१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 470, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंCC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ४६२ ] . : [ गायत्री रहस्योपनिषत् जङ्घे शिशिरः गुल्फानि पृथिवीवनस्पत्यादीनि नखानि महती अस्थीनि नवग्रहा असृक्के तुर्मासमृतुसन्धयः कालद्वमास्फालनं संवत्सरोनिमेषोऽहोरात्र मिति वाग्देवीं गायत्रीं शरणमह प्रपद्ये । य इदं गायत्रीरहस्यमधीते तेन ऋतसहस्रभिष्ट भवति । य इदं गायत्रीरहस्यमधीते दिवसकृत पापं नाशयति । प्रातर्मध्या- ह्नयोः षण्मासकृतानि पापानि नाशयति । सायं प्रातधीयानो जन्मकृतं पापं नाशयति । य इदं गायत्रीरहस्य ब्राह्मणः पठेत् तेन गायत्र्याः षष्टिसहस्रलक्षानि जप्तानि भवन्ति । सर्वान् वेदान- धीतो भवति । सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति । अपेयपानात् पूतो भवति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति । वृषलीगमनात् पूतो भवति । अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति । षङ्क्तिषु सहस्रपानात् पूतो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति । इत्याह भगवान् ब्रह्मा । मैं ऐसी वाणी की अधिष्ठात्री देवी गायत्री का आश्रय लेता हूँ कि शिर ब्रह्ममय, शिखान्त भाग विष्णु, ललाट ( मस्तक) रुद्र, आँखें सूर्य तथा चन्द्रमा कान, शुक्राचार्य तथा बृहस्पति नाक के रन्ध्र अश्विनी- कुमार दाँतों के होठ दोनों संध्यायें मुख मरुत् ( वायु ) स्तन वसु आदि, हृदय बादल, पेट आकाश, नाभि अग्नि, कमर इन्द्र तथा अग्नि जाँघ प्राजापत्य ऊरुद्वय कैलाश के मूलस्थल, घुटने विश्वेदेव, जाङ्घायें शिशिर, गुल्फ ( पृथ्वी की वनस्पति आदि ) नख महान् तत्व हड्डियाँ नवग्रह, अन्तड़ियाँ केतु, मांस ऋतु सन्धियाँ, दोनों कालों का ( गमन ) बोधक, वर्ष तथा निमेष दिन एव रात हैं । जो इस गायत्री का अध्ययन करता है उसने तो मानो हजारों यज्ञ कर लिए । जो इस गायत्री रहस्य को पढ़ाता है वह दिन में किए पापों को नष्ट कर देता है । जो सुबह एवं मध्याह्न में इसे पढ़ता है, वह अपने छः महीने के पापों से मुक्त हो जाता है । जो प्रतिदिन प्रातः सायं इसका अध्ययन