१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
सरस्वतीरहस्योपनिषद् ] [ ४७६ जो सरस्वती ब्रह्मा के मुख-कमल रूप वन में राजहंस के समान विचरण करती हैं, वे श्वेत कान्ति और अंगवाली देवी हमारे मन रूपी हृदय में नित्य रमण करें। हे काश्मीरपुर वासिनी शारदे ! मैं नित्य तुम्हारी स्तुति करता हूँ। मुझे विद्या-दान दो। तुम्हें नमस्कार है। तुम अपनी चार भुजाओं में अक्षसूत्र, अंकुश, पाश और पुस्तक धारण करने वाली हो। तुम्हारे हृदय देश पर मुक्ताहार सुशोभित रहता है। तुम सदा मेरी वाणी में निवास करो। तुम्हारी ग्रीवा शंख के समान सुन्दर और लाल ओष्ठ हैं तथा तुम विभिन्न आभूषणों से अलंकृत हो। तुम मेरी जिह्वा के अग्रभाग में प्रतिष्ठित होओ। भक्तों की जिह्वा के अग्रभाग में निवास कर उन्हें शम दम प्रदान करने वाली वे सरस्वती श्रद्धा, धारणा और मेधा स्वरूपिणी तथा ब्रह्माजी की प्रियतमा हैं। चन्द्रकला से विभूषित केश-पाश वाली तथा संसार-बन्धन को काटने वाली अमृत जलयुक्त नदी रूपिणी भगवती सरस्वती को मैं नमस्कार करता हूँ। जो कवित्व, भोग, निर्भयता अथवा मोक्ष की इच्छा करता हो वह इन दशों मन्त्रों के द्वारा भगवती सरस्वती की भक्ति पूर्वक पूजा-स्तुति करे। भक्ति और श्रद्धा सहित विधिपूर्वक पूजा कर नित्य स्तुति करने वाला भक्त छः मास में ही उनकी कृपा को प्राप्त कर लेता है। इसके अनन्तर गद्य-पद्य से निहित सुन्दर शब्दों वाली वाणी उसके मुख से स्वयं ही उद्भूत होने लगती है। सरस्वती की भक्ति करने वाला कवि दूसरों से सुने बिना ही ग्रन्थों के अर्थों का समझने वाला होता है। हे विप्रो ! भगवती सरस्वती ने ही अपनी भक्ति के इस प्रभाव को अपने श्री मुख से कहा था। ब्रह्माजी के द्वारा ही पुरातन आत्मविद्या को प्राप्त कर सका और अब में सच्चिदा- नन्द रूप वाले नित्य ब्रह्मत्व से सम्पन्न हूँ ॥३६-४६॥ प्रकृतिवत्वं ततः सृष्टं सत्त्वादिगुणसाम्यतः । सत्यामाभाति चिच्छाया दर्पणे प्रतिबिम्बवत् ॥४७ तेन चित्प्रतिबिम्बेन त्रिविधा भाति सा पुनः ।
४८० ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत्
प्रकृत्यवच्छिन्नत या पुरुषत्वं पुनश्च ॥४८ शुद्धसत्त्वप्रघादायां मायायां बिम्बितो ह्यजः । सत्त्वप्रधाना प्रकृतिर्मयेति प्रतिपाद्यते ॥४९ सा माया स्ववशोपाधिः सर्वज्ञस्येश्वरस्य हि । वंश्यमायत्वमेकत्वं सर्वज्ञत्व च तस्य तु ॥५० सात्त्विकत्वात् समष्टित्वात् साक्षित्वाज्जगतामपि । जगत् कर्तुमकर्तुं वा चान्यथा कर्तुमीशते । यः स ईश्वर इत्युक्तः सर्वज्ञत्वादिभिर्गुणैः ॥५१ शक्तिद्वयं हि मायाया विक्षेपा वृतिरूपकम् । विक्षेप शक्तिर्लिङ्गादि ब्रह्माण्डान्तं जगत् सृजेत् ॥५२ अन्तर्दृग्दृश्योर्भेदं बहिश्च ब्रह्मसर्गयोः । आवृणोत्यपरा शक्तिः सा संसारस्य कारणम् ॥५३ साक्षिणः पुरतो भातं लिङ्गदेहेन संयुतम् । चितिच्छायासमावेशाज्जीवः स्याद्व्यावहारिकः ॥५४ अस्य जीवत्वमारोपात् साक्षिण्यप्यवभास्ते । आवृत्तौ तु विनष्टायां भेदे भातेऽपयाति तत् ॥५५ तथा सर्गब्रह्मणोश्च भेदमावृत्य तिष्ठति । या शक्तिस्तद्वशाद्ब्रह्म विकृतत्वेन भासते ॥ . ६ अत्राप्यावृत्तिनाशे न विभाति ब्रह्मसर्गयोः । भेदस्तयोर्विकारः स्यात् सर्गे न ब्रह्मणि क्वचित् ॥५७ अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् । आद्यं त्रयं ब्रह्मरूप जगद्रूपं ततो द्वयम् । उपेक्ष्यं नामरूपे द्वे सच्चिदानन्तत्परः ॥५८
सरस्वतीरहस्योपनिषत् ] [ ४८१ फिर सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों की समानता से प्रकृति रची गई। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखाई देता है वैसे ही प्रकृति में चेतन का प्रतिबिम्ब सत्य के समान लगता है। उस चेतन के प्रतिबिम्ब से प्रकृति तीन प्रकार की लगती है । प्रकृति के योग से ही तुम्हें यह देह मिला है। सत्व गुण की प्रधानता वाली प्रकृति माया कही जाती है। उस माया में प्रतिबिम्बित चेतन ही अजन्मा है। यह माया सब के जानने वाले ब्रह्म की आज्ञाकारिणी उपाधि है। माया को अपने वश में रखना, अद्वितीय और सर्वज्ञ होना यही ब्रह्म के मुख्य लक्षण हैं। यह ब्रह्म सब लोकों के साक्षी स्वरूप होने के कारण संसार की रचना करने, न करने तथा उससे भी भिन्न कार्य करने में पूर्ण समर्थ हैं। विशेष और आवरण माया की यह दो शक्तियां कही गई हैं। विशेष रूप शक्ति लिंगदेह से ब्रह्माण्ड पर्यन्त सभी संसार की रचना करती है। आवरण शक्ति द्रष्टा और दृश्य के अन्तर को तथा ब्रह्म और सृष्टि के अन्तर को ढकने वाली है। साक्षी को वह लिंग-देह वाली प्रतीत होने से बन्धन के देने वाली है। चेतन का प्रतिबिम्ब जब कारण रूपा प्रकृति में निहित होता है तब विश्व में कार्यकारी जीव की उत्पत्ति होती है। आरोपित होने से उसका जीवत्व साक्षी रूप ब्रह्म में भी परिलक्षित होता हैं। आवरण-शक्ति के हट जाने पर भेद का स्पष्ट रूप से आभास होने लगता है और जीवत्व की स्थिति समाप्त हो जाती है। सृष्टि और ब्रह्म के भेद को आवृत करने वाली शक्ति के वशीभूत हुआ ब्रह्म विकारयुक्त प्रतीत होता है। आवरण के हटते ही ब्रह्म और सृष्टि के भेद की प्रतीति होने लगती है। परन्तु विकार की स्थिति ब्रह्म में नहीं होती, सृष्टि में ही होती है। अस्ति, भांति, प्रिय. रूप और नाम इन पांच अंशों में से प्रथम तीन तो ब्रह्म के स्वरूप हैं और नाम, रूप यह दोनों ही विश्व रूपार्थक हैं। दोनों से सम्बन्धित हो जाने पर ही ब्रह्म इस विश्व के रूप में स्थित होता है ।।१६-५०।।
४८२ ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् समाधिं सर्वदा कुर्याद्धृदये वाऽथ वा बहिः ॥५८ सविकल्पो निर्विकल्पः समाधिर्द्विविधो हृदि । दृश्यशब्दानुभेदेन सविकल्पः पुनर्द्विधा ॥६० कामाद्याश्चित्तगा दृश्यास्तत्साक्षित्वेन चेतनम् । ध्यायेद्दृश्यानुविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥६१ असङ्गः सच्चिदानन्दः स्वप्रभो द्वैतवर्जितः । अस्मीतिशब्दविद्धोऽयं समाधिः सविकल्पकः ॥६२ स्वानुभूतिरसावेशाद्दृश्यशब्दद्यपेक्षितुः । निर्विकल्पसमाधिः स्यान्निवातस्थितदीपवत् ॥६३ हृदि वा बाह्यदेशेऽपि यस्मिन् कस्मिंश्च वस्तुनि । समाधिराद्यः सन्मात्रान्नामरूपपृथक्कृतिः ॥६४ स्तब्धीभावो रसास्वादात् तृतीयः पूर्ववन्मतः । एतैः समाधिभिः षड्भिर्नयेत् कालं निरन्तरम् ॥६५ देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र परामृतम् ॥६६ भिद्यते हृदयग्रन्थिश्च्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्प कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥६७ मयि जीवत्वमीशत्वं कल्पितं वस्तुतो न प । इति यस्तु विजानाति स मुक्तो नात्र संशयः ॥ इत्युपनिषत् ॥६८ साधना करने वाला पुरुष बाह्याभ्यांतरिक रूप से सदा ही समाधिरत रहे। हृदय में सविकल्प और निर्विकल्प इन दो प्रकारों की समाधि होती है। सविकल्प समाधि के भी दो रूप हैं दृश्यानुविद्ध और शब्दानुबिद्ध। चित्त में जो कामादि विकारों की उत्पत्ति होती है, वे सब विकार दृश्य हैं और चेतन आत्मा उनके साक्षी रूप में है। यही
सरस्वतीरहस्योपनिषत् ] [ ४८३ दृश्यानुविद्ध सविकल्प समाधि कही गई है । शब्दानुविद्ध सविकल्प समाधि वह है जिसमें साधक सोचता है कि मैं अद्वैत स्वरूप हूँ, सङ्ग- रहित और स्वयं प्रकाश हूँ। मैं ही सच्चिदानन्द हूँ। आत्म रूप में अनुभव किये जाने वाले रस के आवेश से दृश्य और शब्द की उपेक्षा वालें साधक का हृदय निर्विकल्प समाधि का अनुभव करता है। जैसे वायु-रहित स्थान में रखा हुआ दीपक अविचल रूप से प्रकाशित होता रहता है, वैसे ही साधक की स्थिति रहती है। यह हृदय के भीतर होने वाली समाधि के ही दो रूप कहे हैं। इसी प्रकार बाहर भी किसी वस्तु विशेष के प्रति चित्त में एकाग्रता होने पर समाधि लग जाती है। दृष्टा और दृश्य के विवेक से प्रथम प्रकार की समाधि लगती है और जिसमें प्रत्येक वस्तु से उसके नाम रूप का पृथक्करण होने पर उसके आश्रयभूत चेतन का चिन्तन होता है, वह द्वितीय प्रकार की समाधि कही गई है। जिसमें चैतन्य रस की अनुभूति से उत्पन्न हुए आवेश से स्तब्धता की स्थिति हो, वह तीसरे प्रकार की समाधि है। इन समाधियों में ही अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए। शारीरिक अभिमान नष्ट होकर परमात्म-तत्व का ज्ञान होने पर मन जहां-जहां पहुँचता है, वहीं वह श्रेष्ठ अमृतत्व के अनुभव द्वारा सुखी होता है। उस समय सभी संशय मिट जाते और हृदय-ग्रन्थियां खुल जाती हैं। उस कलायुक्त तथा कला-रहित ब्रह्म के साक्षात्कार से सभी कर्मों का क्षय हो जाता है। जो मनुष्य जीवत्व और ईश्वरत्व के भेद को यथार्थ नहीं मानता, वही मुक्त पुरुष है इसे सत्य समझना चाहिए ॥ ५६—६८ ॥ ॥ सरस्वतीरहस्योपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri देव्युपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः॥ स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ शान्तिपाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥ सर्वे वै देवा देवीमुपतस्थुः काऽसि त्वं महादेवि ॥१ साऽब्रवीदहं ब्रह्मस्वरूपिणी । मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगच्छून्यं चाशून्यं च । अहमानन्दानानन्दाः । विज्ञानाविज्ञाने- ऽहम् । ब्रह्माब्रह्मणी वेदितव्ये । इत्याहाथर्वणी श्रुतिः ॥२॥ अहम् पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि । अहमखिलं जगत् । वेदो- ऽहमवेदोऽहम् । विद्याऽहमविद्याऽहम् । अजाऽहमनजाऽहम् । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक चाहम् ॥३॥ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणावुभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहममश्विः Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi नावुभौ ॥४॥
देव्युपनिषत् [ ४८५ अहं सोमं त्वष्टारं पूषणं भगं दधाम्यहम् । विष्णुमुरुक्रमं ब्रह्माणमुत प्रजापतिं दधामि ॥५ अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते । अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनामहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् ॥६ मम योनिरप्स्वन्तःसमुद्रे य एवं वेद स देवीपदमाप्नोति ॥७ देवी के समीप जाकर सभी देवताओं ने निवेदन किया—'महा- देवि ! अपने सम्बन्ध में बताओ कि तुम कौन हो ?' ॥१॥ देवी ने उत्तर दिया—'मैं ब्रह्म स्वरूपिणी हूँ। यह कार्य-कारण रूप, प्रकृति-पुरुषात्मक विश्व मुझसे ही उत्पन्न हुआ है। मैं आनन्द रूपिणी तथा अ नन्द-रहित रूप वाली हूँ। मैं विज्ञानमयी और अविज्ञान रूप हूँ। मैं ज्ञातव्य ब्रह्म तथा ब्रह्म से परे भी हूँ। मैं पञ्चीकृत अथवा अपञ्चीकृत महाभूत हूँ। दिखाई पड़ने वाला यह सम्पूर्ण विश्व मैं ही हूँ। विद्या-अविद्या, वेद-अवेद, अजा और अनजा मैं ही हूँ। मैं नीचे भी हूँ, ऊपर भी हूँ, अगल-बगल में भी मैं ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं के रूप में संचार करने वाली हूँ। आदित्यों और विश्वेदेवों के रूप में भ्रमण करती रहती हूँ। मैं ही मित्रावरुण, इन्द्राग्नि और अश्विद्वय की पालिका हूँ। सोम, पूषा, भग और त्वष्टा को मैं ही धारण करती हूँ। तीनों लोकों को आक्रान्त करने के उद्देश्य से पदक्षेप करने वाले विष्णु ब्रह्मा और प्रजापति के धारण करने वाली हूँ। देवताओं के लिए हवि- वाहक और सोमाभिषव वाले यजमान के निमित्त हवियुक्त धनों को धारण करती हूँ। मैं उपासकों के लिए धन-दायिनी, ज्ञानवती, यज्ञों में नायिका तथा सम्पूर्ण विश्व की अधीश्वरी हूँ। विश्व के पिता रूप आकाश को परमात्मा के ऊपर मैं ही प्रकट करती हूँ। मेरा स्थान आत्मरूप की धारयित्री बुद्धि वृत्ति में है। इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी पुरुष दिव्य सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ २-७ ॥
४८६ ] [ देव्युपनिषत् ते देवा अब्रुवन्— नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ॥८ तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरां नाशय ये तमः ॥६ देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु ॥१० कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥११ महालक्ष्मीश्च विद्महे सर्वसिद्धिश्च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयान् ॥१२ अदितिरिह जनिष्ट दक्षया दुहिता तव । तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ॥१३ कामो योनिः कामकला वज्रपाणि— गुंहा हसा मातरिश्वाऽभ्रमिन्द्रः । पुनर्गुहा सकला मायया च पुरुच्येषा विश्वमाताऽऽदिविद्योम् ॥१४ एषाऽऽत्मशक्तिः । एषा विश्वमोहिनी पाशांकुशधनुर्वा- णधरा । एषा श्रीमहायिद्या ॥ १५ ॥ य एवं वेद स शोकम् तरति ॥ १६ ॥ नमस्ते अस्तु भगवति भवति मातरस्मान् पातु सर्वतः ॥ १७ ॥ -देवताओं ने कहा—'देवी को नमस्कार ! महान् पुरुषों को भी अपने कर्त्तव्य में प्रवृत्त करने वाली कल्याणकारी महादेवी को सादर नमस्कार है । गुणों से साम्य अवस्था वाली कल्याणी को नमस्कार है। हम उन्हें विधिवत् प्रणाम करते हैं । वे अग्नि के समान तेजोमयी, ज्ञान से प्रकाशमाना, कर्मफल की प्राप्ति के लिए सेव्यमाना एवं दीप्तिमयी
देव्युपनिषत् [ ४८७ भगवती दुर्गा की हम शरण ग्रहण करते हैं। हे दैत्यविनाशिनी देवि ! तुम्हें नमस्कार है। देवताओं द्वारा उत्पन्न वैखरी वाणी का अनेक प्रकार के प्राणी उच्चारण करते हैं। वे कामधेनु के समान सुख देने वाली तथा अन्न, बल दायिनी वाणी रूपा देवी हमारी उत्तम स्तुति से सन्तुष्ट होकर हमारे निकट पधारें। जो वेदों द्वारा स्तुत, काल-नाशिनी, विष्णु शक्ति, सरस्वती, स्कन्दमाता, देवमाता, अदिति अथवा दक्ष-कन्या सती रूप वाली भगवती हैं, उन कल्याणमयी और पापनाशिनी भगवती को हम नमस्कार करते हैं। हम सर्वशक्ति वाली भगवती महालक्ष्मी से परिचित हैं और उनका सदा ध्यान करते हैं। वे देवी हमें अपने विषय विशेष में प्रस्तुत करें। हे दक्ष ! आपकी कन्या अदिति के प्रसूता होने पर अमृतत्व गुण वाले देवताओं की उत्पत्ति हुई। काम, योनि, कमल, वज्री, गुहा, वर्ण, वायु, अभ्र, वज्रपाणि, गुहा, सकलरूप वर्ण एवम् माया यह सब उस जगन्माता की ब्रह्मरूपिणी मूल विद्या है। यह विश्व को विमोहित करने वाली, पाश-अंकुश-धनुष बाण धारिणी परब्रह्म की शक्ति हैं। यही श्री महाविद्या हैं। इस प्रकार जानने वाला पुरुष शोक-सन्ताप से मुक्त हो जाता है। हे जगन्माता ! तुम्हें नमस्कार है। तुम सभी प्रकार से हमारी रक्षा करने वाली बनो ॥ ८-१७॥ सैषाऽष्टौ वसवः । सैषैकादशरुद्रा । सैषा द्वादशादित्याः । सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च । सैषा यातुधाना असुरा रक्षांसि पिशाचा यक्षाः सिद्धाः । सैषा सत्त्वरजस्तमांसि । सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः । सैषा ग्रहनक्षत्रज्योतींषि कलाकाष्ठाऽऽदिकाल- रूपिणी । तामहं प्रणौमि नित्यम् ॥ १८ ॥ तापापहारिणीं देवीं भुक्तिमुक्तिप्रदायिनीम् । अनन्तां विजयां शुद्धां शरण्यां शिवदां शिवाम् ॥१९॥ वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४८८ ] [ देव्युपनिषत् अर्धन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ॥२० एवमेकाक्षरम् मन्त्रम् यतयः शुद्धचेतसः । ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ॥२१ वाङ् मया ब्रह्मभूस्तस्मात् षष्ठम् वक्त्रसमन्वितम् । सूर्यो वामश्रोत्र विन्दुः संयुताष्टतृतीयकम् ॥२२ नारायणेन संयुक्तो वायुश्चाधरसंयुतः । विच्चे नवार्ण कोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥२३ हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् । त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥२४ नमामि त्वामहं देवीं महाभयविनाशिनीम् । महादुर्गप्रशमनीं महाकारुण्यरूपिणीम् ॥२५ यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यतेऽज्ञेया । यस्या जन्तो न विद्यते तस्मादुच्यतेऽनन्ता । यस्या ग्रहणं नोप- लभ्यते तस्मादुच्यतेऽलक्ष्या । यस्या जननं नोपलभ्यते तस्मादु- च्यतेऽजा । एकैव सर्वत्र वर्तते तस्मादुच्यते एका । एकत्र विश्व- रूपिणी तस्मादुच्यते नैका । अत एवोच्यतेऽज्ञेयाऽनन्ताऽलक्ष्याऽ- जैका नैका ॥ २६ ॥' वही यह एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य और अष्ट वसु हैं। वही यह सोमपायी, विश्वदेवा हैं। वही यह यातुधान, दैत्य राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं। वही यह विष्णु और रुद्र रूप वाली तथा सत्व-रज- कला काष्ठादि सहित काल स्वरूपा हैं। भोग और मोक्षदायिनी पाप- नाशिनी, विजय की अधिष्ठात्री, अन्त से अतीत, कल्याण-मङ्गल रूप वाली, Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
देव्युपनिषत् [ ४८६ दोषरहित एवम् आश्चर्यवादी भी यही हैं। हम इन देवी को सदा नमस्कार करते हैं। आकाश एवं ईकार युक्त, अग्नि सहित अर्द्धचन्द्र से विभूषित जो बीज है, वह सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। जिन साधकों का मन शुद्ध है, वे इस एकाक्षर ब्रह्म का चिन्तन करते हैं। वाणी, माया, काम, वक्त्र, दक्षिण कर्ण, बिन्दु, नारायण, अधर, विच्चे इनसे युक्त नवार्ण मन्त्र उपासकों को सायुज्य पदवी प्रदान करने वाला है। हृदय-कमल में निवास करने वाली, अरुणोदय के समान प्रभा वाली, पाश-अंकुशधारिणी मनोहर रूप वाली वरदहस्त और अभय मुद्रा वाली त्रिनेत्रा, लोहितवसना, कामना पूर्ण करने वाली देवी का मैं सदा भजन करता हूँ। हे महादेवि ! तुम महान् भय और महान् सङ्कट को दूर करने वाली तथा करुणामयी मूर्ति हो। मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। ब्रह्मादि भी जिनके यथार्थ रूप को नहीं जानते, इसीलिए जो अज्ञेया तथा अन्त न होने से अनन्ता कही जाती हैं, जो दिखाई न पड़ने से अलक्ष्या, जन्म रहित होने से अजा, एक ही सर्वत्र व्याप्त होने से एका तथा विश्व रूप में अकेली ही सुशोभित होने से नैका कही जाती है । १८-२६ ॥ मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी । ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ॥२७ यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता । तां दुर्गां दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम् । नमामि भवभीतोऽहं संसारार्णवतारिणीम् ॥२८ इदमथर्वणशीर्षं योऽधीते स पञ्चाथर्वशीर्षजपफल मवा- प्नोति । इदमथर्वणशीर्षं ज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति ॥२६.। शतलक्षं प्रजप्त्वाऽपि नार्चासिद्धिं च विन्दति । शतमष्टोत्तरं चास्याः पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ॥३० Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४६० ] [ देव्युपनिषत् दशवारं पठेद्यस्तु सद्यः पापैः प्रमुच्यते । महादुर्गाणि तरति महादेव्याः प्रसादतः ॥३१ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत् सायं प्रातः प्रयुञ्जानः पापोऽपापो भवति । निशीथे तुरीयसंध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतन- प्रतिमायां जप्त्वा देवतासांनिध्यं भवति । प्राणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति । भौमाश्विन्यां महादेवीसंनिधौ जप्त्वा महामृत्युं तरति । य एवं वेदेत्युपनिषत् ॥३२॥ समस्त अक्षरों में मूलाक्षर रूप में रहने वाली, चिन्मयातीता, शून्यसाक्षिणी वे सर्वश्रेष्ठ दुर्गा के नाम से प्रसिद्ध हैं। उन संसार सागर से पार करने वाली, दुराचार को नष्ट करने वाली दुर्गा देवी को मैं भव- सागर से भयभीत हुआ नमस्कार करता हूँ । इस अथर्वशीर्ष का जप करने वाले को पाँचों अथर्वशीर्ष के जप का फल प्राप्त होता है। इसके बिना जाने हुए लाखों बार अर्चना करने से भी कोई लाभ नहीं हो सकता। इसका दस बार जप करने से समस्त पापों से उसी समय मुक्ति हो जाती है। सायंकाल में पाठ करने से दिन भर के और प्रातःकाल पाठ करने से रात्रि भर के पाप दूर हो जाते हैं। मध्य रात्रि के पाठ से वाक् सिद्धि होती है। भौमाश्विनी योग में पाठ करने से महा-मृत्यु से परित्राण होता है ॥ २७-३२ ॥ ॥ देव्युपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri बह्वृचोपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा- विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारमवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्तिपाठ—ॐ मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयंप्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो इसलिए मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास में ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ। मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति । ॐ देवी ह्येकाऽग्र आसीत् । सैव जगदण्डमसृजत । कामकलेति विज्ञायते । शृङ्गारकलेति विज्ञायते ॥१॥ तस्या एवब्रह्माऽजीजनत् । विष्णुरजीजनत् । रुद्रोऽजीज- नत् । सर्वे मरुद्गणा अजीजन् । गन्धर्वाप्सरसः । किन्नरा वादि- त्रवादिनः समन्तादजीजनन् । भोग्यमजीजनत् । सर्वमजीजनत् । सर्वं शाक्तमजीजनत् । अण्डजं स्वेदजमुद्भिज्जं जरायुजं यत् किंचैतत् प्राणिस्यावरजङ्गमं मनुष्यमजीजनन् ॥२॥ सैषा परा शक्तिः । सैषा शांभवी विद्या कादिविद्येति वा हादिविद्येति वा सादिविद्येति वा रहस्योमोमों वाचि प्रतिष्ठा ॥३॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४६२ ] [ बह्वृचोपनिषद् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सैव पुरत्रयं शरीरत्रयं व्याप्य बहिरन्तरवभासयन्ती देश- कालवस्त्वन्तरासङ्गान्महात्रिपुरसुन्दरी वै प्रत्यक् चितिः ॥४॥ सैवात्मा ततोऽन्यदसत्यमनात्मा । अत एषा ब्रह्मसंवित्ति- र्भावाभावकलाविनिर्मुक्ता चिद्विद्याऽद्वितीयाब्रह्मसंवित्तिः सच्चि- दानन्दलहरी महात्रिपुरसुन्दरी बहिरन्तरनुप्रविश्य स्वयमेकैव विभाति । यदस्ति सन्मात्रम् । यद्भाति । चिन्मात्रम् । यत् प्रिय- मानन्दम् । तदेतत् सर्वाकार महात्रिपुरसुन्दरी । त्वं चाहं च सर्वं विश्वं सर्वदेवता । इतरत् सर्वं महात्रिपुरसुन्दरी । सत्यमेकं ललिताऽऽख्यं वस्तु तदद्वितीयमखण्डार्थं परं ब्रह्म ।॥५॥ पञ्चरूपपरित्यागादवरूपप्रहाणतः । अधिष्ठानं परं तत्त्वमेकं सच्छिष्यते महत् ॥ इति ॥६॥ देवी ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की और वही संसार की उत्पत्ति से पहले थीं । वह ही कामकला और शृङ्गारकला के नाम से प्रसिद्ध हैं । उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु व रुद्र का प्रादुर्भाव हुआ । उन्हीं से सारे मरुद्गण, गन्धर्व, अप्सराएं और किन्नर उत्पन्न हुए, समस्त भोग सामग्री का कारण वही हुई । सब कुछ उन्हीं से सृजन हुआ । शक्ति से ही सब कुछ बना । मनुष्य तथा समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों ( अण्डज, स्वेदज, उद्भिज, जरायुज ) की उत्पत्ति उन्हीं से हुई, उन्हीं को अपरा शक्ति, शाम्भवी विद्या, कादि विद्या, हादि विद्या, सादि विद्या, व रहस्यरूपा कहते हैं । वे ही वह अक्षर तत्व हैं जो प्रणव का प्रतिपादन करती हैं, प्रणव स्वरूपा हैं, प्रत्येक प्राणी की वाणी पर अधिष्ठित हैं । वे ही तीनों अवस्थाओं ( जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ) व तीनों प्रकार के शरीरों ( स्थूल, सूक्ष्म और कारण ) में व्याप्त हो रही हैं और वही उनको प्रकाशित कर रही हैं । वे देश, काल और वस्तु की सीमा के भीतर रहती हैं, परन्तु यह उन्हें स्पर्श नहीं कर सकते और वे प्रत्येक प्राणी में चेतना उत्पन्न करती Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
बह्वृचोपनिषत् ] [ ४६३ हैं। उन्हीं को आत्मा कहा जाता है। उनको छोड़कर सब कुछ अमर्त्य और अनात्म है। वे परब्रह्म का बोध कराने वाली विद्या शक्ति हैं। वे ब्रह्म का ज्ञान कराने वाली हैं वे सत्, चित् और आनन्दस्वरूपा हैं। प्रत्येक वस्तु के बाहर और भीतर व्याप्त हो रही हैं। उनके अस्ति, भाति और प्रिय तीनों रूप, सत्, चित् और आनन्द के बोधक हैं। इस प्रकार से वह महात्रिपुरसुन्दरी समस्त स्थूल वस्तुओं में अधिष्ठित हैं। मैं और तुम, देवता, सारा संसार व शेष सब कुछ वे देवी ही हैं। ललिता ही सत्य हैं, वे ही परब्रह्म तत्व हैं। पाँच रूपों (अस्ति, भाति, प्रिय, नाम, रूप) के त्यागने और अपने रूप के न त्यागने से जो सत्ता शेष रह जाती है, उसी को परम तत्व कहते हैं ॥ १ ॥ प्रज्ञानं ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मास्मीति वा भाष्यते । तत्त्वमसीत्येव संभाव्यते । अयमात्मा ब्रह्मेति वा अहं ब्रह्मा- स्मीति वा ब्रह्मैवाहमस्मीति वा ॥७॥ योऽहमस्मीति वा सोऽहमस्मीति वा योऽसौ सोऽहमस्मीति वा या भाव्यते सैषा षोडशी श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी श्रीमहात्रि- पुरसुन्दरी बालाऽम्बिकेति बगलेति वा मातङ्गीति वरस्वयं- कल्याणीति भुवनेश्वरीति चामुण्डेति चण्डेति वाराहीति तिरस्क- रिणीति राजमातङ्गीति वा शुकश्यामलेति वा लघुश्यामलेति वा अश्वारूढेति वा प्रत्यङ्गिरा धूमावती सावित्री सरस्वती गायत्री ब्रह्मानन्दकलेति ॥८॥ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यतिय इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥ इत्युपनिषत् ॥६॥ "प्रज्ञान ही ब्रह्म है" व 'मैं ही ब्रह्म हूँ' आदि वाक्यों से उसी परम तत्व को व्यक्त किया जाता है। जब तक 'वह-तू-मैं' कहते हैं तो हम उसी को प्रकट करते हैं। जो वह है, वह ही मैं हूँ' 'वह भी मैं
४६४ ] [ बह्वृचोपनिषत् हूँ" "ब्रह्म भी मैं ही हूँ" "आत्मा ब्रह्म है" यदि वाक्यों द्वारा उसी परम विद्या का विवेचन होता है । उसी पञ्चदशाक्षरवाली देवी के ही बाला, अम्बिका, बगला, मातङ्गी स्वयंवर-कल्याणी, भुवनेश्वरी, चामुण्डा, चण्डा, बाराही, तिरस्करिणी, राजमातङ्गी, शुकश्यामला, लघुश्यामला, अश्वारूढ़ा, प्रत्यङ्गिरा, धूमावती, सावित्री, सरस्वती, ब्रह्मानन्दकला, आदि नाम हैं। जिस विनाश को प्राप्त न होने वाले आकाश में सारे देवता विराजमान रहते हैं, उसी परम आकाश में ऋचाएँ अधिष्ठित हैं। जो उस परम आकाश को भली-भाँति समझने की चेष्टा नहीं करता, वह केवल ऋचाओं के पढ़ने से कुछ नहीं कर सकता। उसको भली प्रकार समझ लेने वाले ही उसमें सदा निवास करने का स्थान पा जाते हैं। ॥ बह्वृचोपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमावि- रावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्युतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मा- मवतु ! तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतुवक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः । शान्तिः । शान्तिः । शांति पाठ—ॐ मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयंप्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिए मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास में ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ । मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्ति । प्रथमः खण्डः अथ भगवन्तं देवा ऊचुर्हे भगवन्नः कथय सौभाग्यलक्ष्मी- विद्याम् ।।१।। तथेत्यवोचद्भगवान्नादिनारायणः सर्वे देवा यूय सावधान मना भूत्वा शृणुत । तुरीयरूपां तुरीयातीतां सर्वोत्कटां सर्व- मन्त्रासनगतां पीठोपपीठदेवतापरिवृतां चतुर्भुजां श्रियं हिरण्य- वर्णामिति पञ्चदशर्भिर्गायथ ।।२।। अथ पञ्चदशऋगात्मकस्य श्रीसूक्तस्यानन्दकर्दमचिक्लीतेन्दि- रासुता ऋषयः । श्रीरित्याद्या [या] ऋचः । चतुर्दशानामृचां-
४६६ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् मानन्दाहृषयः । हिरण्यवर्णमित्याद्युक्तत्रयस्यानुष्टुप् छन्दः । कासोऽस्मीत्यस्य बृहती छन्दः । तदन्ययोर्द्वि योस्त्रिष्टुप् । पुनरष्ट- कस्याद्यनुष्टुप् । शेषस्य प्रस्तारपङ्क्तिः । श्रयग्निद्देवता । हिरण्य- रजतस्रजा बीजम् । कासोऽस्मीति शक्तिः । हिरण्मया चन्द्रा णथनस्स्रजा हिरण्यस्रजा हिरण्या हिरण्यवर्णेति प्रणवादिन्नमोऽन्तै- श्रुत्युद्यन्तैरङ्गन्यासः । अब वक्तव्यैरङ्गन्यासः मस्तकलोचन- श्रुतिघ्राणवदन कण्ठबाहुद्वयहृन्नाभिगुह्यपायूरुजानुजङ्घेषु श्री सूक्तैरेव क्रमशोन्यसेत् ॥३॥ अमलकमलसंस्था तद्रजः पुञ्जवर्णं करकमलधृतेष्वाभीति युग्माम्बुजा च । मणिगटकविचित्रांकृताकल्पजालैः सकलभुवनमाता संतत श्रीः श्रियै 'नः ॥४ एक समय की बात है, भगवान् आदि नारायण से देवताओं ने निवेदन किया—'प्रभो ! सौभाग्यलक्ष्मी विद्या का हमारे उपदेश करिये । भगवान् ने कहा—'देवताओ ! एकाग्र मन से सुनो । स्थूल, सूक्ष्म और कारण रूप अवस्थाओं से जो तुरीयावस्था, वरन् तुरीयावस्था से भी परे निर्गुंण एवं विकराल रूप वाली हैं, जो मन्त्र रूप आसन पर प्रतिष्ठित होने वाली हैं, पीठों और उपपीठों में विराजमान देवगण से घिरी हुई हैं, उन चार भुजा वाली लक्ष्मीजी का श्रीसूक्त की पन्द्रह ऋचाओं के द्वारा चिंतन करना चाहिए । उन पन्द्रह ऋचाओं के ऋषि इन्दिरा, आनन्द, कर्दम और चिव- लीत हैं । प्रथम मंत्र की ऋषि इंदिरा शेष मंत्रों के ऋषि पुत्र हैं । प्रथम तीन ऋचाओं का छन्द अनुष्टुप्, चौथी का वृहती, पांचवीं-छठवीं का त्रिष्टुप्, सातवीं से चौदहवीं तक का अनुष्टुप् और प्रस्तार पंक्ति हैं ।
सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् [ ४६७ देवता श्री और अग्नि, बीज 'हिरण्यवर्णम्', शक्ति 'का सोस्मि' है । हिर- ण्यमयी, चन्द्रा, रजतस्रजा, हिरण्यस्रजा हिरण्या,हिरण्यवर्ण इन नामों को चतुर्थी विभक्ति में रखकर ओंकार से आरम्भ कर अन्त में नमः उच्चा- रण करता हुआ न्यास करे । फिर श्रीसूक्त के मन्त्रों से अङ्गन्यास करे फिर निम्न मन्त्र से ध्यान करे— 'अरुण वर्ण के कमलदल पर विराजमान, कमल-पराग की राशि के समान पीले रङ्ग वाली,वर-मुद्रा, अभय-मुद्रा और दो हाथों में कमल- पुरुष-धारिणी, मणिमय कंकणों से अलंकृत, सब लोकों की माता श्री महालक्ष्मी हमें निरन्तर श्री से सम्पन्न बनावे' ॥१-४॥ तत्पीठम् । कर्णिकायां ससाध्यं श्रीबीजम् । वस्वादित्य- कलापद्मेषु श्रीसूक्तगतार्धर्चर्चा तद्वहिर्यः शुचिरिति मातृकया च श्रियं यन्त्राङ्गदशशं च विलिख्य श्रियमावाहयेत् ॥५॥ अङ्गैः प्रथमाऽऽवृत्तिः । पद्मादिभिर्द्वितीया । लोकेशैस्तृ- तीया । तदायुधैस्तुरीयाऽऽवृत्तिर्भवति । श्रीसूक्तैरावाहनादि । षोडशसहस्रजपः ॥६॥ सौभाग्यरमै कार्कश्य भृगुतृच्दगायत्रीश्रिय ऋष्यादयः । शमिति बीजशक्तिः । श्रामित्यादि षडङ्गम् ॥७ ययाद्भूयो द्विपद्माभयवरदकरा तप्तकार्त्तस्वराभां शुभाभ्राभ्राभेभयुग्मद्वयकरधृतकुम्भाद्भिरासिच्यमाना । रत्नौघाबद्धमौलिर्विमलतरदुकूलार्तवालेपनाढ्या पद्माक्षी पद्मनाभोरसि कृतवसतिः पद्मगा श्रीः श्रियैः नः॥८। पीठ कर्णिका के भीतर साध्य कार्यं श्रीबीज लिखे फिर अष्टदल, द्वादशदल और षोडशदल वाले पद्मों पर भूवृत्तों के मध्य में श्रीसूक्त की
४६८ ] [ सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषत् ] आधी-आधी ऋचा लिखे। फिर निभूर्वृत्त में फलश्रुतिरूप ऋचा लिख कर षोडशार के बीच में और ऊपर 'अ' से 'स'कार तक मातृका वर्णों का लेखन करे। सबसे ऊपर निभूर्वृत्त में वषड् सम्पन्न त्वरिता बीज के सहित श्रीबीज का लेखन करे। इस प्रकार दश अङ्गों वाला श्रीचक्र बनावे। अङ्ग मन्त्रों के द्वारा प्रथम आवरण पूजा की जाती है। पद्म निधियों के द्वारा दूसरी बार आवरण पूजा की जाती है। लोकपालों के द्वारा तृतीय आवरण पूजा होती है। वज्रादि आयुधों के द्वारा चतुर्थ आव- रण पूजा का क्रम है। श्रीसूक्त की ऋचाओं से आवाहनादि कार्य किये जाते हैं। इतना करने के पश्चात् पुरश्चरण के लिए सोलह हजार मंत्र- जप का विधान है। एकाक्षर सौभाग्यलक्ष्मी मन्त्र के ऋषि भृगु, छन्द नीवृद्गायत्री और देवता श्री हैं। बीज 'श्रो' और अङ्गन्यास 'श्रां' इत्यादि के द्वारा होता है। जिन श्रीदेवी ने अपने दो हाथों में कमल तथा दो में वर मुद्रा और अभयमुद्रा ग्रहण की हुई हैं, जिनके देह की कान्ति स्वर्ण के समान है, जो शुभ मेघ के समान आभा वाली दो हाथियों की सूँड़ों में धारण किये कलशों के जल से अभिषिक्त हो रही हैं, जिनके सिर पर लाल वर्ण के रत्नों का मुकुट सुशोभित है, जिनके अंगों पर ऋतु के अनुकूल अंग राग लिपे हुए हैं, जो स्वच्छ वस्त्र वाली हैं, कमल के समान नेत्र वाली, पद्मनाय निवासिनी, कमलासना श्रीदेवी हमारे निमित्त परम ऐश्वर्य प्रदान करावें ॥५-८॥ तत्पीठम् । अष्टपत्रं वृत्तद्वयं द्वादशराशिखण्डं चतुरश्रं रमापीठं भवति। कर्णिकायां ससाध्यं श्रीबीजम्। विभूति- रुन्नतिः कान्तिः सृष्टिः कीर्तिः सन्नतिर्व्यर्थरिष्टरुत्कृष्ट ऋद्धिरिति प्रणवादि नमोऽन्तैश्चतुर्थ्यन्तैर्नवशक्तीर्यजेत् ॥६॥