भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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सरस्वतीरहस्योपनिषत् [ ४७३ हमारे द्वारा उपासना के योग्य देवी सरस्वती ज्योतिर्मान् सुलोक से नीचे पर्वताकार मेघों के मध्य होती हुई हमारे यज्ञ में पधारें। वे देवी हमारे स्तोत्र से प्रसन्न होकर स्वेच्छा से हमारे सुख उत्पन्न करने वाले स्तोत्रों को श्रवण करें ॥ २ ॥ 'पावकानः' इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छदा, छन्द गायत्री, देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक 'श्रीं' है। इसका विनियोग कामना सिद्धि के निमित्त है तथा इसी मन्त्र द्वारा अंगन्यास करने का विधान है। 'जो वर्ण, पद, वाक्य में अर्थों सहित सर्वत्र व्याप्त है, जो आदि अन्त से परे एवं अनन्त रूप वाली हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करने वाली हों।' जो देवी सरस्वती सबको पवित्र करती हैं, जो अन्न और कर्म द्वारा प्राप्त होने वाले धन् के प्राप्त कराने में कारणरूपिणी हैं, वे देवी हमारे यज्ञ में आने की इच्छा करें ॥ ३ ॥ 'चोदयित्री०' इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छान्दा, छन्द गायत्री देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक 'ब्लूं' तथा कार्य पूर्ति के लिए इसका विनियोग एवं मन्त्र द्वारा ही अ ंगन्यास किया जाता है ॥११-१५॥ अध्यात्ममधिदैवं च देवानां सम्यगीश्वर । प्रत्यगास्ते वदंती या सा मां पातु सरस्वती ॥१६ ब्लूं चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् । यज्ञं दधे सरस्वती ॥१७ महो अर्णोति मन्त्रस्य - मधुमच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । सौरिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ १८ ॥ अन्तर्याम्यात्मना विश्वं त्रैलोक्यं या नियच्छति ।