भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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सरस्वतीरहस्योपनिषद् ] [ ४७७ नामरूपात्मकं सर्वं यस्यामावेश्यतां पुनः । ध्यायन्ति ब्रह्मरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥३४ ऐं अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥३५ जो प्रकाशमती वैखरी वाणी प्राण रूप से देवताओं द्वारा उत्पन्न हुई है, उस वाणी का अनेक प्रकार के देहधारी उच्चारण करते हैं । कामधेनु के समान सुख देने वाली तथा अन्न-बल प्रदायिनी वाणी रूपिणी देवी श्रेष्ठ स्तुतियों से प्रसन्न होती हुई हमारे समीप प्रकट हों । ‘उत त्व०’ ऋषि वृहस्पति, छन्द त्रिष्टुप, देवता सरस्वती । बीज शक्ति और कीलक ‘सं’ । मन्त्र द्वारा ही न्यास करना चाहिए । ‘जिन सरस्वती को ब्रह्मविद्या रूप से जान लेने पर योगीराज सभी बन्धनों को काट डालते हैं, जिससे पूर्ण मार्ग द्वारा उन्हें परमपद की प्राप्ति होती है, वे देवी मेरी रक्षा करने वाली हों ।’ वाणी को देखकर भी कुछ लोग उसे नहीं देखते, सुनकर भी नहीं सुनते । परन्तु कुछ लोग तो ऐसे भाग्यशाली हैं जिनके सामने जैसे पतिक्रामा स्त्री अपने पति के समक्ष अनावृत्त रूप में उपस्थित होती है, वैसे ही ये वाग्देवी अपने स्वरूप को प्रकट कर देती हैं । ‘अम्बित मे’ ऋषि गृत्समद, छन्द अनुष्टुप् देवता, सरस्वती, बीज, शक्ति कीलक ‘ऐं’। मन्त्र द्वारा न्यास करें । जिन सरस्वती देवी में ब्रह्मतत्ववेत्ताजन नाम-रूप वाले सम्पूर्ण प्रपञ्च को आविष्ट करते हुए उनका ध्यान करते हैं, वे देवी मेरी रक्षिका हों । हे सरस्वते ! तुम देवियों में, नदियों में और माताओं में भी सर्वश्रेष्ठ हो । हम धन के अभाव से निन्दा को प्राप्त हुए के समान हो रहे हैं । तुम हमें धन रूप समृद्धि दो ॥ २७-३५ ॥