१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५१० ] [ त्रिपुरोपनिषत् 'अथ तत ऊर्ध्वं उदेता' अथ यदतः परो दिवो 'ज्योतिर्दीत्यते' 'ज्योतिर्ज्वलति ब्रह्माहमस्मि' इत्यादि श्रुति ( वेदऋचा ) के अनुरोध से पराक् प्रपञ्च रूप इन्धन (लकड़ी) का आश्रय लेकर ऊर्ध्वं (ऊपर) की ओर जलने वाली, प्रकाशित होने वाली प्रत्यग् ज्योति ही पराग् वृत्ति के उदय होने से पहले सदा अनुभूत होती है ( हुई है ) उसके वैपरीत्य से तिरश्चीन अर्थात् पराग् रूप जो सत्य रज तम वह अपने अधीनस्थ पराग् भाव को छोड़कर, अजर (जराहीन) ब्रह्म हुआ (हो जाया करता) है । इस प्रकार 'अहं ब्रह्मास्मि' अर्थात् ब्रह्म से अभिन्न अपने को मान कर अपने अतिरिक्त संसार में कुछ न देखता हुआ (योगी) परम प्रसन्न होता है, आनन्दित होता है, परमप्रकाश का युञ्जमोद ( प्रसन्नता ) स्वरूप जो इन्दुरूप ज्योति उससे भिन्न अन्य कुछ भी नहीं वही मैं हूँ, ये जो खण्ड मण्डलाकार, अखण्ड सविकल्प निर्विकल्प वृत्तियां हैं ये मुझे जो कि मैं ब्रह्म भावापन्न हूँ ब्रह्मरूप हो चुका हूं, अलंकृत करती हैं। वे सब भी स्वयं ब्रह्म में लीन हो जाती हैं । तत्र परमात्मा अद्वैत रूप से स्थित हो जाया करता है ॥ ४ ॥ जो पुनः ये तीन रेखायें अर्थात् जड़-क्रिया, ज्ञान इच्छा शक्ति हैं जो जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति व तुरीय स्थान हैं, लोचन कण्ठ हृदय, सहस्रार- चक्र हैं एव' भूः भुवः स्वः तीन लोक हैं, स्वर्ग हैं, एवं तम आदि गुण और एक-एक गुण के पुनः तम रूप इत्यादि भेद से तीन प्रकार हैं ये सब जिस का आश्रय लेकर स्थित हैं वह इन सब के पूरक प्रधान देव आदि विद्या, तदङ्ग देवता मन्त्र प्रतत (श्री चक्र) मध्य त्रिकोणरूप कामिनी ( स्त्री ) जो चिच्छक्ति उसके साथ रहने वाले बिन्दु रूपी मदन ( कामेश्वर ) प्रधान रूप से विद्यमान हैं, शोभित हैं ॥ ५ ॥ मदन्तिका मानिनी मंगला च सा सुन्दरी सिद्धिमद्या । लज्जा मतिस्तुष्टिरिष्टा च पुष्टा लक्ष्मीरुमा ललिता लालपन्ती ॥६ इमां विज्ञाय सुधया मदन्ती परिस्रुता तर्पयन्तः स्वपीठम् । नाकस्य पृष्ठे महतो वसन्ति परं धाम त्रैपुरं चाविशन्ति ॥७