१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 507, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंसौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ४६६ अङ्गैः प्रथमाऽऽवृत्तिः । वासुदेवादिद्वितीया । बालकयादि- स्तृतीया । इन्द्रादिभिश्चतुर्थी भवति । द्वादशलक्षजपः ॥ १० ॥ श्रीलक्ष्मीर्वरदा विष्णुपत्नी वसुप्रदा हिरण्यरूप्रा स्वर्ण- मालिनी रजतरस्रजा स्वर्णप्रभा स्वर्णप्राकारा पद्मवासिनी पद्म- हस्ता पद्मप्रिया मुक्तालङ्कारा चन्द्रा सूर्या बिल्वप्रिया ईश्वरी भुक्तिर्मुक्तिर्विभूतिर्ऋद्धिः समृद्धिः कृष्टिः पुष्टिर्धनदा धनेश्वरी श्र- द्धा भोगिनी भोगदा धात्री विधात्रीत्यादिप्रणवादिनमोऽन्ताश्चतुर्थ्य- न्ता मंत्राः । एकाक्षरवदङ्गादिपीठम् । लक्षजपः । दशांशं तर्पणम् । शतांशं हवनम् । सहस्रांशं द्विजतृप्ति ॥११॥ निष्कामानामेव श्रो- विद्यासिद्धिः । न कदाऽपि सकामानामिति ॥ १२॥ तीन वृत्तों से युक्त रमापीठ यंत्र अङ्कित करे । अष्टदल कर्णिका में साध्य सहित श्री बीज लिखे । प्रारम्भ से ओंकार और अन्त में नमः के योग सहित प्रत्येक नाम के साथ चतुर्थी विभक्ति के प्रयोग द्वारा नौ शक्तियों की पूजा करे । विभूति, उन्नति, कान्ति, सृष्टि, कीर्ति, सन्नति, व्युष्टि, सत्कृष्ट एवं ऋद्धि यही नौ शक्तियां हैं । अङ्गन्यास द्वारा प्रथम आवरण पूजा करे । वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का क्रमशः पूजन करे । इस प्रकार द्वितीय आवरण पूजा होती है । फिर बालकी आदि की पूजा द्वारा तृतीय आवरण को पूजे । फिर इन्द्रादि देवों और उनके आयुधों के द्वारा चतुर्थ आवरण की पूजा करे । पुरश्चरण के निमित्त द्वादशलक्ष मंत्र-जप का विधान है । त्र्यक्षरी विद्या के पूजन में आदि में ओंकार और अन्त में नमः लगाकर प्रत्येक नाम की चतुर्थी विभक्ति सहित प्रयोग होता है । श्री, लक्ष्मी, वरदा, विष्णुप्रिया, हिरण्यरूप्रा, वसुप्रदा, रजतरस्रजा, स्वर्ण- मालिनी, स्वर्णप्रभा, स्वर्णंप्रकाश, पद्मवासिनी, पद्महस्ता, पद्मप्रिया, विल्वप्रिया, चन्द्रसूर्या, मुक्तालङ्कार, ईश्वरी, भुक्ति, मुक्ति, विभूति, ऋद्धि,