१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६० ] गायत्री रहस्योपनिषत् इक्कीसवां रुद्र दैवत्य, बाईसवां कुवेर दैवत्य, तेईसवां अश्विनी कुमार दैवत्य तथा चोबीसवां अक्षर ब्रह्माधिदैवत्य है । पहले अक्षर का ऋषि वशिष्ठ, दूसरे का भारद्वाज, तीसरे का गर्ग, चौथे का उपमन्यु, पांचवें का भृगु ( भार्गव ), छठे का शांडिल्य, सातवें का लोहित, आठवें का विष्णु, नौवें का शातातप, दसवें का सनत्कुमार, ग्यारहवें का वेद व्यास, बारहवें का शुकदेव, तेरहवें का पाराशर्य, चौदहवें का पौंड्रकमं, पन्द्रहवें का क्रतु, सोलहवें का दक्ष, सत्रहवें का कश्यप, अठारहवें का अत्रि, उन्नीसवें का अगस्त्य, बीसवें का उद्दालक, इक्कीसवें का आङ्गिरस, बाईसवें का नामिकेतु, तेईसवें का मुद्गल, चौबीसवें का अङ्गिरागोत्रज विश्वामित्र ये क्रमशः ऋषि हैं । ( अर्थात् गायत्री के जो चौबीस अक्षर उनके दृष्टा ये चौबीस ऋषि हैं । ) गायत्रीत्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्पङ्क्तिर्बृहत्युष्णिगदितिरिति त्रिरावृत्तेन छन्दांसि प्रतिपाद्यन्ते । प्रह्लादिनी प्रज्ञा विश्वभद्रा विलासिनी प्रभा शान्ता मा कान्तिः स्पर्शा दुर्गा सरस्वती विरूपा विशालाक्षी शालिनी व्यापिनी विमला तमोऽपहारिणी सूक्ष्मा- वयवा पद्मालया विरजा विश्वरूपा भद्रा कृपा सर्वतोमुखीति चतुर्विंशतिशक्तयो निगद्यन्ते । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशगन्धरस- रूपस्पर्शशब्दवाक्यानि पादपायूपस्थत्वक्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाघ्राण- मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तज्ञानानीति प्रत्यक्षराणां तत्वानि प्रतीयन्ते । चम्पकातसीकुंमपिङ्गलेन्द्रनीलाग्निप्रभोद्यत्सूर्यविद्युत्तारकसरोज- गौरमरकतशुकलकुन्देन्दुशङ्खपाण्डुनेत्रनीलोत्पलचन्दनागुरुकस्तूरी- गोरोचनघनसारसन्निभम् प्रत्यक्षरमनुस्मृत्य समस्तपातकोपपातक- महापातकागम्यागमनगोहत्याब्रह्महत्याभ्रूणहत्या वीरहत्यापुरुष- हत्याऽऽजन्मकृतहत्यास्त्रीहत्यागुरुहत्यापितृहत्याप्राणहत्याचराचर- हत्याऽऽभक्ष्यभक्षणप्रतिग्रहस्वकर्मविच्छेदनस्वाम्यतिहीनकर्मकरण-- परधनापहरणशूद्रान्नभोजनशत्रुमारणचण्डालीगमनादिसमस्तपाप- हरणार्थम् संस्मरेत् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi