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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ४६६ अङ्गैः प्रथमाऽऽवृत्तिः । वासुदेवादिद्वितीया । बालकयादि- स्तृतीया । इन्द्रादिभिश्चतुर्थी भवति । द्वादशलक्षजपः ॥ १० ॥ श्रीलक्ष्मीर्वरदा विष्णुपत्नी वसुप्रदा हिरण्यरूप्रा स्वर्ण- मालिनी रजतरस्रजा स्वर्णप्रभा स्वर्णप्राकारा पद्मवासिनी पद्म- हस्ता पद्मप्रिया मुक्तालङ्कारा चन्द्रा सूर्या बिल्वप्रिया ईश्वरी भुक्तिर्मुक्तिर्विभूतिर्ऋद्धिः समृद्धिः कृष्टिः पुष्टिर्धनदा धनेश्वरी श्र- द्धा भोगिनी भोगदा धात्री विधात्रीत्यादिप्रणवादिनमोऽन्ताश्चतुर्थ्य- न्ता मंत्राः । एकाक्षरवदङ्गादिपीठम् । लक्षजपः । दशांशं तर्पणम् । शतांशं हवनम् । सहस्रांशं द्विजतृप्ति ॥११॥ निष्कामानामेव श्रो- विद्यासिद्धिः । न कदाऽपि सकामानामिति ॥ १२॥ तीन वृत्तों से युक्त रमापीठ यंत्र अङ्कित करे । अष्टदल कर्णिका में साध्य सहित श्री बीज लिखे । प्रारम्भ से ओंकार और अन्त में नमः के योग सहित प्रत्येक नाम के साथ चतुर्थी विभक्ति के प्रयोग द्वारा नौ शक्तियों की पूजा करे । विभूति, उन्नति, कान्ति, सृष्टि, कीर्ति, सन्नति, व्युष्टि, सत्कृष्ट एवं ऋद्धि यही नौ शक्तियां हैं । अङ्गन्यास द्वारा प्रथम आवरण पूजा करे । वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध का क्रमशः पूजन करे । इस प्रकार द्वितीय आवरण पूजा होती है । फिर बालकी आदि की पूजा द्वारा तृतीय आवरण को पूजे । फिर इन्द्रादि देवों और उनके आयुधों के द्वारा चतुर्थ आवरण की पूजा करे । पुरश्चरण के निमित्त द्वादशलक्ष मंत्र-जप का विधान है । त्र्यक्षरी विद्या के पूजन में आदि में ओंकार और अन्त में नमः लगाकर प्रत्येक नाम की चतुर्थी विभक्ति सहित प्रयोग होता है । श्री, लक्ष्मी, वरदा, विष्णुप्रिया, हिरण्यरूप्रा, वसुप्रदा, रजतरस्रजा, स्वर्ण- मालिनी, स्वर्णप्रभा, स्वर्णंप्रकाश, पद्मवासिनी, पद्महस्ता, पद्मप्रिया, विल्वप्रिया, चन्द्रसूर्या, मुक्तालङ्कार, ईश्वरी, भुक्ति, मुक्ति, विभूति, ऋद्धि,

दसवां भाग हवन और हवन का दसवां भाग ब्राह्मण भोजन कराना

५०० ] सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् समृद्धि, कॄष्टि, पुष्टि, धनदा, धनेश्वरी, श्रद्धा, सावित्री, भोगिनी, भोगदा, धात्री, विधात्री, प्रभृति नामों के द्वारा शक्ति-पूजन करे । एका- क्षर मंत्र के समान ही पीठ पूजा की जाती है । पुरश्चरण के निमित्त एक लक्ष मंत्र-जप करना चाहिए । जप का दसवां भाग तर्पण, तर्पण का दसवां भाग हवन और हवन का दसवां भाग ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये । इस श्रीविद्या की प्राप्ति उन्हीं को होती है जो कामना-रहित भाव से उपासना करते हैं । कामना सहित उपासना करने वालों को इसकी सिद्धि नहीं होती ॥ ६—१२ ॥ द्वितीयः खण्डः अथ हैन देवा ऊचुस्तुरीया माययां निर्दिष्टं तत्त्वं ब्राह्मोत तथेति स होवाच— योगेन योगो ज्ञातव्यो योगो योगात् प्रवर्धते । योऽप्रमत्तस्तु योगेन स योगी रमते चिरम् ॥ १ ॥ समापय्य निद्रां सुजीर्णेऽल्पभोजी श्रमत्याज्यबाधे विविक्ते प्रदेशे । सदाऽऽसीत निस्तृष्ण एष प्रयत्नो- ऽथ वा प्राणरोधो निजाभ्यासमार्गात् ॥ २ ॥ वक्त्रेणापूर्यं वायुं हुतवहनिलयेऽपानमाकृष्य धृत्वा स्वाङ्गुष्ठाद्यङ्गुलीभिर्वरकरतलयोः षड्भिरेवं निरुध्य । श्रोत्रे नेत्रे च नासापुटयुगलमथोज्नेन मार्गेण सम्यक् पश्यन्ति प्रत्ययांसं प्रणवबहुविधध्यानसंलीनचित्ताः ॥ ३ ॥ आदि नारायण से देवताओं ने निवेदन किया—'भगवन् ! तुरीया माया द्वारा निर्दिष्ट तत्व के सम्बन्ध में हमें उपदेश दीजिये ।'

सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् ] [ ५०१ भगवान् आदि नारायण ने कहा—'योग से योग की वृद्धि होती है, इसलिए योग के द्वारा ही योग को जाने। योग में सदा दत्तचित्त योगी चिरकाल तक सुख का उपभोग करता है। मितभोगी साधक राग- द्वेषादि मल के परिपक्व होने पर आलस्य-रहित होकर तथा इस विश्व- प्रपञ्च को ब्रह्मत्व-प्राप्ति में रोड़ा समझकर एकान्त-साधन करता है। वह या तो राजयोग में प्रवृत्त होता है अथवा गुरु द्वारा बताये हुए हठ योग वाले मार्ग पर चलता है। इस प्रकार योगी इन दो प्रकार के योगों में से किसी एक का अवलम्बन करता है। जो साधक प्राणायाम का अभ्यास करते हैं वे मुख द्वारा वायु को भीतर खींचते और अपानवायु को नाभि में जठराग्नि कोष्ठ में खींचकर मुख द्वारा खींची हुई वायु का उससे संयोग कराते हैं, फिर अँगूठे, अँगुलियों और हथेलियों से कान, नेत्र और नासा- पुटों को बन्द कर प्राणायाम द्वारा प्रणव का चिन्तन कर, उसी में रमण करते हुए आत्म-साक्षात्कार करते हैं ॥ १-३ ॥ श्रवणमुखनयननासानिरोधनेनैव कर्तव्यम् । शुद्धसुषुम्नासरणी स्फुटममलं श्रूयते नादः ॥४ विचित्रघोषसंयुक्ताऽनाहते श्रूयते ध्वनिः । दिव्यदेहश्च तेजस्वी दिव्यगन्धोऽप्यरोगवान् ॥५ संपूर्णहृदयः शून्ये त्वारम्भे योगवान् भवेत् । द्वितीयां विघटीकृत्य वायुर्भवपि मध्यगः ॥६ कान, नाक, मुख, नेत्र के छिद्रों को बन्द करने पर अभ्यास की एक अन्य विधि भी सिद्ध होती है। उनके द्वारा शुद्ध सुषुम्णा नाड़ी में प्रणव का अनाहत नाद सुना जाता है। अनाहत चक्र में ध्वनि सुनते हुए विभिन्न प्रकार के विचित्र घोष सुनाई देते हैं। यह साधना साधक का अत्यन्त तेजस्विता प्राप्त कराती है। उसके देह से दिव्य गन्ध आती है और वह स्वस्थ होता हुआ दिव्य शरीर को प्राप्त होता है। शून्य में

५०२ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत्

पूर्ण मनोयोगपूर्वक ध्वनि सुनते रहने से आरम्भ में साधक योग से युक्त होता है। इस प्रकार इच्छा शक्ति द्वारा प्रेरित जीवात्मा जब सुषुम्णा मार्ग पर अग्रसर होता है तब स्वाधिष्ठान चक्र को भेदकर उसके मध्यवर्ती छिद्र के द्वारा प्राणवायु सुषुम्णा में प्रविष्ट हो जाता है ॥ ४-६ ॥

दृढासनो भवेद्योगी पद्माद्यासनसंस्थितः । विष्णुग्रन्थेस्ततो भेदात् परमानन्दसंभवः ॥७ अतिशून्यो विमर्दश्च भेरीशब्दस्ततो भवेत् । तृतीयां यत्नतो भित्त्वा निनादो मद्दुलध्वनिः ॥८ महाशून्यं ततो याति सर्वसिद्धिसमाश्रयम् । चित्तानन्दं ततो भित्त्वा सर्वपीठगतानिलः ॥६ निष्पत्तौ वैष्णवः शब्दः क्वणतीति क्वणो भवेत् । एकीभूतं तदा चित्तं सनकादिमुनीडितम् ॥१० अन्तेऽनन्तं समारोप्य खण्डेऽखण्डं समर्पयन् । भूमानं प्रकृतिं ध्यात्वा कृत्यकृत्योऽमृतो भवेत् ॥११ योगेन योगं संरोध्य भावं भावेन चाञ्जसा । निर्विकल्पं परं तत्त्वं सदा भूत्वा परं भवेत् ॥१२ अहंभावं परित्यज्य जगद्भावमनीदृशम् । निर्विकल्पे स्थितो विद्वान् भूयो नाप्यनुशोचति ॥१३

पद्मासन में स्थित योगी दृढ़ अभ्यास में सफल होता है। इसके पश्चात् तृतीय मणिपूरक नामक चक्र में स्थित जो माया अनेक कामनाओं की वृद्धि करती रहती है, उसे विच्छिन्न कर देने पर परम आनन्द प्राप्त हो सकता है। शून्य को लांघता हुआ प्राणवायु जब नाड़ी के साथ सङ्घर्षित होता है तब उससे भेरी सदृश्य ध्वनि सुनाई देती है। तृतीय

सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ५०३ मणिपूरक चक्र के भेद कर चलने पर प्राणवायु से मृदङ्ग की-सी ध्वनि निकलती है। फिर अन्य चक्रों को भेदता हुआ चलने वाला प्राणवायु महाशून्य में पहुँच कर सब प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त करता है। तद- नन्तर प्राणवायु तालु चक्र द्वारा चित्त को जीतकर तालुचक्र का भेदन करता है वहाँ चित्त स्थित सभी आनन्द उसे प्राप्त होते हैं ॥ ७—६ ॥ इस साधना के अन्त में प्रणव शब्द के रूप में स्वयं प्रकट होकर गूँजता है। चित्त उसमें लीन हो जाता है। यह कथन सनकादि मुनियों का है। उस महाचक्र में स्थित साधक अन्त में अनन्त का समारोप करता है। माया ग्रस्त रूप को ब्रह्मा में समर्पित कर साधक आत्मा की सर्व- व्याप्तता के चिन्तन द्वारा कृतकृत्य होता हुआ अमृतत्व प्राप्त करता है। असंप्रज्ञात योग द्वारा संप्रज्ञात योग पर विजय पावे और अभाव से भाव का निरोध करे। तब साधक निर्विकल्प समाधि को प्राप्त होकर कैवल्य में स्थित होता है। उस समय उसका अहं भाव मिट जाता है और मायामय संसार भी लुप्त हो जाता है। ऐसे ज्ञानी साधक को फिर ममत्व नहीं घेरता ॥ १०-१३ ॥ सलिले सैन्धवं यद्वत् साम्यं भवति योगतः । तथाऽऽत्ममनसोरैक्यं समाधिरभिधीयते ॥१४ यदा संक्षीयते प्राणो मानसं च प्रलीयते । तदा समरसत्वं यत् समाधिरभिधीयते ॥१५ यत् समत्वं तयोरत्र जीवात्मपरमात्मनोः । समस्तनष्टसङ्कल्पः समाधिरभिधीयते ॥१६ प्रभाशून्यं मनःशून्यं बुद्धिशून्यं निरामयम् । सर्वशून्यं निराभासं समाधिरभिधीयते ॥१७ स्वयमुच्चलिते देहे देही नित्यसमाधिना । निश्चलं तं विजानीयात् समाधिरभिधीयते ॥१८ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५०४ ] [ मण्डलब्राह्मणोपनिषत्

५०४ ] [ मण्डलब्राह्मणोपनिषत्

यत्रयत्र मनो याति तत्रतत्र परं पदम् । तत्रतत्र परं ब्रह्म सर्वत्र समवस्थितम् ॥१६

जल में मिलाया हुआ नमक उसी में घुलमिल जाने के समान, मन जब आत्मा में विलीन हो जाता है उस अवस्था को समाधि कहते हैं। प्राणायाम के द्वारा सम्यक् रूप से क्षीण हुआ प्राणवायु जब कुम्भक में स्थिर होता है और चित्तवृत्तियों का लोप हो जाता है, तब चित्त और आत्मा का एकीभाव समाधि कहा जाता है। समाधि उस अवस्था का नाम है, जिसमें जीव आत्मा का परमात्मा से समत्व होने पर सभी सङ्कल्प मिट जाते हैं। सांसारिक बोध-रहित जिस स्थिति में मन-बुद्धि का पूर्ण विलीनीकरण हो जाने पर सब कुछ शून्यवत् दिखाई पड़ता है, उस अवस्था को निरामय कहते हैं, वही समाधि कही जाती है। शरीर के इधर-उधर गमन करने पर भी चित्त का निश्चल एवं ध्यानमग्न रहना समाधि की अवस्था ही है। उस अवस्था में साधक का मन जहाँ भी गमन करता है, वहीं उसे परम पद उपलब्ध होता है। उसके लिए परम ब्रह्म सर्वत्र समान रूप से अवस्थित रहता है ॥ १४-१६ ॥

तृतीयः खण्डः

अथ हैन देवा ऊचुर्नवचक्रविवेकमनुब्रूहीति । तथेति स होवाच— आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिरावृत्तभङ्गीमण्डलाकारं तत्र मूलकन्दे शक्तिः पावकाकारं ध्यायेत् तत्रैव कामरूपपीठं सर्वकामप्रदं भवति इत्याधारचक्रम् ॥ १ ॥ द्वितीयं स्वाधिष्ठानचक्रं षड्दलं तन्मध्ये पश्चिमाभिमुखं

सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ५०५ ] लिङ्गं प्रवालाङ्कुरसदृशं ध्यायेत् तत्रैवोड्ड्याणपीठं जगदाकर्षण- सिद्धदं भवति ॥ २ ॥ तृतीयं नाभिचक्रं पञ्चावर्तं सर्पकुटिलाकारं तन्मध्ये कुण्ड- लिनों बालार्ककोटिप्रभां तटित्संनिभां ध्यायेत् सामर्थ्यशक्तिः सर्व- सिद्धिप्रदा भवति मणिपूरकचक्रम् ॥ ३ ॥ हृदयचक्रमष्टदलमधोमुखं तन्मध्ये ज्योतिर्मय लिङ्गाकारं ध्यायेत् संवं हं सकला सर्वप्रिया सर्वलोकवश्यकरी भवति ॥ ४ ॥ कण्ठचक्रं चतुरङ्गुलं तत्र वामे इडा चन्द्रनाडी दक्षिणो पिङ्गला सूर्यनाडी तन्मध्ये सुषुम्नां श्वेतवर्णां ध्यायेत् य एवं वेदानाडुातसिद्धिदा भवति ॥ ५ ॥ तालुचक्रं तत्रामृतधाराप्रवाहो घण्टिकालिङ्गं मूलचक्रं- रन्ध्रे राजदन्तावलम्बिनोविवरं दशमद्वारं तत्र शून्यं ध्यायेत् चित्तलयो भवति ॥ ६ ॥ सप्तमं भ्रूचक्रमङ्गुष्ठमात्रं तत्र ज्ञाननेत्रं दीपशिखाऽऽकारं ध्यायेत् तदेव कपालकन्दं वाक्सिद्धिदं भवत्याज्ञाचक्रम् ॥ ७ ॥ ब्रह्मरन्ध्रं निर्वाणचक्रं तत्र सूचिकागृहेतरं धूम्रशिखाऽऽ- कारं ध्यायेत् तत्र जालन्धरपीठं मोक्षप्रदं भवतीति परब्रह्म- चक्रम् ॥ ८ ॥ नवममाकाशचक्रं तत्र षोडशदलपद्मनूध्वंर्मुखं तन्मध्यकर्णि कात्रिकूटाकारं तन्मध्ये ऊर्ध्वशक्तितां परशून्यं ध्यायेत् तत्रैव पूर्णगिरिपीठं सर्वेच्छासिद्धि साधनं भवति ॥ ६ ॥ देवताओं ने पुनः भगवान् आदि नारायण से निवेदन किया— 'प्रभो ! नव चक्र विवेक के सम्बन्ध में हमारे प्रति उपदेश करिये ।' भगवान् आदिनारायण ने कहा—'मूलाधार स्थित जो ब्रह्मचक्र है, वह योनि के आकार के तीन घेरों वाला है । वहाँ कर्णिकामूल में सुप्त सर्प के आकार में कुण्डलिनी शक्ति स्थित है । जब तक वह जाग्रत Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५०६ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् न हो तब तक भभकती हुई ज्वाला के रूप में उसका ध्यान करे। भगवती त्रिपुरा का कामरूप पीठ नामक स्थान वहीं है। उसकी अर्चना के द्वारा सभी भोगों की प्राप्ति हो सकती है। यह आधार नाम वाले प्रथम चक्र के सम्बन्ध में कहा गया ॥ १ ॥ षट्दल पद्म का स्वाधिष्ठान चक्र दूसरा है। उस छः दल के कमल के कर्णिका पृष्ठ में एक लाल वर्ण के शिवलिंग का पश्चिमाभिमुख चिंतन करे। वहाँ उड्यान पीठ है उसकी उपासना विश्व आकर्षण की सिद्धि प्राप्त कराने वाली है। तृतीय नाभिचक्र टेढ़ा, सर्पाकार तथा पांच घेरों वाला है। उस चक्र में करोड़ों बालसूर्यों की-सी ज्योति वाली तथा तड़ित् के समान कृशांग कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करे। जाग्रत होने पर यह शक्ति अत्यन्त सामर्थ्य वाली होती है तथा सब सिद्धियां देती हैं। मणिपूरक चक्र आठ दल वाले कमल के आकार का तथा निम्नमुख रहता है यही हृदय चक्र है। इसमें ज्योतिर्मय लिंग का चिंतन करे। वह ज्योतिर्मय लिंग हंसकला नाम से सर्वप्रिय है। उसकी जागृति पर सर्व- लोक वश करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है। कण्ठ में एक चार अंगुल प्रमाण का चक्र है। उसमें बायीं ओर इडा और दायीं ओर पिंगला नाड़ी है। इन दोनों के मध्य श्वेतवर्ण वाली सुषुम्णा नाड़ी का चिन्तन करे। इसे जानने वाले को अनाहत चक्र सिद्धि देने वाला है। इससे आगे जो तालुचक्र है उसमें अमृत की धार निरन्तर बहती रहती है। इस तालुचक्र में दस-बारह दल होते हैं। आगे दाँतों की जड़ तक विस्तृत हुआ जो चक्र के आकार का छिद्र है उसमें तालुचक्र है। उसमें शून्य का ध्यान करे ऐसा करने से चित्त शून्यरत्त होता है। अँगूठे के परिणाम का सातवां भूचक्र है। उसमें निवात दीप शिखा के आकार वाले ज्ञान नेत्र का चिन्तन करे। इस चक्र के जाग्रत होने पर कपाल-रन्ध्र और उमसे सम्बन्धित विषयों का ज्ञान मिलता है। आठवां आज्ञाचक्र है, वही ब्रह्म- रन्ध्र कहा जाता है। उस रन्ध्र का परिणाम सुई की नोंक के समान

सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् [ ५०७ है । वहां धूम्रशिखा रूप का चिन्तन करे । वहां जालंधर पीठ है, जिसकी उपासना से मोक्ष मिलती है । इसलिए इसे परब्रह्म चक्र भी कहा गया है । नौवां चक्र आकाश चक्र है । वहां सोलह दल वाला कमल ऊपर की ओर मुख वाला है । उसकी मध्य कर्णिका त्रिगुणों की जननी होने से तीन शिखरों वाले पर्वत के आकार की बताई गई है । उसके मध्य ऊपर की ओर झुकी हुई शक्ति है, उसका अवलोकन करते हुए चिन्तन करे । वहीं पूर्ण गिरि पीठ है, उसकी उपसना से सब कामनायें सिद्ध होती हैं ॥ २-६ ॥ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति स वायूपूतो भवति स सकलधनधान्यसत्पुत्रकलत्रहयभूगजपशुमहिषी- दासीदासयोगज्ञानवान् भवति न स पुनरावर्तत इत्युपनिषत् ।१०। जो इस सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् का नित्य पाठ करता है, वह अग्निपूत और वायूपूत होता हैं । वह सब धन, धान्य, स्त्री, पुत्र, हाथी, अश्व, गौ, भैंस तथा भृत्यादि युक्त ऐश्वर्य से सम्पन्न ज्ञानी होता हैं तथा अन्त में परम पद को प्राप्त होकर वहां से फिर नहीं लौटता ॥ १० ॥ ॥ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् समाप्त ॥

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri त्रिपुरोपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा- विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारमवतु वक्तारम् । ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ शान्तिपाठ—ॐ । मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयंप्रकाश आत्मा ! मेरे सन्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिए मेरे वेदा- भ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास में ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ । मैं ऋत भाषण करुँगा, सत्य भाषण करुँगा, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो । ॐ शांति शांति शांति । तिस्रः पुरस्त्रिपथा विश्वचर्षणा अत्राकथा अक्षराः सन्निविष्टाः । अधिष्ठायैना अजरा पुराणी महत्तमा महिमा देवतानाम् ॥१ नवयोनिं नव चक्राणि दीधिरे नवैव योगा नव योगिन्यश्च । नवानां चक्रा अधिनाथाः स्योना नव भद्रा नव मुद्रा महीनामू ॥२ एका स आसीत् प्रथमा सा नवांसीदा सोनविंशादा सोनत्रिंशात् । चत्वारिंशादथतिस्रः समिधा उशतीरिव मातरो माऽऽविशन्तु ॥३ ऊर्ध्वज्वलनं ज्योतिरग्रे तमो वै तिरश्चीनमजरं दद्रजोऽभूत् । आनन्दनं मोदनं ज्योतिरिन्दोरेता उ वै मण्डला मण्डयति ॥४ यास्तिस्रो रेखाः सदनानि भूस्त्रीस्त्रिविष्टपास्त्रिगुणास्त्रि प्रक्ताराः । एतत्रयं पूरकं पुरकाणां मन्त्रप्रतते मदनो मदन्या ॥५ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

त्रिपुरोपनिषत् CC0 In Public Domain. Digitization by eGangotri [ ५०६ जो अपनी अज्ञ दृष्टि द्वारा कल्पित व्यष्टि, समष्टि भेद से युक्त स्थूल व सूक्ष्म कारण वाले तीन पुर हैं, एवं जो देवयान पितृयान आदि भेद से, कर्मोपासना ज्ञानकाण्ड से, ज्ञान, विज्ञान, सम्यग् ज्ञान के भेद से विकल्पित जो तीन रास्ते हैं, साथ ही 'अकथादि श्रीपीठ' इत्यादि श्रुति के अनुरोध से इस श्रीचक्र में जो अ से लेकर क्ष पर्यन्त के अक्षर सन्निविष्ट हैं, इन पुरों, इन पथों इन अक्षरों को जीवेश प्रत्यक् पर आत्मा से अधि- ष्ठित करके महा महिमामय अर्थात् सृष्टि निर्माण की सामर्थ्यरूपिणी स्थूल आदि जो तीन शरीर उनसे विलक्षण जराहीन महान् कोई चिरंतन चिद् शक्ति सर्वोत्कृष्ट रूप से विराजमान है, वही सर्वोत्तम है ॥ १ ॥ • जिसका आश्रय लेकर वयोनियां अर्थात् महात्रिपुरसुन्दरी आदि शक्तियाँ, सर्वान-दमय आदि नौचक्र, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, सहयोग भेद से नौ योग तथा नौ चक्रों के अन्दर रहने वाली नौ योगनियां प्रकाशित होती हैं। नौ जो देवताओं की आधार भूमियां उनके चक्राधिनाथ तथा प्रतिहारिणियां कामेश्वरी आदि मद्रायें तथा योनि आदि नौ मुद्रायें भी इसी पर आश्रित हैं। इसके ही आश्रय से प्रकाशित होती हैं। ऐसी यह प्रधान रूपा एक ही थीं और वही यह नवभद्र आदि रूप में थीं और पांच ज्ञानेन्द्रियां पांच कर्मेन्द्रियां पांच प्राण तथा अन्तः करण चतुष्टय (चार) भेद से जो उन्नीस तत्व समूह है उससे उत्पन्न जो शक्तियां उनके स्वरूप में भी यही थीं। साथ ही दस इन्द्रियां, पाँच प्राण, चार अन्तःकरण, पाँच महाभूत, पाँच उपप्राण के भेद से जो उन्तीस तत्व ग्राम उनसे उत्पन्न जो शक्तियाँ उनके रूप में भी यहीं थीं, और इसी प्रकार अन्तःकरण चतुष्टय सहित जो चौदह इन्द्रियां, तीन कर्म विक्षेपादि चार गुण प्रभृति जो चालीस शक्तियाँ है, तद्रूप में भी यही विद्यमान थीं। सो क्रिया, ज्ञान व इच्छात्मक ज्ञान, विज्ञान, सम्वग्ज्ञान रूप तीन शक्तियाँ (जो कि इसी चिद् शक्ति के रूप है) अपने पुत्र की हित कामना वालो माता के समान मुझे ब्रह्म पदवी की प्राप्ति के लिए प्रेरित करें, मेरे में प्रविष्ट हों, स्थित रहें । ३ । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५१० ] [ त्रिपुरोपनिषत् 'अथ तत ऊर्ध्वं उदेता' अथ यदतः परो दिवो 'ज्योतिर्दीत्यते' 'ज्योतिर्ज्वलति ब्रह्माहमस्मि' इत्यादि श्रुति ( वेदऋचा ) के अनुरोध से पराक् प्रपञ्च रूप इन्धन (लकड़ी) का आश्रय लेकर ऊर्ध्वं (ऊपर) की ओर जलने वाली, प्रकाशित होने वाली प्रत्यग् ज्योति ही पराग् वृत्ति के उदय होने से पहले सदा अनुभूत होती है ( हुई है ) उसके वैपरीत्य से तिरश्चीन अर्थात् पराग् रूप जो सत्य रज तम वह अपने अधीनस्थ पराग् भाव को छोड़कर, अजर (जराहीन) ब्रह्म हुआ (हो जाया करता) है । इस प्रकार 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात् ब्रह्म से अभिन्न अपने को मान कर अपने अतिरिक्त संसार में कुछ न देखता हुआ (योगी) परम प्रसन्न होता है, आनन्दित होता है, परमप्रकाश का युञ्जमोद ( प्रसन्नता ) स्वरूप जो इन्दुरूप ज्योति उससे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं वही मैं हूँ, ये जो खण्ड मण्डलाकार, अखण्ड सविकल्प निर्विकल्प वृत्तियां हैं ये मुझे जो कि मैं ब्रह्म भावापन्न हूँ ब्रह्मरूप हो चुका हूं, अलंकृत करती हैं। वे सब भी स्वयं ब्रह्म में लीन हो जाती हैं । तत्र परमात्मा अद्वैत रूप से स्थित हो जाया करता है ॥ ४ ॥ जो पुनः ये तीन रेखायें अर्थात् जड़-क्रिया, ज्ञान इच्छा शक्ति हैं जो जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति व तुरीय स्थान हैं, लोचन कण्ठ हृदय, सहस्रार- चक्र हैं एव' भूः भुवः स्वः तीन लोक हैं, स्वर्ग हैं, एवं तम आदि गुण और एक-एक गुण के पुनः तम रूप इत्यादि भेद से तीन प्रकार हैं ये सब जिस का आश्रय लेकर स्थित हैं वह इन सब के पूरक प्रधान देव आदि विद्या, तदङ्ग देवता मन्त्र प्रतत (श्री चक्र) मध्य त्रिकोणरूप कामिनी ( स्त्री ) जो चिच्छक्ति उसके साथ रहने वाले बिन्दु रूपी मदन ( कामेश्वर ) प्रधान रूप से विद्यमान हैं, शोभित हैं ॥ ५ ॥ मदन्तिका मानिनी मंगला च सा सुन्दरी सिद्धिमद्या । लज्जा मतिस्तुष्टिरिष्टा च पुष्टा लक्ष्मीरुमा ललिता लालपन्ती ॥६ इमां विज्ञाय सुधया मदन्ती परिस्रुता तर्पयन्तः स्वपीठम् । नाकस्य पृष्ठे महतो वसन्ति परं धाम त्रैपुरं चाविशन्ति ॥७

त्रिपुरोपनिषत् [ ५११ कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहा हसा मातरिश्वाऽभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया च पुरूच्येषा विश्वमाताऽऽदिविद्या ॥८ षष्ठं सप्तममथ वह्निसारथिमस्या मूलत्रिकमादेशयन्तः । कथ्यं कविं कल्पकं काममीशं तुष्टुवांसो अमृतत्वं भजन्ते ॥९ पुरं हन्त्रीमुखं विश्वमातू रवे रेखा स्वरमध्यं तदेषा । बृहत्तिथिर्दश पञ्चादिनित्या सषोडशिकं पुरमध्यं बिभर्ति ॥१० यद्द्वा मण्डलाद्द्वा स्तनबिम्बमेकं मुखं चाधस्त्रीणि गुहासदनानि । कामीकलां कामरूपां चिकित्वा नरोजायते कामरूपश्च काम्यः ॥११ परिस्रुतं झषमाजं पलं च भक्तानि योनिः सुपरिष्कृताश्च । निवेदयन् देवतायै महत्यै स्वात्मीकृते सुकृते सिद्धिमेति ॥१२ सृण्येव सितया विश्वचर्षणिः पाशेनैव प्रतिबध्नात्यभीकान् । इषुभिः पञ्चभिर्धनुषा च विद्ध्यत्यादिशक्तिकरुणा विश्वजन्या ॥१३ भगः शक्तिर्भगवान् काम ईश उभा दाताराविह सौभागानाम् । समप्रधानो समसत्त्वौ समोजौ तयोः शक्तिरजरा विश्वयोनिः ॥१४ परिस्रुता हविषा भावितेन प्रसंकोचे गलिते वैमनस्कः । शर्वः सर्वस्य जगतो विधाता धर्ता हर्ता विश्वरूपत्वमेति ॥१५ इयं महोपनिषत्त्रैपुर्या यामक्षयं परमा गीर्भिरीट्टे । ए षर्ग्युजुः परमेतच्च सामायमथर्वेयमन्या च विद्या ॥१६ ॐ ह्रीमोँ ह्रीमित्युपनिषत् ॥१७॥ उनके परिवार की आवरण देवता पन्द्रह हैं जो कि क्रमशः— तदन्तिका, मानिनी, मङ्गला, सुभगा, सुन्दरी, सिद्धिमता, लज्जा, माति तुष्टि, इष्टा, पुष्टा, लक्ष्मी, उमा, ललिता, लालपन्ती हैं ॥ ६ ॥ इस प्रकार परिवार के देवताओं द्वारा जो चारों ओर से सेवित है, यह अमृत द्वारा मदयुक्त 'मेरे अतिरिक्त कुछ नहीं है' 'मैं ही यह सारा विश्व प्रपञ्च हूँ' इस प्रकार अपने रूप के अनुसन्धान में जिनने सब कुछ भुला दिया ऐसी चिच्छक्ति शिव के साथ विराजमान है । जो योगी इसे जान जाते हैं वे उसके पद को प्राप्त करते हैं । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५१२ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ त्रिपुरोपनिषत् जो ऐसा जानने में असमर्थ हैं वे निष्काम कर्मयोगी जीवन पर श्रीचक्र को अपने वर्ण, आश्रम के अनुरोध से क्षीर आदि द्वारा तृप्त करते हुए समयापन किया करते है और शरीर समाप्ति पर विशाल स्वर्ग पीठ पर (श्रीपुर में) ज्ञान का अभ्यास करते हुए प्रलय तक रहते हैं तदनन्तर त्रिपुर रूप को परम धाम उसमें निवास करते हैं और कृतकृत्य हो जाया करते हैं ॥ ७ ॥ अब मूल विद्या को प्रकट करते हैं—काम अर्थात् ककार, योनि अर्थात् ए कामकजा = ईकार, वज्रपाणि = लकार, गुहा = ह्रींकार, हस = हकार तथा सकार मातरिश्वा = ककार, अभ्र = हकार, इन्द्र = लकार, पुनगुंहा = ह्रींकार, सकलाः = सकार, ककार, लकार, भयिया च = ह्रींकार ये पुरुची विश्वमाता एवं विशिष्ट रूप ये आदि मूल विद्या हैं जिनकी आत्मा ॐकार है ॥ ८ ॥ विरक्तो को आदि विद्या के ज्ञान का फल— मूल विद्या का जो छठा अक्षर 'ह' है वह शिव बीज सातवाँ 'स' शक्ति बीज, वह्नि सारथि अर्थात् 'क' कामेश बीज एवं शिवसम्पुटित शक्ति बीज है। इसी प्रकार इस आदि विद्या का 'ह-स-क' ये तीन मूला- क्षर वाणी के पांशु रूप में जप करते हुए शब्द स्पर्शहीन कालदर्शी सर्वज्ञ को अपने अतिरिक्त सब कुछ नहीं ऐसा जानकर, व्यष्टि समष्टि रूप जो प्रपंच कल्पक, अथवा अपने अतिरिक्त जीव, शिव, तत्कल्पनीय, व्यष्टि समष्टि प्रपंच समूह नहीं है ऐसा जानते हुए कामेश्वर ईश्वर को तुष्ट करते हुए योगी अमृतत्व की प्राप्ति कर लेते हैं ॥ ६ ॥ भक्तानुग्रह के लिए जो ऐसे रूप धारण किया करती है उसका ध्यान करके ही अपने-अपने स्वभाव के अनुसार योगी फल प्राप्त करते हैं। वह 'पुरमेकादशद्वारम्' इस श्रुति के आधार पर पुर = यानी स्वाविद्या- पद तथा उसका कार्यकलाप, रूप धारण करती है। अपिच 'ह-स-क' ये हृन्त्रीमुख = आदिविद्या सार रूप को धारण करती है। सूर्य की रेखा अर्थात् 'ईं ओं' ये जो स्वर मध्य हैं वह रूप भी Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

.त्रिपुरोपनिषत् ] [ ५१३ यह धारण करती है। वृहत्तिथि—निमेष से लेकर कल्पान्त जो काल विशेष, पञ्चदशादिनित्या = पन्द्रह तिथियां, वार, नक्षत्रादि रूप, नित्य देवता भाव को प्राप्त पन्द्रह तिथियों के साथ वृहत्तिथिरूप सोलवें सहित पूर्वोक्त पहले बताये पुरमध्य = स्व अविद्यापद, आरोप आधार, ईश्वर रूप भी यही धारण करती हैं । इस प्रकार देवताओं के जिन स्वरूपों में जिस-जिस का मन लगता है उसी के आश्रय से चित्त शुद्धि द्वारा वह कृतकृत्य हो जाता है ॥१०॥ इन रूपों का ध्यान करने में अशक्तों के लिए अब ध्यानान्तर कहा जाता है = अथवा रवि, चन्द्र आदि के मण्डल से उत्पन्न, स्तन बिम्ब, एक मुख नीचे की ओर इस प्रकार उपलक्षित सर्वाङ्ग, सुन्दरी को देहत्रय रूप गुहा में स्थित परमेश्वर की कला कामरूप चिच्छक्ति का ध्यान करके मनुष्य कामना परिपूर्ण करके अपनी इच्छानुसार कामरूप हो जाता है। किन्तु काम्यफल जन्मादि का कारण होता है अतः त्रैवर्णिक मोक्षे- च्छुकों को काम्योपासना नहीं करनी चाहिए ॥११॥ इसी प्रकार अपने-अपने वर्णानुसार शूद्र आदि भी विधिवत् अपने भोज्यपदार्थों में आत्मोपभोग बुद्धि को छोड़कर प्रथम महानता का अर्पण कर तथा प्रसाद रूप लेकर पुण्यलोक में सिद्धि प्राप्त करते हैं ॥१२॥ इस प्रकार न करने वाले विषयासक्त अनेक इच्छाओं से भरे हुए मनुष्यों को सरस्वती विश्वमाता लक्ष्मी के सहित आदि शक्ति जो अरुणा अर्थात् गौरी वह ब्रह्ममात्र विद्या होकर उनका उपसंहार करती है उनसे सिद्धियों को छिपाती है, उन्हें नहीं देती, अपितु अज्ञान पाशों द्वारा बांधकर उन्हें संसार के महागर्त ( गड्ढे ) में डाल देती है और वह जन्म जन्मान्तरों इसी आवर्त्त में घूमते रहते हैं ॥१३॥ जो निष्काम बुद्धि से चिच्छक्ति का ध्यान करते हैं वह भी कृत- कृत्य हो जाते हैं। सकाम, निष्काम, जो भक्त समूह प्रवृत्ति निवृत्ति की प्रर्वतिका जो चिच्छक्ति तथा भग अर्थात् ऐश्वर्य, विद्या, यश, श्री, ज्ञान वैराग्ययुक्त जो भगवान् काम व ईश कामेश्वर वे दोनों चिद् सामान्यात्मा-

५१४ ] [ त्रिपुरोपनिषत् के कारण सम प्रधान समान, शक्ति वाले, समान ओज वाले देव इसी जन्म में जिन निष्कामों को दृष्टिगोचर हो जाया करते हैं उन्हें वह ब्रह्म पद के दाता हो जाया करते हैं। उन दयालु शिव व शक्ति के मध्य त्रिविध शरीर से विलक्षण जराहीन विश्वमाता शक्ति है ॥१४॥ जो कि निष्काम बुद्धि से अपने उपासकों की भावनाओं द्वारा ज्ञान, विज्ञान, सम्यग् ज्ञान रूप हवि से तृप्त होकर अपने भक्तों पर प्रसन्न हो विक्षेप रूपी आवरण के गल जाने पर शिव के साथ अपने उपासक की आत्मस्वरूप बनकर अवशिष्ट रह जाती है। इस प्रकार उपासक अपनी अज्ञ दृष्टि द्वारा कल्पित प्रपञ्च के उन्मनस्क होकर, सारे विश्व के जो उत्पादक, पालक एवं संहारक हैं उन शिव में विश्वरूपता का आपादन कर लेता है ॥१५॥ इस प्रकार जो यह महोपनिषत् इसे ऋक् आदि चार वेद और अन्य चौसठ जो कलायें (विद्यायें) जिस अक्षय संविद् रूप को उदार वाणी (शब्दों) द्वारा गाया करते हैं इत्थं भूत यह ब्रह्म विद्या ब्रह्ममात्र पर्यसन्न (ब्रह्म साक्षात्कार जिसका अन्तिम तत्व है) सर्वोत्कृष्ट है ॥१६॥ इसका शरीर 'ॐ ह्रीं मों ह्रीम्' एतद् रूप है। अर्थात् चिद् एवं चिच्छक्ति रूप है ॥ १७ ॥ ॥ त्रिपुरोपनिषद् समाप्त ॥ ―०―०―

सीतोपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्तिपाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिए जो आयुष्य नियत कर दिया है, उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शान्ति, शान्ति, शान्ति ॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन् का सीता किं रूपमिति ॥१ स होवाच प्रजापतिः सा सीतेति— मूलप्रकृतिरूपत्वात् सा सीता प्रकृतिः स्मृता । प्रणवप्रकृतिरूपत्वात् सा सीता प्रकृतिरुच्यते ॥२ सीता इति त्रिवर्णात्मा साक्षान्मायामया भवेत् । विष्णुः प्रपञ्चबीजं च माया ईकार उच्यते ॥३ सकारः सत्यममृतं प्राप्तिः सोमश्च कीर्त्यते । तकारस्तारलक्ष्म्या च वै राजामृतकरः स्मृतः ॥४

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सीतोपनिषत् ५१६ ] ईकाररूपिणी सोमाऽमृतावयव दिव्यलङ्कारसङ् मौक्तिका- द्याभरणालंकृता महामायाऽव्यक्तरूपिणी व्यक्ता भवति ॥५॥ प्रथमा शब्दब्रह्मयी स्वाध्यायकाले प्रसन्ना । उद्भूवा नरकात्मिका द्वितीया भूतले हलाग्रे समुत्पन्ना । तृतीया ईकार- रूपिणी अव्यक्तस्वरूपा भवतीति सीता इत्युदाहरन्ति शौनकीये ॥ ६ ॥ एक समय की बात है प्रजापति ब्रह्माजी से देवताओं ने प्रश्न किया—'भगवन् ! सीताजी का रूप कैसा है, वे कौन हैं यह हमारे प्रति कहिये ।' । १ । तब वे प्रजापति ब्रह्माजी कहने लगे—'सीताजी शक्ति रूपिणी हैं। मूल प्रकृति होने से वे ही प्रकृति कही जाती हैं। प्रणव की प्रकृति रूपा होने से भी उन्हें प्रकृति कहते हैं।' । २ । वे साक्षात् योगमाया ही हैं। उनका सीता नाम तीन वर्णों का है। सम्पूर्ण विश्व प्रपंच के बीज भगवान् विष्णु हैं। उनकी योगमाया का रूप ईराक हैं। ॥ ३ ॥ 'स' कार को सत्य, अमृत, सिद्धि, चन्द्र तथा प्राप्ति का वाचक कहते हैं। दीर्घ अकारयुक्त 'त' कार विस्तार करने वाला एवं महालक्ष्मी रूप वाला कहा है। ईराक वाली अव्यक्त महामाया अपने अमृतमय अवयवों और दिव्याभूषणों से विभूषित रूप से व्यक्त होती हैं । ५ । वे त्रयरूपा अपने प्रथम रूप में शब्दब्रह्म से युक्त हैं । वे प्रसन्न होकर बुद्धि रूप से बोध देने वाली हैं। वे अपने द्वितीय रूप में जब इस भूतल पर व्यक्त हुईं तब जनक की यज्ञ भूमि में हल के अग्र भाग से प्रकट हुईं । उनका तृतीय रूप ईकारमय एवं अव्यक्त है। यही तीन रूप पर्याप्त रूप से सीता कहे गए हैं। शौनकीय तन्त्र में कहा है । ६ । श्रीरामसान्निध्यवशाज्जगदाधारकारिणी । उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणी सर्वदेहिनाम् ॥७ सीता भवति ज्ञेया मूलप्रकृतिसंज्ञिता

सीतोपनिषत् [CO. In Public Domain. Digitization by eGangotri[ ५१७ प्रणवत्वात् प्रकृतिरिति वदन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ इति ॥८ अथातो ब्रह्मजिज्ञासेति च ॥ ९ ॥ सेयं सर्ववेदमयी सर्व- देवमयी सर्वलोकमयो सर्वकीर्तिमयी सर्वधर्ममयी सर्वाधारकार्य- कारणमयी महालक्ष्मीर्देवेशस्य भिन्नाभिन्नरूपा चेतनाचेतना- त्मिका ब्रह्मस्थावरात्मा तद्गुणकर्मविभागभेदाच्छरीररूपा देवर्षि- मनुष्यगन्धर्वरूपा असुरराक्षसभूतप्रेतपिशाचभूतादिभूतशरीर- रूपा भूतेन्द्रियमनःप्राणरूपेति विज्ञायते ॥ १० ॥ श्रीराम के नित्य सान्निध्य के कारण सीताजी विश्व का कल्याण करने वाली हैं। वे ही सब प्राणियों की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश करती हैं। ७। वही मूल प्रकृति के रूप में प्रसिद्ध षडैश्वर्य से युक्त भगवती हैं। प्रणवस्वरूपा होने से ब्रह्मवेत्ता उन्हें प्रकृति कहते हैं। ८। वे सीताजी सर्वदेवता स्वरूपा, सर्ववेद-रूपिणी, सर्वलोकमयी, सबकी आश्रयभूता, सर्व कीर्तियों से सम्पन्न, सर्वधर्म-सम्पन्न, सभी पदार्थों और जीवों की आत्मा, सब देव-गन्धर्व, मनुष्य आदि प्राणियों की स्वरूपभूता हैं। वे सभी प्राणियों की देहरूपा और समस्त विश्वरूपा महालक्ष्मी हैं। वे भगवान् से भिन्न और अभिन्न भी कही जाती हैं ॥६-१०॥ सा देवी त्रिविधा भवति शक्त्यात्मना इच्छाशक्तिः क्रिया- शक्तिः साक्षाच्छक्तिरिति ॥ ११ ॥ इच्छाशक्तिस्त्रिविधा भवति श्रीभूमिनीलाऽऽत्मिका भद्र- रूपिणी प्रभावरूपिणी सोमसूर्याग्निरूपा भवति ॥ १२ ॥ सोमात्मिका ओषधीनां प्रवति कल्पवृक्षपुष्पफललता- गुल्मात्मिका औषधभेषजात्मिका अमृतरूपा देवानां महस्तोम- फलप्रदा अमृतेन तृप्तिं जनयन्ती देवानामन्नेन पशूनां तृणेन तत्तज्जीवानाम् ॥ १३ ॥ सूर्यादिसकलभुवनप्रकाशिनी दिवा रात्रिः कालकलानि- Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

५१८ ] सीतोपनिषत् मेषमारभ्य घटिकाऽष्टयाम दिवसवाररात्रिभेदेन पक्षमासर्त्वयन- संवत्सरभेदेन मनुष्याणां शतायुःकल्पनया प्रकाशमाना चिरक्षि- प्रव्यपदेशा निमेषमारभ्य परार्धपर्यन्तं कालचक्रं जगच्चक्रमित्यादि- प्रकारेण चक्रवत् परिवर्तमाना। सर्वस्यैतस्यैव कालस्य विभाग- विशेषाः प्रकाशरूपाः कालरूपा भवन्ति ॥ १४ ॥ अग्निरूपा अन्नपानादि प्राणिनां क्षुत्तृष्णाऽऽत्मिका देवानां मखरूपा वनौषधीनां शीतोष्णरूपा काष्ठेष्वन्तर्बहिश्च नित्यानित्य- रूपा भवंति ॥ १५ ॥ 'वे शक्तिरूपिणी होकर इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और साक्षात् शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं। उनकी इच्छाशक्ति से युक्त स्वरूप भी तीन प्रकार का है ॥ ११ ॥ श्रीदेवी, भूदेवी, नीलादेव के रूप में वे मंगळरूपिणी, प्रभारूपिणी तथा चन्द्र, सूर्य, अग्नि रूप में अत्यन्त तेज- मयी होती हैं। १२। वे चन्द्ररूपिणी होकर ओषधियों को पुष्ट करती हैं। वे कल्पवृक्ष, लता, गुल्म, पुष्प, पत्र, फल तथा ओषधियों-महोपधियों के स्वरूप को प्रकट करने वाली हैं। उसी चन्द्ररूप में देवताओं को 'महस्तोम' यज्ञ का फल देती हैं। अन्न द्वारा प्राणियों को और अमृत द्वारा देवताओं को वे ही तृप्त करती हैं ॥ १३ ॥ 'वे ही सब लोकों को प्रकाशित करती हैं। दिवस, रात्रि, निमेष, घड़ी, पक्ष, मास, ऋतु, अयन और सम्वत्सर आदि के भेद से मनुष्य को शतायु प्रदान करती हुई स्वयं प्रकाशित होती हैं। निमेष से परार्ध तक तथा 'विलम्ब और शीघ्रता के भेद से परिपूर्ण कलाचक्र तथा जगत् चक्रादि के भेद से काल के सभी अङ्ग-प्रत्यङ्ग उन्हीं के स्वरूप है। इसीलिए वे प्रकाशस्वरूपा और कालस्वरूपा हैं ॥ १४ ॥ 'वे अग्निरूप वाली होकर प्राणियों को अन्न-जल आदि के सेवन एवं पान करने के निमित्त भूख-प्यास रूप से, देवताओं को मुख रूप से,