भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 475

सावित्र्युपनिषत् ] [ ४६७ इस सावित्री देवी को जो स्त्री और पुरुष गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए समझते हैं वे मृत्यु से छूट जाते हैं अर्थात् पुनः जन्म नहीं लेते ॥ १०–१३ ॥ बलातिबलयोर्विराट् पुरुष ऋषिः । गायत्री छन्द । गायत्री देवता । अकारोकारमकारा बीजाद्याः । क्षुधाऽऽदिनिरसने विनि- योगः । क्लामित्यादि षडङ्गम् । ध्यानम्— अमृतकरतलाग्रौ सर्वसंजीवनाढ्या- वघहरणसुदक्षो वेदसारे मयूखे । प्रणवमयविकारौ भास्कराकारदेहौ सततमनुभवेऽहं तौ बलातिबलान्तौ ॥ ओ३म् ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विधपुरु- षार्थसिद्धिप्रदे तत्सवितुर्व्वरदात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्त वर- दात्मिके अतिबले सर्वदयामूर्ते बले सर्वक्षुच्छ्रमोपनाशिनी धीमहि धियो यो नजर्ति प्रचुर्या या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहाः ॥ १४ ॥ एवं विद्वान् कृतकृत्यो भवति सावित्र्या एव सलोकतां जयतीत्युपनिषत् ॥ १५ ॥ बलि अतिबलि नाम की दो विद्याओं के ऋषि विराट पुरुष हैं और उनका छन्द और देवता गायत्री हैं । उसका 'अ'कार बीज है और 'उ'कार शक्ति । उनका 'म'कार कीलक है । भूख की निवृत्ति के लिए इसका विनियोग है । क्लीं के माध्यम से इनका षडङ्गन्यास करना चाहिए । ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लीं शिखायै वषट्, ॐ क्लीं कवचाय हुम, ॐ क्लीं नेत्रयाय वौषट्, ॐ क्लीं अस्त्राय फट् ।' अब ध्यान का वर्णन किया जाता है । मैं उन बला अतिबला

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३) · पृष्ठ 475, कुल 572 में से · BharatKosha