१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसरस्वतीरहस्योपनिषद् ] [ ४७६ जो सरस्वती ब्रह्मा के मुख-कमल रूप वन में राजहंस के समान विचरण करती हैं, वे श्वेत कान्ति और अंगवाली देवी हमारे मन रूपी हृदय में नित्य रमण करें। हे काश्मीरपुर वासिनी शारदे ! मैं नित्य तुम्हारी स्तुति करता हूँ। मुझे विद्या-दान दो। तुम्हें नमस्कार है। तुम अपनी चार भुजाओं में अक्षसूत्र, अंकुश, पाश और पुस्तक धारण करने वाली हो। तुम्हारे हृदय देश पर मुक्ताहार सुशोभित रहता है। तुम सदा मेरी वाणी में निवास करो। तुम्हारी ग्रीवा शंख के समान सुन्दर और लाल ओष्ठ हैं तथा तुम विभिन्न आभूषणों से अलंकृत हो। तुम मेरी जिह्वा के अग्रभाग में प्रतिष्ठित होओ। भक्तों की जिह्वा के अग्रभाग में निवास कर उन्हें शम दम प्रदान करने वाली वे सरस्वती श्रद्धा, धारणा और मेधा स्वरूपिणी तथा ब्रह्माजी की प्रियतमा हैं। चन्द्रकला से विभूषित केश-पाश वाली तथा संसार-बन्धन को काटने वाली अमृत जलयुक्त नदी रूपिणी भगवती सरस्वती को मैं नमस्कार करता हूँ। जो कवित्व, भोग, निर्भयता अथवा मोक्ष की इच्छा करता हो वह इन दशों मन्त्रों के द्वारा भगवती सरस्वती की भक्ति पूर्वक पूजा-स्तुति करे। भक्ति और श्रद्धा सहित विधिपूर्वक पूजा कर नित्य स्तुति करने वाला भक्त छः मास में ही उनकी कृपा को प्राप्त कर लेता है। इसके अनन्तर गद्य-पद्य से निहित सुन्दर शब्दों वाली वाणी उसके मुख से स्वयं ही उद्भूत होने लगती है। सरस्वती की भक्ति करने वाला कवि दूसरों से सुने बिना ही ग्रन्थों के अर्थों का समझने वाला होता है। हे विप्रो ! भगवती सरस्वती ने ही अपनी भक्ति के इस प्रभाव को अपने श्री मुख से कहा था। ब्रह्माजी के द्वारा ही पुरातन आत्मविद्या को प्राप्त कर सका और अब में सच्चिदा- नन्द रूप वाले नित्य ब्रह्मत्व से सम्पन्न हूँ ॥३६-४६॥ प्रकृतिवत्वं ततः सृष्टं सत्त्वादिगुणसाम्यतः । सत्यामाभाति चिच्छाया दर्पणे प्रतिबिम्बवत् ॥४७ तेन चित्प्रतिबिम्बेन त्रिविधा भाति सा पुनः ।