भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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देव्युपनिषत् [ ४८६ दोषरहित एवम् आश्चर्यवादी भी यही हैं। हम इन देवी को सदा नमस्कार करते हैं। आकाश एवं ईकार युक्त, अग्नि सहित अर्द्धचन्द्र से विभूषित जो बीज है, वह सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जिन साधकों का मन शुद्ध है, वे इस एकाक्षर ब्रह्म का चिन्तन करते हैं। वाणी, माया, काम, वक्त्र, दक्षिण कर्ण, बिन्दु, नारायण, अधर, विच्चे इनसे युक्त नवार्ण मन्त्र उपासकों को सायुज्य पदवी प्रदान करने वाला है। हृदय-कमल में निवास करने वाली, अरुणोदय के समान प्रभा वाली, पाश-अंकुशधारिणी मनोहर रूप वाली वरदहस्त और अभय मुद्रा वाली त्रिनेत्रा, लोहितवसना, कामना पूर्ण करने वाली देवी का मैं सदा भजन करता हूँ। हे महादेवि ! तुम महान् भय और महान् सङ्कट को दूर करने वाली तथा करुणामयी मूर्ति हो। मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। ब्रह्मादि भी जिनके यथार्थ रूप को नहीं जानते, इसीलिए जो अज्ञेया तथा अन्त न होने से अनन्ता कही जाती हैं, जो दिखाई न पड़ने से अलक्ष्या, जन्म रहित होने से अजा, एक ही सर्वत्र व्याप्त होने से एका तथा विश्व रूप में अकेली ही सुशोभित होने से नैका कही जाती है । १८-२६ ॥ मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी । ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ॥२७ यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता । तां दुर्गां दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम् । नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम् ॥२८ इदमथर्वणशीर्षं योऽधीते स पञ्चाथर्वशीर्षजपफल मवा- प्नोति । इदमथर्वणशीर्षं ज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति ॥२६.। शतलक्षं प्रजप्त्वाऽपि नार्चासिद्धिं च विन्दति । शतमष्टोत्तरं चास्याः पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ॥३० Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi