भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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कालाग्निरुद्रोपनिषत् ] [ ४२३ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ॐ किसी समय सनत्कुमार ने भगवान् ने कालाग्निरुद्रा से पूछा- “हे भगवन् ! त्रिपुण्ड की विधि तत्व सहित मुझे समझाइये कि वह क्या है, उसका स्थान कौन-सा है, उसका प्रमाण (आकार) कितना है, कितनी रेखाएँ हैं, कौन-सा मन्त्र है, उसकी शक्ति क्या है, कौन देवता है, कौन कर्ता है और उसका फल क्या होता है ?” यह सुनकर कालाग्नि रुद्र कहने लगे—त्रिपुण्ड का द्रव्य अग्निहोत्र की भस्म ही है, इस भस्म को, ‘सद्यो जातादि' पांच मन्त्र पढ़कर ग्रहण करना चाहिये—अर्थात् 'अग्निरिति भस्म, वायुरिति भस्म, जलामिति भस्म, स्थलमिति भस्म' व्योमेति भस्म' इस मन्त्र से अभिमन्त्रित करे, 'मान-स्तोक' मन्त्र से अँगुली पर ले और 'मा नो महान्' मन्त्र से जल लेकर 'त्रियायुष' इस मन्त्र से शिर ललाट, वक्ष और कन्धे पर और त्रियायुष तथा त्र्यंबक मन्त्र से तीन रेखाएँ करना । इसका नाम शाम्भव व्रत कहा गया है। इस व्रत का कथन वेदवेत्ताओं ने सर्व देवताओं में किया है । जो मुमुक्ष यह इच्छा रखते हैं कि उनको पुन- र्जन्म ग्रहण न करना पड़े वे इसे धारण करें ॥ १--३ ॥ अथ सनत्कुमारः प्रमाणस्य पप्रच्छ त्रिपुण्ड्राधारणस्य ।४। त्रिधा रेखा आललाटादाचक्षुषोरामूर्ध्नोराभ्रुवोर्मध्यतश्च ।५। याऽस्य प्रथमा रेखा सा गार्हपत्यश्चाकारो रजः स्वात्मा क्रियाशक्तिर्ऋग्वेदः प्रातः सवनं महेश्वरो देवतेति ।६। याऽस्य द्वितीया रेखा सा दक्षिणाग्निरुकारः सत्त्वमन्तरात्मा केच्छाशक्तिर्यजुर्वेदो माध्यंदिनं सवनं सदाशिवो देवतेति ।७। याऽस्य तृतीया रेखा साऽऽहवनीयो मकार स्तमः परमात्मा ज्ञानशक्तिः सामवेदस्तृतीयसवनं महादेवो देवतेति ।८। त्रिपुण्ड्रविधिं भस्मना करोति यो विद्वान् ब्रह्मचारी गृही वानप्रस्थो यतिर्वा स महापातकोपपातकेभ्यः पूतो भवति स सर्वेषु Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

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