१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 432, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें४२४ ] [ कालाग्निरुद्रोपनिषत् तीर्थेषु स्नातो भवति स सर्वान् वेदानधीतो भवति स सर्वान् देवान् ज्ञातो भवति स सततं सकलरुद्रमन्त्रजापी भवति स सकलभोगान् भुङ्क्ते देहं त्यक्त्वा शिवसायुज्यमेति न स पुनरावर्तते न स पुनरावर्तत इत्याह भगवान् कालाग्निरुद्रः ।६। यस्त्वेतद्ब्राह्मधीते सोऽप्येवमेव भवतीत्यों सत्यमित्युपनिषत् ।१०। इतना सुनकर सनत्कुमार ने प्रश्न किया कि त्रिपुण्ड की तीन रेखायें करने का क्या कारण है ? उत्तर मिला कि 'तीन रेखाओं में से प्रथम रेखा तो गार्हपत्य, अग्निरूप 'अ' कार रूप, रजोगुणरूप, भूलोक रूप, स्वात्मकरूप, क्रियाशक्तिरूप. ऋग्वेद रूप, प्रातः सवनरूप और महेश्वर देव के रूप की है । दूसरी रेखा दक्षिणाग्निरूप, 'उ'कार रूप, स्वत्वरूप, अन्तरिक्ष रूप, अन्तरात्मारूप, इच्छाशक्तिरूप, यजुर्वेदरूप, माध्यंदिन सवनरूप और सदाशिव के रूप की है। तीसरी रेखा आहवनीयरूप, 'म'काररूप, तमरूप, द्यौ लोकरूप, परमात्मारूप, ज्ञानशक्ति रूप, सामवेद रूप तृतीय सवनरूप और महादेवरूप की है । इस प्रकार की त्रिपुण्ड की विधि से जो कोई ब्रह्मचारी गृहस्थ, वनप्रस्थी अथवा संन्यासी भस्म को धारण करता है तो वह महापातकों और उपपातकों से छूट जाता है ! वह सब तीर्थों में स्नान करने के समान पवित्र हो जाता है, उसको समस्त वेदों का अध्ययन हो जाता है । सब देवताओं का वह ज्ञाता हो जाता है और सब रुद्र मन्त्रों के जाप के फल को प्राप्त करने वाला होता है । वह सब प्रकार के भोगों को भोगकर शिवलोक को प्राप्त होता है । वह फिर जन्म नहीं लेता । इस प्रकार भगवान कालाग्नि रुद्र ने कहा । जो इसका अध्ययन करता है वह भी उसी के समान हो जाता है ऐसा यह उपनिषद् है ॥४-१०॥ ॥ कालाग्निरुद्रोपनिषत् समाप्त ॥