१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंCC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४६१ गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती, उष्णिक् ये त्रिरावृत ( तीन आवृत्ति युक्त ) छन्द गिनाये जाते हैं । इसकी चौबीस शक्तियाँ इस प्रकार हैं—प्रह्लादिनी, प्रजा, विश्वभद्र, विलासिनी प्रभा, शान्ता, मा, कान्ति, स्पर्धा, दुर्गा, सरस्वती, विरूपा, विशालाक्षी, शालिनी, व्यापिनी, विमला, तमोऽपहारिणी, सूक्ष्मा- वयवा, पद्मलया, विरजा, विश्वरूपा, भद्रा, कृपा तथा सर्वतोमुखी । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, वाक्य, पैर, मल मूत्रेन्द्रियां, त्वचा, आंख, कान, जीभ, नाक, मन, बुद्धि, अहङ्कार, चित्त तथा ज्ञान ये गायत्री के प्रत्येक अक्षर के तत्व हैं । चम्पा, अतसी, ( एक नीला फूल ) कुंकुम, पिंगल, इन्द्र, नील, अग्निप्रभा, उद्यत्सूर्य, विद्युत्तारक, सरोज, गौर मरकत, शुक्ल, कुन्द, इन्दु, शङ्ख, पांडु नेत्र नील कमल चन्दन अगुरु, कस्तूरी, गोरोचना, कपूर के समान इन प्रत्येक अक्षरों का आश्रय सभी पाप उपपातक, महापातक, अगम्यागमन ( जिनसे योनि सम्बन्ध नहीं होना चाहिये उनसे योनि सम्बन्ध करना आदि ), गोहत्या, ब्रह्म हत्या, भ्रूण ( गर्भपात ) हत्या, वीर हत्या, पुरुष हत्या, सारे जन्मों में की हुई हत्यायें, स्त्री हत्या, गुरु हत्या, पितृ हत्या, आत्मघात, चराचर जीवों की हत्या, जो खाने लायक नहीं उन्हें खाने से होने वाली हत्या, दान व अपने कर्म का त्याग, स्वामी की सेवा से पराङ्मुख कर्म करने वाला. दूसरे के धन को चुराने से होने वाले पाप, शूद्र के अन्न को खाने, शत्रु घात, चाण्डाली से योनि सम्बन्ध रखना आदि सारे पापों के हरण के लिए याद करना चाहिये । मूर्धा ब्रह्मा शिखान्तो विष्णुर्ललाटं रुद्रश्चक्षुषी चन्द्रादित्यौ कर्णौ शुक्रबृहस्पती नासापुटे अश्विनौ दन्तोष्ठावुभे सन्ध्ये मुखं मरुतः स्तनौ वस्वादयौ हृदयं पर्जन्यं उदरमाकाशो नाभिरग्निः कटिरिन्द्राग्नी जघनं प्राजापत्यमूरू कैलासम्पूलं जानुनी विश्वेदेवौ