१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें५३२ ] [ तुलस्युपनिषत् यज्ञं दानं जपं तीर्थं नै देवतार्चनम् । तर्पणं मार्जनं चान्यन्न कुर्यात्तुलसीं विना ॥ तुलसीदारुमणिभिः जपः सर्वार्थसाधकः ॥ एवं न वेद यः कश्चित् स विप्रः श्वपचाधमः ॥ जिसके अग्र भाग में वेदशास्त्र रहते हैं उस तुझ तुलसी को मैं प्रणाम करता हूँ । हे तुलसी ! तू लक्ष्मी की सखि, कल्याणमय, पापहरण करने वाली तथा पुण्यदात्री है । हे विष्णु के मन को अच्छी लगने वाली, नारद से हमेशा प्रणाम किये जाने वाली, स्तुति किये जाने वाली तुलसी ! तू ब्रह्मा के आनन्दाश्रुओं से उत्पन्न है तथा वृन्दावन में निवास करने वाली है । हे सभी अंगों-अवयवों से पूर्ण ! तथा तुलस्युपनिषद् की रस रूप हे कल्याणी ! तू मुझे महापाप के दुस्तर समुद्र से उबार ले । सभी पापों की प्रायश्चित्तभूत तू ही है । तू देवताओं, ऋषियों तथा पितरों की सदा ही अत्यन्त प्रिय है । जो भी ब्राह्मण बिना तुलसी के प्रयोग किये श्राद्ध करते हैं वह श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है तथा पितरों को प्राप्त नहीं होता । यदि कोई तुलसी को छोड़कर (अर्थात् पूजा की वस्तुओं में न रखकर ) पूजन करता है तो वह पूजा आसुरी कही जाती है तथा वह पूजा विष्णु को प्रसन्न करने वाली नहीं होती । यज्ञ, दान, जप, तीर्थ श्राद्ध, देवताओं का पूजन, तर्पण तथा मार्जन तथा अन्य भी इसी प्रकार के धार्मिक कृत्य तुलसी के बिना नहीं करने चाहिए । तुलसी की लकड़ी के मनकों वाली माला सभी इच्छित वस्तुओं की साधिका है । जो कोई ब्राह्मण इस तथ्य को नहीं जानता वह चाण्डाल के समान अथवा उससे भी अधिक नीच है । इत्याह भगवान् ब्रह्माणं नारायणः, ब्रह्मा नारदसनका- दिभ्यः, सनकादयो वेदव्यासाय, वेदव्यासः शुकाय, शुको वाम- देवाय, वामदेवो मुनिभ्यः मुनयो मनुष्यः प्रोचुः । य एवं वेद स स्त्रीहत्यायाःप्रमुच्यते । स वीरहत्यायाः प्रमुच्यते । स ब्रह्म-