१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् [ ५०७ है । वहां धूम्रशिखा रूप का चिन्तन करे । वहां जालंधर पीठ है, जिसकी उपासना से मोक्ष मिलती है । इसलिए इसे परब्रह्म चक्र भी कहा गया है । नौवां चक्र आकाश चक्र है । वहां सोलह दल वाला कमल ऊपर की ओर मुख वाला है । उसकी मध्य कर्णिका त्रिगुणों की जननी होने से तीन शिखरों वाले पर्वत के आकार की बताई गई है । उसके मध्य ऊपर की ओर झुकी हुई शक्ति है, उसका अवलोकन करते हुए चिन्तन करे । वहीं पूर्ण गिरि पीठ है, उसकी उपसना से सब कामनायें सिद्ध होती हैं ॥ २-६ ॥ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषदं नित्यमधीते सोऽग्निपूतो भवति स वायूपूतो भवति स सकलधनधान्यसत्पुत्रकलत्रहयभूगजपशुमहिषी- दासीदासयोगज्ञानवान् भवति न स पुनरावर्तत इत्युपनिषत् ।१०। जो इस सौभाग्यलक्ष्मी उपनिषद् का नित्य पाठ करता है, वह अग्निपूत और वायूपूत होता हैं । वह सब धन, धान्य, स्त्री, पुत्र, हाथी, अश्व, गौ, भैंस तथा भृत्यादि युक्त ऐश्वर्य से सम्पन्न ज्ञानी होता हैं तथा अन्त में परम पद को प्राप्त होकर वहां से फिर नहीं लौटता ॥ १० ॥ ॥ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् समाप्त ॥