त्रिपुण्ड्रधृतः । अत एव ब्राह्मणः । शिवभक्तेरेव ब्राह्मणः । शिवलिङ्गार्चनयुतश्चाण्डालोऽपि स एव ब्राह्मणाधिको वति । अग्निहोत्रभसिताच्छिवभवतचाण्डालहस्त- विभूतिः शुद्धा । कपिशा वा श्वेतजापि धूम्रवर्णा वा । विरक्ता- नां तपस्विनां शुद्धा । गृहस्थानां निर्मलविभूतिः । तपस्विभिः सर्वभस्म धार्यम् । यद्वा शिवभक्तिसंपुष्टं सदापि तद्भसितं देवताधार्यम् । विश्वमय ब्राह्मण शिव के पास जाता है । वह पञ्चाक्षर का अनुभव करता है (नमः शिवाय का) ब्राह्मण वही है जो शिव की पूजा में लगा रहे । यदि वह शिव भक्ति से रहित होगा तो वह चाण्डाल अथवा उपचाण्डाल समझा जायेगा । चारों वेदों का ज्ञाता शिवभक्ति से अन्त- र्मुखी प्रवृत्ति वाला हो जाता है तथा वही प्रस्तुततः ब्राह्मण है । नीच चाण्डाल भी शिवभक्ति से युक्त होने पर ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ होता है । ब्राह्मण त्रिपुण्ड (तीन रेखा वाला तिलक) धारण करने वाला होना चाहिये । इसी में उसका ब्राह्मणत्व है । शिव भक्ति से ही वह ब्राह्मण कहलायेगा । शिवलिङ्ग की पूजा करने वाला चाण्डाल भी ब्राह्मण से अधिक श्रेष्ठ है । यज्ञ की भस्म से भी शिवभक्त चाण्डाल के हाथ की भस्म (राख) शुद्ध होती है । यह भस्म कुछ ताम्रवर्ण, सफेद, अथवा