१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
गायत्री रहस्योपनिषत् ] ४५६ मैत्रमष्टमं भगदैवतं नवममार्यमणं दशमं सावित्रमेकादशं त्वाष्ट्रं द्वादशं पौष्णं त्रयोदशमैन्द्राग्नं चतुर्दशं वायव्यं पञ्चदशं वामदेवं षोडशं मैत्रावरुणं सप्तदशं भ्रातृव्यमष्टादशं वैष्णवमेकोनविंशं वामनं विंशं वैश्वदेवमेकविंशं रौद्रं द्वाविंश कौबेरं त्रयोविंशमाश्विनं चतुर्विशं ब्राह्ममिति प्रत्यक्षरदैवतानि । प्रथमं वासिष्ठ द्वितीयं भारद्वाजं तृतीयं गार्ग्य चतुर्थमौपमन्यवं पञ्चमं भार्गवं षष्ठं शाण्डिल्यम् सप्तमम् लौहितमष्टमं वैष्णवम् नवमम् शातातपम् दशमम् सनत्कुमारमेकादशम् वेदव्यासम् द्वादशम् शुकम् त्रयो- दशम् पाराशर्यम् चतुर्दशम् पौण्ड्रकम् पञ्चदशम् क्रतुम् षोडशम् दाक्षम् सप्तदशम् काश्यपमष्टादशमात्रेयमेकोनविंशमगस्त्यं विंशमोद्दालकमेकविंशमांगिरसम् द्वाविंशम् नामिकेतुं त्रयोविंशम् मौद्गल्यम् चतुर्विंशमाङ्गिरसं वैश्वामित्रमिति प्रत्यक्षराणामृषयो भवन्ति । ये गायत्री अग्नि वायु सूर्यरूप. आहवनीय, गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि वह्निरूप, ऋक्, यजु तथा सामवेद स्वरूप, भूः, भुवः तथा स्व व्याहृति रूप, प्रातः मध्याह्न तथा सायंकालीन यजु की आत्मस्वरूप. सत्व, रज तथा तम गुण वाली, जाग्रत स्वप्न, सुषुप्ति का प्रतीक, वसु, रुद्र तथा आदित्यात्मक गायत्री, त्रिष्टुप् जगती जो छन्द तन्मयी, ब्रह्मा, शंकर एवं विष्णु के स्वरूप वाला, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया रुप जो शक्ति तत्स्वरूप स्वराट्, विराट् तथा वषट् रूप जो ब्रह्म तन्मया हैं। इसका प्रथम अक्षर अग्नि दैवत्य, दूसरा प्रजापति दैवत्य, तीसरा चन्द्र दैवत्य, चौथा ईशान, (शिव), पांचवां आदित्य, छठा गार्हपत्य (अग्नि विशेष), सातवां मैत्र, आठवां भग दैवत्य, नोवां अर्यमा दैवत्य, दसवां सविताधि दैवत्य, ग्यारहवां त्वष्ट्रा, बारहवां पूषा, तेरहवां इन्द्राग्नि, चौदहवां वायु, पन्द्रहवां वामदेव, सोलहवां मैत्रावरुण, सत्रहवां भ्रातृव्य, अठारहवां विष्णु दैवत्य, उन्नीसवां वामन, बीसवां वैश्वदेव,
४६० ] गायत्री रहस्योपनिषत् इक्कीसवां रुद्र दैवत्य, बाईसवां कुवेर दैवत्य, तेईसवां अश्विनी कुमार दैवत्य तथा चोबीसवां अक्षर ब्रह्माधिदैवत्य है । पहले अक्षर का ऋषि वशिष्ठ, दूसरे का भारद्वाज, तीसरे का गर्ग, चौथे का उपमन्यु, पांचवें का भृगु ( भार्गव ), छठे का शांडिल्य, सातवें का लोहित, आठवें का विष्णु, नौवें का शातातप, दसवें का सनत्कुमार, ग्यारहवें का वेद व्यास, बारहवें का शुकदेव, तेरहवें का पाराशर्य, चौदहवें का पौंड्रकमं, पन्द्रहवें का क्रतु, सोलहवें का दक्ष, सत्रहवें का कश्यप, अठारहवें का अत्रि, उन्नीसवें का अगस्त्य, बीसवें का उद्दालक, इक्कीसवें का आङ्गिरस, बाईसवें का नामिकेतु, तेईसवें का मुद्गल, चौबीसवें का अङ्गिरागोत्रज विश्वामित्र ये क्रमशः ऋषि हैं । ( अर्थात् गायत्री के जो चौबीस अक्षर उनके दृष्टा ये चौबीस ऋषि हैं । ) गायत्रीत्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्पङ्क्तिर्बृहत्युष्णिगदितिरिति त्रिरावृत्तेन छन्दांसि प्रतिपाद्यन्ते । प्रह्लादिनी प्रज्ञा विश्वभद्रा विलासिनी प्रभा शान्ता मा कान्तिः स्पर्शा दुर्गा सरस्वती विरूपा विशालाक्षी शालिनी व्यापिनी विमला तमोऽपहारिणी सूक्ष्मा- वयवा पद्मालया विरजा विश्वरूपा भद्रा कृपा सर्वतोमुखीति चतुर्विंशतिशक्तयो निगद्यन्ते । पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशगन्धरस- रूपस्पर्शशब्दवाक्यानि पादपायूपस्थत्वक्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाघ्राण- मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तज्ञानानीति प्रत्यक्षराणां तत्वानि प्रतीयन्ते । चम्पकातसीकुंमपिङ्गलेन्द्रनीलाग्निप्रभोद्यत्सूर्यविद्युत्तारकसरोज- गौरमरकतशुकलकुन्देन्दुशङ्खपाण्डुनेत्रनीलोत्पलचन्दनागुरुकस्तूरी- गोरोचनघनसारसन्निभम् प्रत्यक्षरमनुस्मृत्य समस्तपातकोपपातक- महापातकागम्यागमनगोहत्याब्रह्महत्याभ्रूणहत्या वीरहत्यापुरुष- हत्याऽऽजन्मकृतहत्यास्त्रीहत्यागुरुहत्यापितृहत्याप्राणहत्याचराचर- हत्याऽऽभक्ष्यभक्षणप्रतिग्रहस्वकर्मविच्छेदनस्वाम्यतिहीनकर्मकरण-- परधनापहरणशूद्रान्नभोजनशत्रुमारणचण्डालीगमनादिसमस्तपाप- हरणार्थम् संस्मरेत् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४६१ गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती, उष्णिक् ये त्रिरावृत ( तीन आवृत्ति युक्त ) छन्द गिनाये जाते हैं । इसकी चौबीस शक्तियाँ इस प्रकार हैं—प्रह्लादिनी, प्रजा, विश्वभद्र, विलासिनी प्रभा, शान्ता, मा, कान्ति, स्पर्धा, दुर्गा, सरस्वती, विरूपा, विशालाक्षी, शालिनी, व्यापिनी, विमला, तमोऽपहारिणी, सूक्ष्मा- वयवा, पद्मलया, विरजा, विश्वरूपा, भद्रा, कृपा तथा सर्वतोमुखी । पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, गन्ध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द, वाक्य, पैर, मल मूत्रेन्द्रियां, त्वचा, आंख, कान, जीभ, नाक, मन, बुद्धि, अहङ्कार, चित्त तथा ज्ञान ये गायत्री के प्रत्येक अक्षर के तत्व हैं । चम्पा, अतसी, ( एक नीला फूल ) कुंकुम, पिंगल, इन्द्र, नील, अग्निप्रभा, उद्यत्सूर्य, विद्युत्तारक, सरोज, गौर मरकत, शुक्ल, कुन्द, इन्दु, शङ्ख, पांडु नेत्र नील कमल चन्दन अगुरु, कस्तूरी, गोरोचना, कपूर के समान इन प्रत्येक अक्षरों का आश्रय सभी पाप उपपातक, महापातक, अगम्यागमन ( जिनसे योनि सम्बन्ध नहीं होना चाहिये उनसे योनि सम्बन्ध करना आदि ), गोहत्या, ब्रह्म हत्या, भ्रूण ( गर्भपात ) हत्या, वीर हत्या, पुरुष हत्या, सारे जन्मों में की हुई हत्यायें, स्त्री हत्या, गुरु हत्या, पितृ हत्या, आत्मघात, चराचर जीवों की हत्या, जो खाने लायक नहीं उन्हें खाने से होने वाली हत्या, दान व अपने कर्म का त्याग, स्वामी की सेवा से पराङ्मुख कर्म करने वाला. दूसरे के धन को चुराने से होने वाले पाप, शूद्र के अन्न को खाने, शत्रु घात, चाण्डाली से योनि सम्बन्ध रखना आदि सारे पापों के हरण के लिए याद करना चाहिये । मूर्धा ब्रह्मा शिखान्तो विष्णुर्ललाटं रुद्रश्चक्षुषी चन्द्रादित्यौ कर्णौ शुक्रबृहस्पती नासापुटे अश्विनौ दन्तोष्ठावुभे सन्ध्ये मुखं मरुतः स्तनौ वस्वादयौ हृदयं पर्जन्यं उदरमाकाशो नाभिरग्निः कटिरिन्द्राग्नी जघनं प्राजापत्यमूरू कैलासम्पूलं जानुनी विश्वेदेवौ
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ४६२ ] . : [ गायत्री रहस्योपनिषत् जङ्घे शिशिरः गुल्फानि पृथिवीवनस्पत्यादीनि नखानि महती अस्थीनि नवग्रहा असृक्के तुर्मासमृतुसन्धयः कालद्वमास्फालनं संवत्सरोनिमेषोऽहोरात्र मिति वाग्देवीं गायत्रीं शरणमह प्रपद्ये । य इदं गायत्रीरहस्यमधीते तेन ऋतसहस्रभिष्ट भवति । य इदं गायत्रीरहस्यमधीते दिवसकृत पापं नाशयति । प्रातर्मध्या- ह्नयोः षण्मासकृतानि पापानि नाशयति । सायं प्रातधीयानो जन्मकृतं पापं नाशयति । य इदं गायत्रीरहस्य ब्राह्मणः पठेत् तेन गायत्र्याः षष्टिसहस्रलक्षानि जप्तानि भवन्ति । सर्वान् वेदान- धीतो भवति । सर्वेषु तीर्थेषु स्नातो भवति । अपेयपानात् पूतो भवति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति । वृषलीगमनात् पूतो भवति । अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति । षङ्क्तिषु सहस्रपानात् पूतो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति । इत्याह भगवान् ब्रह्मा । मैं ऐसी वाणी की अधिष्ठात्री देवी गायत्री का आश्रय लेता हूँ कि शिर ब्रह्ममय, शिखान्त भाग विष्णु, ललाट ( मस्तक) रुद्र, आँखें सूर्य तथा चन्द्रमा कान, शुक्राचार्य तथा बृहस्पति नाक के रन्ध्र अश्विनी- कुमार दाँतों के होठ दोनों संध्यायें मुख मरुत् ( वायु ) स्तन वसु आदि, हृदय बादल, पेट आकाश, नाभि अग्नि, कमर इन्द्र तथा अग्नि जाँघ प्राजापत्य ऊरुद्वय कैलाश के मूलस्थल, घुटने विश्वेदेव, जाङ्घायें शिशिर, गुल्फ ( पृथ्वी की वनस्पति आदि ) नख महान् तत्व हड्डियाँ नवग्रह, अन्तड़ियाँ केतु, मांस ऋतु सन्धियाँ, दोनों कालों का ( गमन ) बोधक, वर्ष तथा निमेष दिन एव रात हैं । जो इस गायत्री का अध्ययन करता है उसने तो मानो हजारों यज्ञ कर लिए । जो इस गायत्री रहस्य को पढ़ाता है वह दिन में किए पापों को नष्ट कर देता है । जो सुबह एवं मध्याह्न में इसे पढ़ता है, वह अपने छः महीने के पापों से मुक्त हो जाता है । जो प्रतिदिन प्रातः सायं इसका अध्ययन
गायत्री रहस्योपनिषत् ] [ ४६३ करे, वह सारे जन्म के पापों को नष्ट कर देता है। जो ब्राह्मण इस गायत्री रहस्य को पढ़े तो उसने मानों गायत्री मन्त्र को साठ हजार लाख बार जप लिया है। उसने सारे वेदों का अध्ययन कर लिया। सभी तीर्थों में उसने स्नान कर लिया। न पीने लायक (शराब आदि) को पीने से जो पाप होता है उससे भी मुक्त हो जाता है। न खाने लायक को खाने से हुए पाप से मुक्त हो जाता है। ब्रह्मचारी न भी हो तो ब्रह्मचारी के समान तेजस्वी हो जाता है। पंक्तियों में हजार बार (अपेय) पान कर पवित्र हो जाता है। तथा आठ ब्राह्मणों को इसका ग्रहण करवाकर, बताकर समझाकर ब्रह्मलोक को चला जाता है। ये सब भगवान् (प्रजापति) ब्रह्मा ने इस प्रकार उत्तर देकर समझाया। ॥ गायत्री रहस्योपनिषद् समाप्त ॥ —:o:—
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सावित्र्युपनिषत्
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निरा- कुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । मेरे अङ्ग वृद्धि को प्राप्त हों; वाणी, घ्राण, चक्षु, श्रोत्र, बल और सब इन्द्रियाँ वृद्धि को प्राप्त हों । सब उपनिषद् ब्रह्मरूप हैं । मुझ से ब्रह्म का त्याग न हो और ब्रह्म मेरा त्याग न करे । ऐसे ब्रह्मरत रहते हुये मुझको उपनिषदों में प्रतिपादित ब्रह्म की प्राप्ति हो । ॐ शान्ति, शान्तिः शान्तिः । कः सविता का सावित्री ? अग्निरैव सविता पृथिवी सावित्री स यत्राग्निस्तत् पृथिवी यत्र वा पृथिवी तत्राग्निस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥१॥ कः सविता का सावित्री ? वरुण एव सविताऽऽपः सावित्री स यत्र वरुणस्तदापो यत्र वा आपस्तद्वरुण- स्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥२॥ कः कविता काः सावित्री ? वायुरेव सविताऽऽकाशः सावित्री स यत्र वायुस्तदाकाशो यत्र वा आकाशस्तद्वायुस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ३ ॥ कः सविता का सावित्री ? यज्ञ एव सविता छन्दांसि सावित्री स यत्र यज्ञस्तच्छ- न्दांसि यत्र वा छन्दांसि स यज्ञस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥४॥ कः सविता का सावित्री ? स्तनयित्नुदेव सविता, विद्युत् सावित्री
सावित्र्युपनिषत् ] [ ४६५
स यत्र स्तनयित्नुस्तद्विद्युत् यत्र वा विद्युत्त स्तनयित्नुस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ५ ॥ कः सविता का सावित्री ? आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री स यत्रादित्यस्तद् द्यौर्यत्र वा द्यौस्तदादि- त्यस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ६ ॥ कः सविता का सावित्री ? चन्द्र एव सविता नक्षत्राणि सावित्री स यत्र चन्द्रस्तन्नक्षत्राणि यत्र वा नक्षत्राणि स चन्द्रमास्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ७ ॥ कः सविता का सावित्री ? मन एव सविता वाक् सावित्री स यत्र वा मनस्तद्वाक् यत्र वा वाक् तन्मनस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथु- नम् ॥ ८ ॥ कः सविता का सावित्री ? पुरुष एव सविता स्त्री सावित्री स यत्र पुरुषस्तत् स्त्री यत्र वा स्त्री तत् पुरुषस्ते द्वे योनिस्तदेकं मिथुनम् ॥ ९ ॥
सविता किसे कहते और सावित्री किसे ? अग्नि सविता और पृथिवी सावित्री हैं। जहाँ अग्नि हैं वहीं पृथिवी हैं और जहाँ पृथिवी हैं वहाँ अग्नि हैं । वे दोनों योनि अर्थात् संसार के जन्मदाता हैं, वे दोनों एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? वरुण देव ही सविता हैं और जल ही सावित्री, जहाँ वरुण देवता हैं वहीं जल है और जहाँ जल है वहीं वरुण देवता हैं । दोनों योनि अर्थात् संसार के उत्पत्ति- कर्ता हैं । वे दोनों एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? वायु सविता हैं और आकाश सावित्री । जहाँ वायु देव हैं वहीं आकाश है । जहाँ आकाश है वहीं वायु देव हैं । ये दोनों योनि हैं, एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? यज्ञ देव सविता हैं और छन्द सावित्री । जहां यज्ञ देव हैं वहीं छन्द हैं । जहाँ छन्द हैं वहीं यज्ञ देव हैं । वे दोनों योनि हैं एक युग्म हैं । सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? गरजन करने वाले बादल सविता हैं और विद्युत सावित्री । जहाँ गरजन करने वाले बादल हैं वहीं विद्युत हैं । जहाँ
विद्युत हैं वहीं गरजन करने वाले बादल हैं। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? सूर्य को सविता कहते हैं और द्युलोक को सावित्री। जहां सूर्यदेव हैं वहीं द्युलोक हैं, जहां द्युलोक हैं, वहीं सूर्यदेव हैं। वे दोनों योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते और सावित्री किसे ? चन्द्रदेव को ही सविता कहते हैं और नक्षत्र को सावित्री। जहां चन्द्रदेव हैं वहीं नक्षत्र हैं। जहाँ नक्षत्र हैं वहीं चन्द्रदेव हैं। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? मन को ही सविता कहा गया है और वाणी को सावित्री, जहाँ मन है वहीं वाणी है, जहाँ वाणी है वहीं मन है। वे दोनों एक योनि हैं, एक युग्म हैं। सविता किसे कहते हैं और सावित्री किसे ? पुरुष को ही सविता कहा गया है और स्त्री को सावित्री। जहाँ पुरुष है वहीं स्त्री है, जहाँ स्त्री है वहीं पुरुष है। वे दोनों एक योनि हैं। एक युग्म हैं ॥ १-६ ॥ तस्या एव (ष) प्रथमः पादो भूस्तत्सवितुर्वरेण्यमित्यग्नि- र्वै वरेण्यमापो वरेण्यं चन्द्रमा वरेण्यम् ॥ १० ॥ तस्या एव (ष)- द्वितीयः पादो भर्गमयो भुवो भर्गो देवस्य धीमहीत्यग्निर्वै भर्ग आदित्यो वै भर्गश्चन्द्रमा वै भर्गः ॥ ११ ॥ तस्या एष तृतीयः पादः स्वधियो यो नः प्रचोदयादिति स्त्री चैव पुरुषश्च प्रजयनतः ॥ १२ ॥ यो वा एतां सावित्रीमेवं वेद स पुनर्मृत्युं जयति ॥ १३ ॥ सावित्री का पहला पाद—'भूः—तत्सवितुर्वरेण्यम' है। अग्नि, जल व चन्द्रमा देवता ही वरेण्य हैं। सावित्री का दूसरा पाद है 'भुवः— भर्गो देवस्य धीमहि' वह तेजोमय है। अग्नि, सूर्य व चन्द्रमा देवता ही वह भर्ग तेज हैं। सावित्री का तीसरा पाद है 'धियो योनः प्रचोदयात्।'
सावित्र्युपनिषत् ] [ ४६७ इस सावित्री देवी को जो स्त्री और पुरुष गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए समझते हैं वे मृत्यु से छूट जाते हैं अर्थात् पुनः जन्म नहीं लेते ॥ १०–१३ ॥ बलातिबलयोर्विराट् पुरुष ऋषिः । गायत्री छन्द । गायत्री देवता । अकारोकारमकारा बीजाद्याः । क्षुधाऽऽदिनिरसने विनि- योगः । क्लामित्यादि षडङ्गम् । ध्यानम्— अमृतकरतलाग्रौ सर्वसंजीवनाढ्या- वघहरणसुदक्षो वेदसारे मयूखे । प्रणवमयविकारौ भास्कराकारदेहौ सततमनुभवेऽहं तौ बलातिबलान्तौ ॥ ओ३म् ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विधपुरु- षार्थसिद्धिप्रदे तत्सवितुर्व्वरदात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्त वर- दात्मिके अतिबले सर्वदयामूर्ते बले सर्वक्षुच्छ्रमोपनाशिनी धीमहि धियो यो नजर्ति प्रचुर्या या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहाः ॥ १४ ॥ एवं विद्वान् कृतकृत्यो भवति सावित्र्या एव सलोकतां जयतीत्युपनिषत् ॥ १५ ॥ बलि अतिबलि नाम की दो विद्याओं के ऋषि विराट पुरुष हैं और उनका छन्द और देवता गायत्री हैं । उसका 'अ'कार बीज है और 'उ'कार शक्ति । उनका 'म'कार कीलक है । भूख की निवृत्ति के लिए इसका विनियोग है । क्लीं के माध्यम से इनका षडङ्गन्यास करना चाहिए । ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लीं शिखायै वषट्, ॐ क्लीं कवचाय हुम, ॐ क्लीं नेत्रयाय वौषट्, ॐ क्लीं अस्त्राय फट् ।' अब ध्यान का वर्णन किया जाता है । मैं उन बला अतिबला
४६८ ] [ सावित्र्युपनिषत् विद्याओं के देवताओं को सदैव अनुभव करता हूं जो सूर्य के समान चमकते हुए शरीर वाले, प्रणव स्वरूप, किरणात्मक, वेदों के साररूप, पापों को समाप्त करने में दक्ष, सब तरह की सञ्जीवनी शक्तियों से अधिष्ठित हैं और जिनके हाथ अमृत से भरे हुए हैं। बलि और अतिबलि दोनों विद्याओं के देवताओं का मन्त्र इस प्रकार है:-- ॐ ह्रीं बले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धि- प्रदे तत्सवतुर्वरात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्य वरदात्मिके अतिबले सर्व- दयामूर्ते बले सपंक्षुत्भ्रमोपनाशिनि धीमहिधियो या नो जाते ऽप्रचुर्य या प्रचोदयात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हुं फट् स्वाहा । इस तरह इन विद्याओं को जानने वाला धन्य हो जाता है। वह सावित्री देवी के लोक में पहुंचने की सामर्थ्य रखता है । यह उपनिषद् है ॥ १४ ॥ ॥ सावित्र्युपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri सरस्वतीरहस्योपनिषत् ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमा- विरावीर्म एधि वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे माप्रहासीरनेना- धीतेनाहोरात्रात्संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारमवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्तिपाठ—ॐ मेरी वाणी मन में स्थिर हो, मन वाणी में स्थिर हो, हे स्वयं प्रकाश आत्मा ! मेरे सम्मुख तुम प्रकट होओ । हे वाणी और मन ! तुम दोनों मेरे वेद ज्ञान के आधार हो, इसलिये मेरे वेदाभ्यास का नाश न करो । इस वेदाभ्यास ही मैं रात्रि-दिन व्यतीत करता हूँ । मैं ऋत भाषण करूँगा, सत्य भाषण करूँगा, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, मेरी रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो, वक्ता की रक्षा करो । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ऋषयो ह वै भगवन्तमाश्वलायनं संपूज्य पप्रच्छु— केनोपायेन तज्ज्ञानं तत्पदार्थविभासकम् । यदुपासनया तत्त्वं जानासि भगवन् वद ॥१॥ सरस्वतीदशश्लोक्या संऋचा बीजमिश्रया । स्तुत्वा जप्त्वा परां सिद्धमलभं मुनिपुंगवाः ॥२॥ ऋषय ऊचुः— कथं सारस्वतप्राप्तिः केन ध्यानेन सुव्रत । महासरस्वती येन तुष्टा भगवती वद ॥३॥
४७० ] सरस्वतीरहस्योपनिषत् स होवाचाश्वलायनः- अस्य श्रीसरस्वतीदशश्लोकमहामन्त्रस्य-अहमाश्वलायन ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीवागीश्वरी देवता । यद्वागिति बीजम् । देवीं वाचमिति शक्तिः । प्रणो देवीति कीलकम् । विनियोगस्तत्प्रीत्यर्थे । श्रद्धा मेधा प्रज्ञा धारणा वाग्देवता महासरस्वतीत्येतैरंगन्यासः ॥ ४ ॥ एक समय की बात है भगवान् आश्वलायन के निकट ऋषिगण गये और उनकी विधिवत् पूजा कर प्रश्न किया 'भगवन् ! जिस ज्ञान के द्वारा 'तत्' पदात्मक परमेश्वर का स्पष्ट बोध होता है, उस ज्ञान की प्राप्ति किस प्रकार हो ? आपको जिस देवता की उपासना द्वारा तत्त्व- ज्ञान की प्राप्ति हुई है, इसके सम्बन्ध में बताने की कृपा करिये ।' भगवान् आश्वलायन ने कहा- 'ऋषियो ! मैंने बीज मन्त्र सहित दस ऋचाओं वाली सरस्वती दशश्लोकी के द्वारा उपासना करते हुए परासिद्धि को प्राप्त किया है ।' ऋषियों ने पुनः प्रश्न किया- 'हे श्रेष्ठव्रती महर्षे ? उस सारस्वत मन्त्र की उपलब्धि आपको किस ध्यान के द्वारा किस प्रकार हुई, जिससे आप पर भगवती महासरस्वतीजी का अनुग्रह हुआ है। हमारे प्रति भी उस उपाय को कहने की कृपा करें ।' इस पर उन प्रसिद्ध आश्वलायन ने कहा- 'इस श्री सरस्वती दशश्लोकी महामन्त्र का ऋषि मैं ही हूँ। इसका छन्द अनुष्टुप, देवता वागीश्वरी और बीज यद्वाग् है। शक्ति 'देवीं वाचं' कीलक 'प्रणो देवी' है। इसका विनियोग श्री वागीश्वरी देवता के प्रीत्यर्थ है। अंगन्यास श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, धारणा, वाग्देवता और महासरस्वती इन नाम-मन्त्रों से किया जाता है ॥ १-४ ॥ नीहारहारघनसारसुधाकराभा
सरस्वतीरहस्योपनिषत् ] [ ४७१- CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri कल्याणदां कनकचम्पकदामभूषाम् । उत्तुंगपीनकुचकुम्भमनोहरांगीं वाणीं नमामि मनसा वचसां विभूत्यै ॥५ प्रणो देवीत्यस्य मन्त्रस्य—भरद्वाज ऋषिः। गायत्री छंदः। श्रीसरस्वती देवता । प्रणवेन बीज । शक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनियोगः । मन्त्रेण न्यासः ॥ ६ ॥ या वेदांतार्थतत्त्वैकस्वरूपा परमेश्वरी । नामरूपात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती ॥७ ॐ प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । धीनामवित्र्यवतु ॥८ आ नो दिव इति मन्धूस्य—अत्रिऋर्षिः। त्रिष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । ह्रीमिति बीजशक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनि- योगः । मन्त्रेण न्यास ॥ ६ ॥ या सांगोपांगवेदेषु चतुष्वेंकव गीयते । अद्वैता ब्रह्मणः शक्तिः सा मां पातु सरस्वती ॥१० ह्रीं आ नो दिवो बृहतः पर्वतादा सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम् । हवं देवी जुजुषाणा घृताची शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥११ पावका न इति मन्त्रस्य—मधुच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । श्रीमिति बीजशक्तिकीलकम् । इष्टार्थे विनियोगः मन्त्रेण न्यास ॥ १२ ॥ या वर्णपदवाक्यार्थस्वरूपेणैव वर्तते । अनादिनिधनाऽनन्ता सा मां पातु सरस्वती ॥१३ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
४७२ ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् श्रीं पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टुं धिया वसुः ॥१४ चोदयित्रीति मन्त्रस्य—मधुच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । ब्लूमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ १५.॥ ध्यान इस प्रकार करना चाहिए—'कल्याण प्रदायिनी, हिम, कपूर, मुक्ता अथवा चन्द्रप्रभा के समान शुभ्र कान्तिवती, सुवर्ण के समान पीले चम्पक पुष्पों की माला से अलंकृत, उन्नत सुपुष्ट वक्ष सहित सुन्दर अंगवाली वागेश्वरी को मन और वाणी द्वारा विभूति की सिद्धि के निमित्त नमस्कार करता हूँ ।' 'ॐ प्रभो देवी' मन्त्र के ऋषि भरद्वाज, छन्द गायत्री और देवता सरस्वतीजी हैं । ॐ नमः' बीज, शक्ति तो है ही, साथ ही कीलक भी हैं । अभीष्ट कार्य की सिद्धि के निमित्त इसका विनियोग और मंत्र के द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है । 'जिस सरस्वती का स्वरूप वेदांत का सारभूत ब्रह्मतत्व ही है और जो विभिन्न नाम रूपों में प्रकट हैं, वे सरस्वती मेरी रक्षिका हों ।' दान से सुशोभित होने वाली, स्तोताओं की रक्षिका एवं अन्नवती भगवती सरस्वती हम साधकों को अन्न से परिपूर्ण करें । 'आ नो दिवा०' इस मंत्र के ऋषि अत्रि, छन्द त्रिष्टुभ् और देवता सरस्वती हैं । 'ह्रीं बीज, शक्ति और कीलक है । इच्छित कार्य की सिद्धि के लिए इसका विनियोग तथा इसी मन्त्र द्वारा न्यास किया जाता है । 'वेदों और उनके अङ्ग-उपांगों में जिन एक देव की स्तुति की जाती है तथा जो परमब्रह्म की अद्वैत शक्ति हैं, वे भगवती सरस्वती हमारी रक्षिका हों ॥ ५—१० ॥
सरस्वतीरहस्योपनिषत् [ ४७३ हमारे द्वारा उपासना के योग्य देवी सरस्वती ज्योतिर्मान् सुलोक से नीचे पर्वताकार मेघों के मध्य होती हुई हमारे यज्ञ में पधारें। वे देवी हमारे स्तोत्र से प्रसन्न होकर स्वेच्छा से हमारे सुख उत्पन्न करने वाले स्तोत्रों को श्रवण करें ॥ २ ॥ 'पावकानः' इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छदा, छन्द गायत्री, देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक 'श्रीं' है। इसका विनियोग कामना सिद्धि के निमित्त है तथा इसी मन्त्र द्वारा अंगन्यास करने का विधान है। 'जो वर्ण, पद, वाक्य में अर्थों सहित सर्वत्र व्याप्त है, जो आदि अन्त से परे एवं अनन्त रूप वाली हैं, वे देवी सरस्वती मेरी रक्षा करने वाली हों।' जो देवी सरस्वती सबको पवित्र करती हैं, जो अन्न और कर्म द्वारा प्राप्त होने वाले धन् के प्राप्त कराने में कारणरूपिणी हैं, वे देवी हमारे यज्ञ में आने की इच्छा करें ॥ ३ ॥ 'चोदयित्री०' इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छान्दा, छन्द गायत्री देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक 'ब्लूं' तथा कार्य पूर्ति के लिए इसका विनियोग एवं मन्त्र द्वारा ही अ ंगन्यास किया जाता है ॥११-१५॥ अध्यात्ममधिदैवं च देवानां सम्यगीश्वर । प्रत्यगास्ते वदंती या सा मां पातु सरस्वती ॥१६ ब्लूं चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनाम् । यज्ञं दधे सरस्वती ॥१७ महो अर्णोति मन्त्रस्य - मधुमच्छन्दा ऋषिः । गायत्री छन्दः । सरस्वती देवता । सौरिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ १८ ॥ अन्तर्याम्यात्मना विश्वं त्रैलोक्यं या नियच्छति ।
४७४ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् रुद्रादित्यादिरूपस्था सा मां पातु सरस्वती ॥१९॥ सौः महो अर्णः सरस्वती प्रचेतयति केतुना । धियो विश्वा विराजति ॥२०॥ ‘ओ सरस्वती देवताओं की प्रेरणात्मिका शक्ति, अधिदैवरूपिणी एवं हमारे भीतर वाणी रूप में प्रतिष्ठित है, वे भगवती मेरी रक्षिका हों।’ ‘जो भगवती सत्य एवं प्रिय वाणी बोलने की प्रेरणा देती हैं तथा श्रेष्ठ बुद्धि वाले कर्मशील पुरुषों को उनके कर्त्तव्य का ज्ञान कराती हैं, उन्हीं देवी सरस्वती ने हमारे इस यज्ञ को धारण किया है। ‘महो अर्णः; इस मन्त्र के ऋषि मधुच्छन्दा, छन्द गायत्री, और देवता सरस्वती हैं। बीज, शक्ति और कीलक ‘सौः’ है। इसमें मन्त्र के द्वारा ही न्यास किया जाता है। ‘जो सरस्वती अन्तर्यामी रूपसे लोकत्रय का नियंत्रण करने वाली हैं तथा जो रुद्र-आदित्य आदि अनेक देवताओं के रूप में अवस्थित हैं, वे हमारी रक्षिका हों। ‘नदी रूप में आविर्भूत सरस्वती अपने प्रवाह रूप कर्म के द्वारा अपने में निहित अगाध जल राशि का परिचय देती हैं। वे ही सरस्वती सब प्रकार की कर्त्तव्यात्मक बुद्धि का विकास करती हैं ॥१६-२०॥ चत्वारि वागिति मन्त्रस्य — उचथ्यपुत्र ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः सरस्वती देवता । ऐमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ २१ ॥ या प्रत्यग्दृष्टिभिर्जीवैर्व्यज्यमानाऽनुभूयते । व्यापिनी ज्ञप्तिरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥२२ ऐं चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
[Header] सरस्वतीरहस्योपनिषत् [ ४७५
गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥२३ यद्वाग्वदन्तीति मन्त्रस्य- भार्गव ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । क्लीमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ २४ ॥ नामजात्यादिभिर्भेदैरष्टधा या विकल्पिता । निर्विकल्पात्मना व्यक्ता सा मां पातु सरस्वती ॥२५ क्लीं यद्वाग्वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवानां निषसाद मंद्रा । चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्याः परमं जगाम् ॥२६ 'चत्वारि वाक्०' ऋषि उचथ्य-पुत्र दीर्घतमा, छन्द त्रिष्टुप्, देवता सरस्वती, बीज, शक्ति, कीलक 'ऐं'। मन्त्र द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है । जो सरस्वतीदेवी अन्तर्दृग् वाले जीवों के समक्ष विभिन्न रूपों में प्रकट होती तथा जो ज्ञप्ति रूपसे व्याप्त हैं, वे सरस्वती मेरी रक्षिका बनें । वाणी, परा पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चार पदों वाली है। इन पदों को ज्ञानी जन भले प्रकार जानते हैं । इनमें से प्रथम तीन तो हृदयगह्वर में स्थित होने से प्रकट नहीं होती । परन्तु वैखरी ही मनुष्यों के बोलने में प्रयुक्त होती है ॥ ५ ॥ 'यद्वाग्वदन्ति०' ऋषि भार्गव, छन्द त्रिष्टुप्, देवता सरस्वती है । बीज, शक्ति कीलक 'क्लीं' है। मन्त्र द्वारा ही न्यास होता है। 'जो देवी सरस्वती नाम-रूप के द्वारा अष्टधा बनी हुई तथा निर्विकल्प रूप में भी प्रकट हैं, वे भगवती मेरी रक्षा करने वाली हों।' दिव्य भावों को को प्रकट करने वाली और देवताओं को आनन्दित करने वाली, अज्ञानियों को ज्ञान प्रदान करती हुई यज्ञ में विराजमान
४७६ ] [ सरस्वतीरहस्योपनिषत् होने वाली देवी सब दिशाओं के निमित्त अन्न-जल दुहती है। जो इस मध्यमा वाणी में श्रेष्ठ है, उसका गमन कहाँ होता है ? ॥ ६ ॥ 'देवी वाच' ऋषि भार्गव, छन्द त्रिष्टुप्, देवता सरस्वती । बीज, शक्ति, कीलक 'सौः' है । मन्त्र द्वारा ही न्यास करना चाहिये । 'जिन वाणी रूपा भगवती सरस्वती का प्रकट अप्रकट वाणी वाले देवादि सम्पूर्ण जीव उच्चारण करते हैं तथा जो भगवती सभी इच्छित पदार्थों को दुग्ध रूप में प्रदान करने वाली कामधेनु हैं, वे मेरी रक्षा करें।' ॥ २१-२६ ॥ देवो वाचमिति मन्त्रस्य-भार्गव ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः सरस्वती देवता । सौरिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ २७ ॥ व्यक्ताव्यक्तगिरः सर्वे वेदाद्या व्याहरन्ति याम् । सर्वकामदुधा धेनुः सा मां पातु सरस्वती ॥२८ सौः देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपमुष्टुतैतु ॥२९ उत त्व इति मन्त्रस्य-बृहस्पतिर्ऋषिः । त्रिष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । समिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ ३० ॥ यां विदित्वाऽखिलं बन्धं निर्मथ्या खिलवर्त्मना । योगी याति परं स्थानं सा मां पातु सरस्वती ॥३१ स उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाचमुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्वां विसस्रे जायेव पत्य उशती सुवासाः ॥३२ अम्बितम इति मन्त्रस्य-गृत्समद ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । सरस्वती देवता । ऐमिति बीजशक्तिकीलकम् । मन्त्रेण न्यासः ॥ ३३ ॥
सरस्वतीरहस्योपनिषद् ] [ ४७७ नामरूपात्मकं सर्वं यस्यामावेश्यतां पुनः । ध्यायन्ति ब्रह्मरूपैका सा मां पातु सरस्वती ॥३४ ऐं अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥३५ जो प्रकाशमती वैखरी वाणी प्राण रूप से देवताओं द्वारा उत्पन्न हुई है, उस वाणी का अनेक प्रकार के देहधारी उच्चारण करते हैं । कामधेनु के समान सुख देने वाली तथा अन्न-बल प्रदायिनी वाणी रूपिणी देवी श्रेष्ठ स्तुतियों से प्रसन्न होती हुई हमारे समीप प्रकट हों । ‘उत त्व०’ ऋषि वृहस्पति, छन्द त्रिष्टुप, देवता सरस्वती । बीज शक्ति और कीलक ‘सं’ । मन्त्र द्वारा ही न्यास करना चाहिए । ‘जिन सरस्वती को ब्रह्मविद्या रूप से जान लेने पर योगीराज सभी बन्धनों को काट डालते हैं, जिससे पूर्ण मार्ग द्वारा उन्हें परमपद की प्राप्ति होती है, वे देवी मेरी रक्षा करने वाली हों ।’ वाणी को देखकर भी कुछ लोग उसे नहीं देखते, सुनकर भी नहीं सुनते । परन्तु कुछ लोग तो ऐसे भाग्यशाली हैं जिनके सामने जैसे पतिक्रामा स्त्री अपने पति के समक्ष अनावृत्त रूप में उपस्थित होती है, वैसे ही ये वाग्देवी अपने स्वरूप को प्रकट कर देती हैं । ‘अम्बित मे’ ऋषि गृत्समद, छन्द अनुष्टुप् देवता, सरस्वती, बीज, शक्ति कीलक ‘ऐं’। मन्त्र द्वारा न्यास करें । जिन सरस्वती देवी में ब्रह्मतत्ववेत्ताजन नाम-रूप वाले सम्पूर्ण प्रपञ्च को आविष्ट करते हुए उनका ध्यान करते हैं, वे देवी मेरी रक्षिका हों । हे सरस्वते ! तुम देवियों में, नदियों में और माताओं में भी सर्वश्रेष्ठ हो । हम धन के अभाव से निन्दा को प्राप्त हुए के समान हो रहे हैं । तुम हमें धन रूप समृद्धि दो ॥ २७-३५ ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [सरस्वती रहस्योपनिषत् ४७८ ] चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूमर्म । मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥३६ नमस्ते शारदे देवि काश्मोरपुरवासिनी । त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे ॥३७ अक्षसूत्राङ्कुशधरा पाश पुस्तकधारिणी । मुक्ताहारसमायुक्ता वाचि तिष्ठतु मे सदा ॥३८ कम्बुकण्ठी सुताम्रोष्ठी सर्वाभरणभूषिता । महासरस्वती देवी जिह्वाग्रे संनिवेश्यताम् ॥३९ या श्रद्धा धारणा मेधा वाग्देवी विधिवल्लभा । भक्तजिह्वाग्रसदना शमादिगुणदायिनी ॥४० नमामि यामिनीनाथलेखाऽलंकृतकुन्तलाम् । भवानीं भवसंतापनिर्वापणसुधानदीम् ॥४१ यः कवित्वं निरातङ्कं भुक्तिमुक्ती च वाञ्छति । सोऽभ्यर्च्यैनां दशश्लोक्या नित्यं स्तौति सरस्वतीम् ॥४२ तस्यैवं स्तुवतो नित्यं समभ्यर्च्य सरस्वतोम् । भक्तिश्रद्धाऽभियुक्तस्य षाण्मासात् प्रत्ययो भवेत् ॥४३ ततः प्रवर्तते वाणी स्वेच्छया ललिताक्षरा । गद्यपद्यात्मकः शब्दैरप्रमेयैर्विवशितैः ॥४४ अश्रुतो बुध्यते ग्रन्थः प्रायः सारस्वतः कविः ॥४५ सा होवाच सरस्वती— आत्मविद्या मया लब्धा ब्रह्मणेव सनातने । ब्रह्मत्वं मे सदा नित्यं सच्चिदानन्दरूपतः ॥४६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi