१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 509, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् ] [ ५०१ भगवान् आदि नारायण ने कहा—'योग से योग की वृद्धि होती है, इसलिए योग के द्वारा ही योग को जाने। योग में सदा दत्तचित्त योगी चिरकाल तक सुख का उपभोग करता है। मितभोगी साधक राग- द्वेषादि मल के परिपक्व होने पर आलस्य-रहित होकर तथा इस विश्व- प्रपञ्च को ब्रह्मत्व-प्राप्ति में रोड़ा समझकर एकान्त-साधन करता है। वह या तो राजयोग में प्रवृत्त होता है अथवा गुरु द्वारा बताये हुए हठ योग वाले मार्ग पर चलता है। इस प्रकार योगी इन दो प्रकार के योगों में से किसी एक का अवलम्बन करता है। जो साधक प्राणायाम का अभ्यास करते हैं वे मुख द्वारा वायु को भीतर खींचते और अपानवायु को नाभि में जठराग्नि कोष्ठ में खींचकर मुख द्वारा खींची हुई वायु का उससे संयोग कराते हैं, फिर अँगूठे, अँगुलियों और हथेलियों से कान, नेत्र और नासा- पुटों को बन्द कर प्राणायाम द्वारा प्रणव का चिन्तन कर, उसी में रमण करते हुए आत्म-साक्षात्कार करते हैं ॥ १-३ ॥ श्रवणमुखनयननासानिरोधनेनैव कर्तव्यम् । शुद्धसुषुम्नासरणी स्फुटममलं श्रूयते नादः ॥४ विचित्रघोषसंयुक्ताऽनाहते श्रूयते ध्वनिः । दिव्यदेहश्च तेजस्वी दिव्यगन्धोऽप्यरोगवान् ॥५ संपूर्णहृदयः शून्ये त्वारम्भे योगवान् भवेत् । द्वितीयां विघटीकृत्य वायुर्भवपि मध्यगः ॥६ कान, नाक, मुख, नेत्र के छिद्रों को बन्द करने पर अभ्यास की एक अन्य विधि भी सिद्ध होती है। उनके द्वारा शुद्ध सुषुम्णा नाड़ी में प्रणव का अनाहत नाद सुना जाता है। अनाहत चक्र में ध्वनि सुनते हुए विभिन्न प्रकार के विचित्र घोष सुनाई देते हैं। यह साधना साधक का अत्यन्त तेजस्विता प्राप्त कराती है। उसके देह से दिव्य गन्ध आती है और वह स्वस्थ होता हुआ दिव्य शरीर को प्राप्त होता है। शून्य में