भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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५०२ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत्

पूर्ण मनोयोगपूर्वक ध्वनि सुनते रहने से आरम्भ में साधक योग से युक्त होता है। इस प्रकार इच्छा शक्ति द्वारा प्रेरित जीवात्मा जब सुषुम्णा मार्ग पर अग्रसर होता है तब स्वाधिष्ठान चक्र को भेदकर उसके मध्यवर्ती छिद्र के द्वारा प्राणवायु सुषुम्णा में प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४-६ ॥

दृढासनो भवेद्योगी पद्माद्यासनसंस्थितः । विष्णुग्रन्थेस्ततो भेदात् परमानन्दसंभवः ॥७ अतिशून्यो विमर्दश्च भेरीशब्दस्ततो भवेत् । तृतीयां यत्नतो भित्त्वा निनादो मद्दुलध्वनिः ॥८ महाशून्यं ततो याति सर्वसिद्धिसमाश्रयम् । चित्तानन्दं ततो भित्त्वा सर्वपीठगतानिलः ॥६ निष्पत्तौ वैष्णवः शब्दः क्वणतीति क्वणो भवेत् । एकीभूतं तदा चित्तं सनकादिमुनीडितम् ॥१० अन्तेऽनन्तं समारोप्य खण्डेऽखण्डं समर्पयन् । भूमानं प्रकृतिं ध्यात्वा कृत्यकृत्योऽमृतो भवेत् ॥११ योगेन योगं संरोध्य भावं भावेन चाञ्जसा । निर्विकल्पं परं तत्त्वं सदा भूत्वा परं भवेत् ॥१२ अहंभावं परित्यज्य जगद्भावमनीदृशम् । निर्विकल्पे स्थितो विद्वान् भूयो नाप्यनुशोचति ॥१३

पद्मासन में स्थित योगी दृढ़ अभ्यास में सफल होता है। इसके पश्चात् तृतीय मणिपूरक नामक चक्र में स्थित जो माया अनेक कामनाओं की वृद्धि करती रहती है, उसे विच्छिन्न कर देने पर परम आनन्द प्राप्त हो सकता है। शून्य को लांघता हुआ प्राणवायु जब नाड़ी के साथ सङ्घर्षित होता है तब उससे भेरी सदृश्य ध्वनि सुनाई देती है। तृतीय