भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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५०६ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् न हो तब तक भभकती हुई ज्वाला के रूप में उसका ध्यान करे। भगवती त्रिपुरा का कामरूप पीठ नामक स्थान वहीं है। उसकी अर्चना के द्वारा सभी भोगों की प्राप्ति हो सकती है। यह आधार नाम वाले प्रथम चक्र के सम्बन्ध में कहा गया ॥ १ ॥ षट्दल पद्म का स्वाधिष्ठान चक्र दूसरा है। उस छः दल के कमल के कर्णिका पृष्ठ में एक लाल वर्ण के शिवलिंग का पश्चिमाभिमुख चिंतन करे। वहाँ उड्यान पीठ है उसकी उपासना विश्व आकर्षण की सिद्धि प्राप्त कराने वाली है। तृतीय नाभिचक्र टेढ़ा, सर्पाकार तथा पांच घेरों वाला है। उस चक्र में करोड़ों बालसूर्यों की-सी ज्योति वाली तथा तड़ित् के समान कृशांग कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करे। जाग्रत होने पर यह शक्ति अत्यन्त सामर्थ्य वाली होती है तथा सब सिद्धियां देती हैं। मणिपूरक चक्र आठ दल वाले कमल के आकार का तथा निम्नमुख रहता है यही हृदय चक्र है। इसमें ज्योतिर्मय लिंग का चिंतन करे। वह ज्योतिर्मय लिंग हंसकला नाम से सर्वप्रिय है। उसकी जागृति पर सर्व- लोक वश करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है। कण्ठ में एक चार अंगुल प्रमाण का चक्र है। उसमें बायीं ओर इडा और दायीं ओर पिंगला नाड़ी है। इन दोनों के मध्य श्वेतवर्ण वाली सुषुम्णा नाड़ी का चिन्तन करे। इसे जानने वाले को अनाहत चक्र सिद्धि देने वाला है। इससे आगे जो तालुचक्र है उसमें अमृत की धार निरन्तर बहती रहती है। इस तालुचक्र में दस-बारह दल होते हैं। आगे दाँतों की जड़ तक विस्तृत हुआ जो चक्र के आकार का छिद्र है उसमें तालुचक्र है। उसमें शून्य का ध्यान करे ऐसा करने से चित्त शून्यरत्त होता है। अँगूठे के परिणाम का सातवां भूचक्र है। उसमें निवात दीप शिखा के आकार वाले ज्ञान नेत्र का चिन्तन करे। इस चक्र के जाग्रत होने पर कपाल-रन्ध्र और उमसे सम्बन्धित विषयों का ज्ञान मिलता है। आठवां आज्ञाचक्र है, वही ब्रह्म- रन्ध्र कहा जाता है। उस रन्ध्र का परिणाम सुई की नोंक के समान