भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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सीतोपनिषत् [ ५१६ वनस्पतियों को शीतोष्ण रूप से और काष्ठों के भीतर बाहर नित्य और अनित्य रूप से अवस्थित हैं ॥ १५ ॥ श्रीदेवी त्रिविधं रूपं कृत्वा भगवत्सङ्कल्पानुगुण्येन लोक- रक्षणार्थं रूपं धारयति श्रीरिति लक्ष्मीरिति लक्ष्यमाणा भवतीति विज्ञायते ॥ १६ ॥ भूदेवी ससागराम्भस्सप्तद्वीपा वसुन्धरा भूरादिचतुर्दशभु- वनानामाधाराधेया प्रणवात्मिका भवति ॥ १७ ॥ नीला च विद्युन्मालिनी सर्वौषधीनां सर्वप्राणिनां पोषणार्थं सर्वरूपा भवति ॥ १८ ॥ समस्तभुवनस्याधोभागे जलाकारात्मिका मण्डूकमयेति भुवनाधारेति विज्ञायते ॥ १९ ॥ क्रियाशक्तिस्वरूपम् । हरेर्मुखान्नादः । तन्नादाद्बिन्दुः । बिन्दोरोंकारः । ओंकारात् परतो रामवैखानसपर्वतः । तत्पर्वते कर्मज्ञानमयोभिर्बहुशाखा भवन्ति ॥ २० ॥ 'अपने श्रीदेवी के रूप में तीन प्रकार का रूप धारण करने वाली सीताजी सब लोकों की रक्षा के हेतु प्रकट होती हैं । उस समय उनका स्वरूप लक्ष्मी रूप में दिखाई देता है । १६ । जो देवी जलमय समुद्रों से युक्त सप्तद्वीपा पृथ्वी के रूप में चौदह भुवनों की आश्रयभूता होती हुईं प्रणव रूप में प्रकट होती है, उनके उस स्वरूप को भूदेवी कहा गया है । १७ । जो देवी सब ओषधियों और प्राणियों के पोषणार्थ सर्वरूपा होने वाला तथा विद्युन्माया के समान मुख वाली होकर नीला- देवी के रूप में व्यक्त होती हैं ॥ १८ ॥ वही आदिशक्ति सब भुवनों के नीचे जल के रूप में और भुवनों के लिए आश्रयमयी होती है । १९ । 'भगवान् श्रीहरि के मुख से उन सीताजी का क्रियाशक्ति रूप