भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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४६० ] [ देव्युपनिषत् दशवारं पठेद्यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते । महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः ॥३१ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत् सायं प्रातः प्रयुञ्जानः पापोऽपापो भवति । निशीथे तुरीयसंध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतन- प्रतिमायां जप्त्वा देवतासांनिध्यं भवति । प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति । भौमाश्विन्यां महादेवीसंनिधौ जप्त्वा महामृत्युं तरति । य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥३२॥ समस्त अक्षरों में मूलाक्षर रूप में रहने वाली, चिन्मयातीता, शून्यसाक्षिणी वे सर्वश्रेष्ठ दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन संसार सागर से पार करने वाली, दुराचार को नष्ट करने वाली दुर्गा देवी को मैं भव- सागर से भयभीत हुआ नमस्कार करता हूँ । इस अथर्वशीर्ष का जप करने वाले को पाँचों अथर्वशीर्ष के जप का फल प्राप्त होता है। इसके बिना जाने हुए लाखों बार अर्चना करने से भी कोई लाभ नहीं हो सकता। इसका दस बार जप करने से समस्त पापों से उसी समय मुक्ति हो जाती है। सायंकाल में पाठ करने से दिन भर के और प्रातःकाल पाठ करने से रात्रि भर के पाप दूर हो जाते हैं। मध्य रात्रि के पाठ से वाक् सिद्धि होती है। भौमाश्विनी योग में पाठ करने से महा-मृत्यु से परित्राण होता है ॥ २७-३२ ॥ ॥ देव्युपनिषद् समाप्त ॥