भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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देव्युपनिषत् [ ४८७ भगवती दुर्गा की हम शरण ग्रहण करते हैं। हे दैत्यविनाशिनी देवि ! तुम्हें नमस्कार है। देवताओं द्वारा उत्पन्न वैखरी वाणी का अनेक प्रकार के प्राणी उच्चारण करते हैं। वे कामधेनु के समान सुख देने वाली तथा अन्न, बल दायिनी वाणी रूपा देवी हमारी उत्तम स्तुति से सन्तुष्ट होकर हमारे निकट पधारें। जो वेदों द्वारा स्तुत, काल-नाशिनी, विष्णु शक्ति, सरस्वती, स्कन्दमाता, देवमाता, अदिति अथवा दक्ष-कन्या सती रूप वाली भगवती हैं, उन कल्याणमयी और पापनाशिनी भगवती को हम नमस्कार करते हैं। हम सर्वशक्ति वाली भगवती महालक्ष्मी से परिचित हैं और उनका सदा ध्यान करते हैं। वे देवी हमें अपने विषय विशेष में प्रस्तुत करें। हे दक्ष ! आपकी कन्या अदिति के प्रसूता होने पर अमृतत्व गुण वाले देवताओं की उत्पत्ति हुई। काम, योनि, कमल, वज्री, गुहा, वर्ण, वायु, अभ्र, वज्रपाणि, गुहा, सकलरूप वर्ण एवम् माया यह सब उस जगन्माता की ब्रह्मरूपिणी मूल विद्या है। यह विश्व को विमोहित करने वाली, पाश-अंकुश-धनुष बाण धारिणी परब्रह्म की शक्ति हैं। यही श्री महाविद्या हैं। इस प्रकार जानने वाला पुरुष शोक-सन्ताप से मुक्त हो जाता है। हे जगन्माता ! तुम्हें नमस्कार है। तुम सभी प्रकार से हमारी रक्षा करने वाली बनो ॥ ८-१७॥ सैषाऽष्टौ वसवः । सैषैकादशरुद्रा । सैषा द्वादशादित्याः । सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च । सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः । सैषा सत्त्वरजस्तमांसि । सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः । सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि कलाकाष्ठाऽऽदिकाल- रूपिणी । तामहं प्रणौमि नित्यम् ॥ १८ ॥ तापापहारिणीं देवीं भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् । अनन्तां विजयां शुद्धां शरण्यां शिवदां शिवाम् ॥१९॥ वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi