भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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तुलसीपनिषत् ] [ ५३१ से उद्धृत कर ले । हे लक्ष्मी की सहेली ! तू सदा आनन्दमय है तथा हमेशा ही विष्णुजी की प्रिय है । हे दुष्प्राप्य ! तू मुझे वरदान तथा अभय की मुद्रा से युक्त हाथों से सुशोभित होकर कृपादृष्टि से देख । यद्यपि तू पेड़ नहीं है, तथापि महात्म्य की अधिकता से वृक्ष ही है, सो तू मेरी अज्ञानता को दूर कर दे । हे तुलसी तू अतुलरूप (जिसके रूप की तुलना नहीं) है । तू जराहीन है । तेरी तुला में करोड़ों तुलाएँ भी नहीं है, तू ही करोड़ों तुलनाओं स्वरूप है । हे तुलनाहीन ! तेरी तुलना में तो केवल एकमात्र भगवान् विष्णु ही टिकते हैं और कोई नहीं तू ही संसार की पालन करने वाली है तथा तू ही भगवान् विष्णु की प्रिय है । तू ही देवताओं द्वारा सेवा करने योग्य तथा मोक्ष देने वाली है । तेरी ही छाया में लक्ष्मी निवास करती है तथा तेरे मूल में (जड़ में) ही भगवान् विष्णु का निवास स्थल है । सारे देवता, सिद्ध, चरण, नाग, जिसके मूल में चारों तरफ से रहते हैं तथा सारे तीर्थ भी जिसके मूल में निवास करते हैं एवम् जिसके मध्य में ब्रह्म देवता रहते हैं । यदग्रे वेदशास्त्राणि तुलसीं तां नमाम्यहम् । तुलसि श्रीसखि शुभे पापहारिणि पुण्यदे ॥ नमस्ते नारदमुने नारायणमनः प्रिये । ब्रह्मानन्दाश्रु संजाते वृन्दावननिवासिनि ॥ सर्वविषयसम्पूर्णे अमृतोपनिषद्रसे । त्वं मामुद्धर कल्याणि महापापाब्धिदुस्तरात् ॥ सर्वेषामपि पापनं प्रायश्चित्तं त्वमेव हि । देवानां च ऋषीणां च पितॄणां त्वं सदा प्रिये ॥ विना श्रीतुलसीं विप्रा येऽपि श्राद्धं प्रकुर्वते । वृथा भवति तच्छ्राद्धं पितॄणां नोपगच्छति । तुलसीपत्रमुत्सृज्य यदि पूजां करोति वै । आसुरी सा भवेत् पूजा विष्णुप्रीतिकरी न च ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi