भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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५०० ] सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् समृद्धि, कॄष्टि, पुष्टि, धनदा, धनेश्वरी, श्रद्धा, सावित्री, भोगिनी, भोगदा, धात्री, विधात्री, प्रभृति नामों के द्वारा शक्ति-पूजन करे । एका- क्षर मंत्र के समान ही पीठ पूजा की जाती है । पुरश्चरण के निमित्त एक लक्ष मंत्र-जप करना चाहिए । जप का दसवां भाग तर्पण, तर्पण का दसवां भाग हवन और हवन का दसवां भाग ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये । इस श्रीविद्या की प्राप्ति उन्हीं को होती है जो कामना-रहित भाव से उपासना करते हैं । कामना सहित उपासना करने वालों को इसकी सिद्धि नहीं होती ॥ ६—१२ ॥ द्वितीयः खण्डः अथ हैन देवा ऊचुस्तुरीया माययां निर्दिष्टं तत्त्वं ब्राह्मोत तथेति स होवाच— योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात् प्रवर्धते । योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगी रमते चिरम् ॥ १ ॥ समापय्य निद्रां सुजीर्णेऽल्पभोजी श्रमत्याज्यबाधे विविक्ते प्रदेशे । सदाऽऽसीत निस्तृष्ण एष प्रयत्नो- ऽथ वा प्राणरोधो निजाभ्यासमार्गात् ॥ २ ॥ वक्त्रेणापूर्यं वायुं हुतवहनिलयेऽपानमाकृष्य धृत्वा स्वाङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीभिर्वरकरतलयोः षड्भिरेवं निरुध्य । श्रोत्रे नेत्रे च नासापुटयुगलमथोज्नेन मार्गेण सम्यक् पश्यन्ति प्रत्ययांसं प्रणवबहुविधध्यानसंलीनचित्ताः ॥ ३ ॥ आदि नारायण से देवताओं ने निवेदन किया—'भगवन् ! तुरीया माया द्वारा निर्दिष्ट तत्व के सम्बन्ध में हमें उपदेश दीजिये ।'