भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४७२ ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् श्रीं पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टुं धिया वसुः ॥१४ चोदयित्रीति मन्त्रस्य—मधुच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । ब्लूमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ १५.॥ ध्यान इस प्रकार करना चाहिए—'कल्याण प्रदायिनी, हिम, कपूर, मुक्ता अथवा चन्द्रप्रभा के समान शुभ्र कान्तिवती, सुवर्ण के समान पीले चम्पक पुष्पों की माला से अलंकृत, उन्नत सुपुष्ट वक्ष सहित सुन्दर अंगवाली वागेश्वरी को मन और वाणी द्वारा विभूति की सिद्धि के निमित्त नमस्कार करता हूँ ।' 'ॐ प्रभो देवी' मन्त्र के ऋषि भरद्वाज, छन्द गायत्री और देवता सरस्वतीजी हैं । ॐ नमः' बीज, शक्ति तो है ही, साथ ही कीलक भी हैं । अभीष्ट कार्य की सिद्धि के निमित्त इसका विनियोग और मंत्र के द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है । 'जिस सरस्वती का स्वरूप वेदांत का सारभूत ब्रह्मतत्व ही है और जो विभिन्न नाम रूपों में प्रकट हैं, वे सरस्वती मेरी रक्षिका हों ।' दान से सुशोभित होने वाली, स्तोताओं की रक्षिका एवं अन्नवती भगवती सरस्वती हम साधकों को अन्न से परिपूर्ण करें । 'आ नो दिवा०' इस मंत्र के ऋषि अत्रि, छन्द त्रिष्टुभ् और देवता सरस्वती हैं । 'ह्रीं बीज, शक्ति और कीलक है । इच्छित कार्य की सिद्धि के लिए इसका विनियोग तथा इसी मन्त्र द्वारा न्यास किया जाता है । 'वेदों और उनके अङ्ग-उपांगों में जिन एक देव की स्तुति की जाती है तथा जो परमब्रह्म की अद्वैत शक्ति हैं, वे भगवती सरस्वती हमारी रक्षिका हों ॥ ५—१० ॥