भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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५२६ ] [ राधोपनिषत् शक्तियां कौन हैं, उन शक्तियों में सर्वश्रेष्ठ और सृष्टि का कारण रूप कौन-सी शक्ति कही गई है ?' ब्रह्माजी ने कहा - 'पुत्र ! सुनो मैं इस अति गुह्य वार्ता को तुमसे कहता हूँ, पर इसे हर किसी को मत बतलाना। इसे उसी को बतलाना, जो स्नेहशील हो, ब्रह्मचारी हो, गुरु का भक्त हो, अगर इसके विपरीत अनधिकारी को दिया गया तो बड़ा पाप होगा। भगवान् कृष्ण ही सबसे बड़े देव हैं, वे छहों ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं, गोपी- गोप उनकी सेवा करते हैं, वृन्दा द्वारा आराधना किये जाते हैं, ये वृन्दावन अधीश्वर हैं और एक मात्र सर्वेश्वर हैं। श्री नारायण भी उन्हीं के रूप हैं जो समस्त जगत के स्वामी हैं। श्रीकृष्ण ही प्रकृति से परे और अविनाशी हैं। आह्लादिनी, सन्धिनी, ज्ञानेच्छा, क्रिया इत्यादि इनकी अनेक शक्तियां हैं। इन सब में 'आह्लादिनी' सबसे प्रधान है। यह उनकी सर्वाधिक अन्तरङ्ग है, इन्हीं को 'राधा' कहते हैं। भगवान् कृष्ण स्वयं इनकी आराधना करते हैं। श्री राधाजी सदैव कृष्ण की आराधना करती हैं। राधिका को 'गन्धर्वा' भी कहा जाता है। समस्त गोपियां, श्रीकृष्ण भगवान् की महिषियां और लक्ष्मी का आविर्भाव भी राधाजी के शरीर से ही हुआ है। रस-सागर भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही क्रीडार्थ एक से दो रूपों में विभक्त हो गए हैं। एषा वै हरेः सर्वेश्वरी सर्वविद्या सनातनी कृष्णप्राणाधि- देवी चेति, विविक्ते वेदाः स्तुवन्ति, यस्या गतिं वक्तुं न चोत्स- हे। संव यस्य प्रसीदति तस्य करतलावकलितम्परमधामेति। एतामवज्ञाय यः कृष्णमाराधयितुमिच्छति, स मूढतमोमूढतम- श्चेति। अथ हैतानि नामानि गायन्ति श्रुतयः ॥ श्री राधा सर्वेश्वर भगवान् कृष्ण की भी सर्वेश्वरी हैं, उनकी समस्त विद्याओं में सनातनी हैं, ये श्रीकृष्ण की प्राणों से अधिक प्रिय देवी हैं। चारों वेद भी एकान्त भाव से इनकी स्तुति करते हैं। ब्रह्मज्ञानी ऋषि इनकी गति को जानने और कहते हैं, इनकी महिमा