भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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त्रिपुरोपनिषत् CC0 In Public Domain. Digitization by eGangotri [ ५०६ जो अपनी अज्ञ दृष्टि द्वारा कल्पित व्यष्टि, समष्टि भेद से युक्त स्थूल व सूक्ष्म कारण वाले तीन पुर हैं, एवं जो देवयान पितृयान आदि भेद से, कर्मोपासना ज्ञानकाण्ड से, ज्ञान, विज्ञान, सम्यग् ज्ञान के भेद से विकल्पित जो तीन रास्ते हैं, साथ ही 'अकथादि श्रीपीठ' इत्यादि श्रुति के अनुरोध से इस श्रीचक्र में जो अ से लेकर क्ष पर्यन्त के अक्षर सन्निविष्ट हैं, इन पुरों, इन पथों इन अक्षरों को जीवेश प्रत्यक् पर आत्मा से अधि- ष्ठित करके महा महिमामय अर्थात् सृष्टि निर्माण की सामर्थ्यरूपिणी स्थूल आदि जो तीन शरीर उनसे विलक्षण जराहीन महान् कोई चिरंतन चिद् शक्ति सर्वोत्कृष्ट रूप से विराजमान है, वही सर्वोत्तम है ॥ १ ॥ • जिसका आश्रय लेकर वयोनियां अर्थात् महात्रिपुरसुन्दरी आदि शक्तियाँ, सर्वान-दमय आदि नौचक्र, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, सहयोग भेद से नौ योग तथा नौ चक्रों के अन्दर रहने वाली नौ योगनियां प्रकाशित होती हैं। नौ जो देवताओं की आधार भूमियां उनके चक्राधिनाथ तथा प्रतिहारिणियां कामेश्वरी आदि मद्रायें तथा योनि आदि नौ मुद्रायें भी इसी पर आश्रित हैं। इसके ही आश्रय से प्रकाशित होती हैं। ऐसी यह प्रधान रूपा एक ही थीं और वही यह नवभद्र आदि रूप में थीं और पांच ज्ञानेन्द्रियां पांच कर्मेन्द्रियां पांच प्राण तथा अन्तः करण चतुष्टय (चार) भेद से जो उन्नीस तत्व समूह है उससे उत्पन्न जो शक्तियां उनके स्वरूप में भी यही थीं। साथ ही दस इन्द्रियां, पाँच प्राण, चार अन्तःकरण, पाँच महाभूत, पाँच उपप्राण के भेद से जो उन्तीस तत्व ग्राम उनसे उत्पन्न जो शक्तियाँ उनके रूप में भी यहीं थीं, और इसी प्रकार अन्तःकरण चतुष्टय सहित जो चौदह इन्द्रियां, तीन कर्म विक्षेपादि चार गुण प्रभृति जो चालीस शक्तियाँ है, तद्रूप में भी यही विद्यमान थीं। सो क्रिया, ज्ञान व इच्छात्मक ज्ञान, विज्ञान, सम्वग्ज्ञान रूप तीन शक्तियाँ (जो कि इसी चिद् शक्ति के रूप है) अपने पुत्र की हित कामना वालो माता के समान मुझे ब्रह्म पदवी की प्राप्ति के लिए प्रेरित करें, मेरे में प्रविष्ट हों, स्थित रहें । ३ । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi