भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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सरस्वतीरहस्योपनिषत् ] [ ४८३ दृश्यानुविद्ध सविकल्प समाधि कही गई है । शब्दानुविद्ध सविकल्प समाधि वह है जिसमें साधक सोचता है कि मैं अद्वैत स्वरूप हूँ, सङ्ग- रहित और स्वयं प्रकाश हूँ। मैं ही सच्चिदानन्द हूँ। आत्म रूप में अनुभव किये जाने वाले रस के आवेश से दृश्य और शब्द की उपेक्षा वालें साधक का हृदय निर्विकल्प समाधि का अनुभव करता है। जैसे वायु-रहित स्थान में रखा हुआ दीपक अविचल रूप से प्रकाशित होता रहता है, वैसे ही साधक की स्थिति रहती है। यह हृदय के भीतर होने वाली समाधि के ही दो रूप कहे हैं। इसी प्रकार बाहर भी किसी वस्तु विशेष के प्रति चित्त में एकाग्रता होने पर समाधि लग जाती है। दृष्टा और दृश्य के विवेक से प्रथम प्रकार की समाधि लगती है और जिसमें प्रत्येक वस्तु से उसके नाम रूप का पृथक्करण होने पर उसके आश्रयभूत चेतन का चिन्तन होता है, वह द्वितीय प्रकार की समाधि कही गई है। जिसमें चैतन्य रस की अनुभूति से उत्पन्न हुए आवेश से स्तब्धता की स्थिति हो, वह तीसरे प्रकार की समाधि है। इन समाधियों में ही अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। शारीरिक अभिमान नष्ट होकर परमात्म-तत्व का ज्ञान होने पर मन जहां-जहां पहुँचता है, वहीं वह श्रेष्ठ अमृतत्व के अनुभव द्वारा सुखी होता है। उस समय सभी संशय मिट जाते और हृदय-ग्रन्थियां खुल जाती हैं। उस कलायुक्त तथा कला-रहित ब्रह्म के साक्षात्कार से सभी कर्मों का क्षय हो जाता है। जो मनुष्य जीवत्व और ईश्वरत्व के भेद को यथार्थ नहीं मानता, वही मुक्त पुरुष है इसे सत्य समझना चाहिए ॥ ५६—६८ ॥ ॥ सरस्वतीरहस्योपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—