१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 482, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें४७४ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् रुद्रादित्यादिरूपस्था सा मां पातु सरस्वती ॥१९॥ सौः महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना । धियो विश्वा विराजति ॥२०॥ ‘ओ सरस्वती देवताओं की प्रेरणात्मिका शक्ति, अधिदैवरूपिणी एवं हमारे भीतर वाणी रूप में प्रतिष्ठित है, वे भगवती मेरी रक्षिका हों।’ ‘जो भगवती सत्य एवं प्रिय वाणी बोलने की प्रेरणा देती हैं तथा श्रेष्ठ बुद्धि वाले कर्मशील पुरुषों को उनके कर्त्तव्य का ज्ञान कराती हैं, उन्हीं देवी सरस्वती ने हमारे इस यज्ञ को धारण किया है। ‘महो अर्णः; इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छन्दा, छन्द गायत्री, और देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक ‘सौः’ है। इसमें मन्त्र के द्वारा ही न्यास किया जाता है। ‘जो सरस्वती अन्तर्यामी रूपसे लोकत्रय का नियंत्रण करने वाली हैं तथा जो रुद्र-आदित्य आदि अनेक देवताओं के रूप में अवस्थित हैं, वे हमारी रक्षिका हों। ‘नदी रूप में आविर्भूत सरस्वती अपने प्रवाह रूप कर्म के द्वारा अपने में निहित अगाध जल राशि का परिचय देती हैं। वे ही सरस्वती सब प्रकार की कर्त्तव्यात्मक बुद्धि का विकास करती हैं ॥१६-२०॥ चत्वारि वागिति मन्त्रस्य — उचथ्यपुत्र ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः सरस्वती देवता । ऐमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ २१ ॥ या प्रत्यग्दृष्टिभिर्जीवैर्व्यज्यमानाऽनुभूयते । व्यापिनी ज्ञप्तिरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥२२ ऐं चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi