भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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पृष्ठ 489

सरस्वतीरहस्योपनिषत् ] [ ४८१ फिर सत्व, रज और तम इन तीनों गुणों की समानता से प्रकृति रची गई। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब दिखाई देता है वैसे ही प्रकृति में चेतन का प्रतिबिम्ब सत्य के समान लगता है। उस चेतन के प्रतिबिम्ब से प्रकृति तीन प्रकार की लगती है । प्रकृति के योग से ही तुम्हें यह देह मिला है। सत्व गुण की प्रधानता वाली प्रकृति माया कही जाती है। उस माया में प्रतिबिम्बित चेतन ही अजन्मा है। यह माया सब के जानने वाले ब्रह्म की आज्ञाकारिणी उपाधि है। माया को अपने वश में रखना, अद्वितीय और सर्वज्ञ होना यही ब्रह्म के मुख्य लक्षण हैं। यह ब्रह्म सब लोकों के साक्षी स्वरूप होने के कारण संसार की रचना करने, न करने तथा उससे भी भिन्न कार्य करने में पूर्ण समर्थ हैं। विशेष और आवरण माया की यह दो शक्तियां कही गई हैं। विशेष रूप शक्ति लिंगदेह से ब्रह्माण्ड पर्यन्त सभी संसार की रचना करती है। आवरण शक्ति द्रष्टा और दृश्य के अन्तर को तथा ब्रह्म और सृष्टि के अन्तर को ढकने वाली है। साक्षी को वह लिंग-देह वाली प्रतीत होने से बन्धन के देने वाली है। चेतन का प्रतिबिम्ब जब कारण रूपा प्रकृति में निहित होता है तब विश्व में कार्यकारी जीव की उत्पत्ति होती है। आरोपित होने से उसका जीवत्व साक्षी रूप ब्रह्म में भी परिलक्षित होता हैं। आवरण-शक्ति के हट जाने पर भेद का स्पष्ट रूप से आभास होने लगता है और जीवत्व की स्थिति समाप्त हो जाती है। सृष्टि और ब्रह्म के भेद को आवृत करने वाली शक्ति के वशीभूत हुआ ब्रह्म विकारयुक्त प्रतीत होता है। आवरण के हटते ही ब्रह्म और सृष्टि के भेद की प्रतीति होने लगती है। परन्तु विकार की स्थिति ब्रह्म में नहीं होती, सृष्टि में ही होती है। अस्ति, भांति, प्रिय. रूप और नाम इन पांच अंशों में से प्रथम तीन तो ब्रह्म के स्वरूप हैं और नाम, रूप यह दोनों ही विश्व रूपार्थक हैं। दोनों से सम्बन्धित हो जाने पर ही ब्रह्म इस विश्व के रूप में स्थित होता है ।।१६-५०।।