१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५३० ] [तुलस्युपनिषत् प्रणाम से रोगनाशक, सेवन के मृत्यु दूर करने वाली, विष्णु पूजन करने से ( उनके पूजन में चढ़ाने से ) विपत्तिनाशिका, खाने से प्राणों में शक्ति देने वाली, परिक्रमा से दारिद्रय नाशक, जड़ में मिट्टी लगाने से ( जैसे पौधों को सुरक्षा के लिए मिट्टी लगाई जाती है ) महापाप को भंजन ( समाप्त ) कर देने वाली, सूँघने से अन्दर के मैल को नाश कर देने वाली है। तुलसी को जो इस रूप में श्रद्धापूर्वक देखता है, समझता है, वह सच्चा विष्णुभक्त है। इसे व्यर्थ न तोड़ें। कहीं देख लें तो परि- क्रमा करें। रात को न छूएँ। पर्व के दिन न तोड़ें। यदि तोड़ेगा तो वह विष्णुद्रोही कहलायेगा। श्री तुलसी जो कि विष्णु भगवान् की प्यारी है, अमृत स्वरूप है, उसे नमस्कार पहुँचे। इस विष्णुप्रिय श्री तुलसी का हम ध्यान करते हैं, इसके प्रति अगाध श्रद्धा रखते, हैं, सो वह अमृतस्वरूप हमें अमृतत्व के लिए प्रेरित करे। अमृतेऽमृतरूपासि अमृतप्रदायिनि । त्वं मानुद्धर संसारात् क्षीरसागरकन्यके ॥ श्रीसखि त्वं सदानन्दे मुकुन्दस्य सदा प्रिये । वरदाभयहस्ताभ्यां मां विलोकय दुर्लभे ॥ अवृक्षवृक्षरूपासि वृक्षत्वं मे विनाशय । तलस्यतुलरूपासि तुलाकोटिनिभेऽजरे ॥ अतुले त्वत्तुलायां हि हरिरेकोऽस्ति नान्यथा । त्वमेव जगतां धात्री त्वमेव विष्णुवल्लभा ॥ त्वमेव सुरसंसेव्या त्वमेव मोक्षदायिनी । त्वच्छायायां वसेल्लक्ष्मीस्त्वन्मूले विष्णुरव्ययः । समन्ताद्देवताः सर्वाः सिद्धचारणपन्नगाः । यन्मूले सर्वतीर्थानि यन्मध्ये ब्रह्मदेवताः ॥ हे क्षीर समुद्र की कन्या तुलसी ! तू अमृतस्वरूप है, इसीलिए 'अमृता' कहलाती है। तू अमृतत्व को देने वाली है, तू मुझ इस संसार