१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 535, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंराधोपनिषत् [CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri] ५२७ इतनी अधिक है कि मैं चाहे अपनी समस्त आयु उसे कहता रहूं तो भी उसका पार नहीं मिल सकता । ये राधाजी जिस पर प्रसन्न होती हैं उसे तुरन्त परम धाम की प्राप्ति हो जाती है। यदि कोई राधाजी की अवज्ञा करके कृष्ण भगवान् की आराधना करने की इच्छा करता है तो वह सर्वाधिक मूढ़ है। वेदों में श्रीराधाजी के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं। राधा रासेश्वरी रम्या कृष्ण मन्त्राधिदेवता। सर्वद्या सर्ववन्द्यः च वृन्दावन विहारिणी ॥ वृन्दा राध्या रमाऽशेष- गोपी मण्डल पूजिता। सत्या सत्य परा सत्यभामा श्री कृष्ण वल्लभा ॥ वृषभान सुता गोपी मूल प्रकृतिश्वरी । गान्धर्वा राधिका रम्या रुक्मिणी परमेश्वरी ॥ परात्परता पूर्ण पूर्णचन्द्र निभानना। भुक्तिमुक्तिप्रदा नित्यं भव व्याधि विनाशिनी ॥ राधा, रासेश्वरी, रम्या, कृष्ण मंत्राधिदेवता, सर्वाद्या। सर्व- वन्द्या, वृन्दावन विहारिणी, वृन्दाराध्या, रमा अशेष, गोपी मण्डल पूजिता, सत्यासत्यपरा, सत्यभामा, श्रीकृष्ण वल्लभा, वृषभानुसुता, गोपी, मूल-प्रकृति, ईश्वरी, गन्धर्वा, राधिका, रम्याः रुक्मिणी, परमेश्वरी, परात्परता, पूर्णा, पूर्णचन्द्रनिभानना, भुक्तिमुक्तिप्रदा, नित्य, भवव्याधि विनाशिनी, इत्येतानि नामानि यः पठेत् स जीवनमुक्तो भवति । इत्याह हिरण्यगर्भो भगवानीति । सन्धिनी तु धाम भूषणशय्या- सनादिमिव भृत्यातिरूपेण परिणत मृत्युलोकावतरणकाले मातृ- पितृरूपेण चाऽऽसीदित्यनेकावतारकारणज्ञान शक्तिस्तु क्षेत्रज्ञ- शक्तिरिति इच्छन्भूता मायासतवरजस्तमोमयी बहिरङ्गा जगत्कारणभूता सैवाऽविद्यारूपेण जीवसुन्धन भूता क्रियाशक्तिस्तु लीला शक्तिरिति । य इमामुपनिषदमधोतेः सोऽव्रती व्रतीभवति, स वायुपूतो भवति, स सर्वपूतो भतत्रि, राधाकृष्णप्रियो भवति स यावच्चक्षुः पातं पंक्तोः पुनातिः ॐ तत्सत् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi