भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 483, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 483

[Header] सरस्वतीरहस्योपनिषत् [ ४७५

गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥२३ यद्वाग्वदन्तीति मन्त्रस्य- भार्गव ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । क्लीमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ २४ ॥ नामजात्यादिभिर्भेदैरष्टधा या विकल्पिता । निर्विकल्पात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती ॥२५ क्लीं यद्वाग्वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवानां निषसाद मंद्रा । चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्याः परमं जगाम् ॥२६ 'चत्वारि वाक्०' ऋषि उचथ्य-पुत्र दीर्घतमा, छन्द त्रिष्टुप्, देवता सरस्वती, बीज, शक्ति, कीलक 'ऐं'। मन्त्र द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है । जो सरस्वतीदेवी अन्तर्दृग् वाले जीवों के समक्ष विभिन्न रूपों में प्रकट होती तथा जो ज्ञप्ति रूपसे व्याप्त हैं, वे सरस्वती मेरी रक्षिका बनें । वाणी, परा पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चार पदों वाली है। इन पदों को ज्ञानी जन भले प्रकार जानते हैं । इनमें से प्रथम तीन तो हृदयगह्वर में स्थित होने से प्रकट नहीं होती । परन्तु वैखरी ही मनुष्यों के बोलने में प्रयुक्त होती है ॥ ५ ॥ 'यद्वाग्वदन्ति०' ऋषि भार्गव, छन्द त्रिष्टुप्, देवता सरस्वती है । बीज, शक्ति कीलक 'क्लीं' है। मन्त्र द्वारा ही न्यास होता है। 'जो देवी सरस्वती नाम-रूप के द्वारा अष्टधा बनी हुई तथा निर्विकल्प रूप में भी प्रकट हैं, वे भगवती मेरी रक्षा करने वाली हों।' दिव्य भावों को को प्रकट करने वाली और देवताओं को आनन्दित करने वाली, अज्ञानियों को ज्ञान प्रदान करती हुई यज्ञ में विराजमान