भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४६८ ] [ सावित्र्युपनिषत् विद्याओं के देवताओं को सदैव अनुभव करता हूं जो सूर्य के समान चमकते हुए शरीर वाले, प्रणव स्वरूप, किरणात्मक, वेदों के साररूप, पापों को समाप्त करने में दक्ष, सब तरह की सञ्जीवनी शक्तियों से अधिष्ठित हैं और जिनके हाथ अमृत से भरे हुए हैं। बलि और अतिबलि दोनों विद्याओं के देवताओं का मन्त्र इस प्रकार है:-- ॐ ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धि- प्रदे तत्सवतुर्वरात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्य वरदात्मिके अतिबले सर्व- दयामूर्ते बले सपंक्षुत्भ्रमोपनाशिनि धीमहिधियो या नो जाते ऽप्रचुर्य या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहा । इस तरह इन विद्याओं को जानने वाला धन्य हो जाता है। वह सावित्री देवी के लोक में पहुंचने की सामर्थ्य रखता है । यह उपनिषद् है ॥ १४ ॥ ॥ सावित्र्युपनिषद् समाप्त ॥