१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
५३२ ] [ तुलस्युपनिषत् यज्ञं दानं जपं तीर्थं नै देवतार्चनम् । तर्पणं मार्जनं चान्यन्न कुर्यात्तुलसीं विना ॥ तुलसीदारुमणिभिः जपः सर्वार्थसाधकः ॥ एवं न वेद यः कश्चित् स विप्रः श्वपचाधमः ॥ जिसके अग्र भाग में वेदशास्त्र रहते हैं उस तुझ तुलसी को मैं प्रणाम करता हूँ । हे तुलसी ! तू लक्ष्मी की सखि, कल्याणमय, पापहरण करने वाली तथा पुण्यदात्री है । हे विष्णु के मन को अच्छी लगने वाली, नारद से हमेशा प्रणाम किये जाने वाली, स्तुति किये जाने वाली तुलसी ! तू ब्रह्मा के आनन्दाश्रुओं से उत्पन्न है तथा वृन्दावन में निवास करने वाली है । हे सभी अंगों-अवयवों से पूर्ण ! तथा तुलस्युपनिषद् की रस रूप हे कल्याणी ! तू मुझे महापाप के दुस्तर समुद्र से उबार ले । सभी पापों की प्रायश्चित्तभूत तू ही है । तू देवताओं, ऋषियों तथा पितरों की सदा ही अत्यन्त प्रिय है । जो भी ब्राह्मण बिना तुलसी के प्रयोग किये श्राद्ध करते हैं वह श्राद्ध व्यर्थ हो जाता है तथा पितरों को प्राप्त नहीं होता । यदि कोई तुलसी को छोड़कर (अर्थात् पूजा की वस्तुओं में न रखकर ) पूजन करता है तो वह पूजा आसुरी कही जाती है तथा वह पूजा विष्णु को प्रसन्न करने वाली नहीं होती । यज्ञ, दान, जप, तीर्थ श्राद्ध, देवताओं का पूजन, तर्पण तथा मार्जन तथा अन्य भी इसी प्रकार के धार्मिक कृत्य तुलसी के बिना नहीं करने चाहिए । तुलसी की लकड़ी के मनकों वाली माला सभी इच्छित वस्तुओं की साधिका है । जो कोई ब्राह्मण इस तथ्य को नहीं जानता वह चाण्डाल के समान अथवा उससे भी अधिक नीच है । इत्याह भगवान् ब्रह्माणं नारायणः, ब्रह्मा नारदसनका- दिभ्यः, सनकादयो वेदव्यासाय, वेदव्यासः शुकाय, शुको वाम- देवाय, वामदेवो मुनिभ्यः मुनयो मनुष्यः प्रोचुः । य एवं वेद स स्त्रीहत्यायाःप्रमुच्यते । स वीरहत्यायाः प्रमुच्यते । स ब्रह्म-
तुलस्युपनिषत् [ ५३३ हत्यायाः प्रमुच्यते । स महाभयात् प्रमुच्यते । स महादुःखात् प्रमुच्यते । देहान्ते वैकुण्ठमवाप्नोति वैकुण्ठमवाप्नोति । इत्युपनिषत् ॥ यह सब भगवान् नारायण ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने नारद सन- कादियों को, सनकादि ने वेदव्यास को, वेदव्यास ने शुकदेवजी को, शुकदेव ने वामदेव को, वामदेव ने अन्य मुनियों की तथा मुनियों ने मनुष्यों को कहा। जो इसको ( तथ्य को ) जानता है वह स्त्री-हत्या से मुक्त हो जाता है। वह वीरहत्या से मुक्त हो जाता है। वह ब्रह्महत्या, महा-भय, महा-दुःख आदि से भी छूट जाता है और शरीर समाप्ति पर निश्चित वैकुण्ठ में वास प्राप्त कर लेता है। ॥ तुलस्युपनिषद् समाप्त ॥ —०—
सूर्योपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिःशृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्ता- क्ष्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाले इन्द्र हमारा कल्याण करें, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥
हरिः ॐ । अथ सूर्याथर्वाङ्गिरसं व्याख्यास्यामः । ब्रह्मा ऋषिः गायत्री छन्दः । आदित्यो देवता । हंसः सोऽहमग्निनारा- यणयुक्तं बीजम् । हृल्लेखा शक्तिः । वियदादिसर्गसंयुक्तं कीलकम् । चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे विनियोगः । षट्स्वरारूढेन बीजेन षडङ्गं रक्ताम्बुजसंस्थितं सप्ताश्वरथिनं हिरण्यवर्णं चतु- भुजं पद्मद्वयाभयवरदहस्तं कालचक्रप्रणोतारं श्रीसूर्यनारायणं य एवं वेद स वै ब्राह्मणः ॥ १ ॥
ॐ भूर्भुवः सुवः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ २ ॥
नारायणोपनिषत् ] [ ५३५ ॐ । पुरुष रूप नारायण ने कामना की कि प्रजा की सृष्टि होनी चाहिये । तब नारायण में से प्राण की उत्पत्ति हुई, और मन तथा सब इन्द्रियों की उत्पत्ति भी उन्हीं से हुई । आकाश, वायु, ज्योति, जल और पृथ्विी, जो विश्व को धारण करती है, इन सब पञ्च भूतों की उत्पत्ति भी नारायण से हुई । नारायण से ही ब्रह्माजी उत्पन्न हुये, नारायण से रुद्र की उत्पत्ति हुई । नारायण से इन्द्र उदन्न हुये । नारायण से प्रजा- पति उत्पन्न हुये । नारायण से ही बारह आदित्य, रुद्र, आठ वसु और सब प्रकार के छन्दों की उत्पत्ति हुई । ये नारायण में से ही आते हैं और उसी में लय को प्राप्त होते हैं। ऋग्वेद के इस शिरोमण ( श्रेष्ठ अङ्ग ) का विद्वान अध्ययन करते हैं ॥ १ ॥ नारायण नित्य रूप है, नारायण ब्रह्मा रूप है, नारायण शिव रूप है, नारायण चक्र रूप है, नारायण काल रूप है, नारायण दिशा रूप है, नारायण विदिशा रूप है, नारायण ही ऊपर है, नारायण ही नीचे है, नारायण ही भीतर और बाहर है । जो कोई उत्पन्न हुआ है, और उत्पन्न होगा वह सब नारायण रूप ही है । एक मात्र नारायण ही निष्कलङ्क, निरंजन, निर्विकल्प, निराख्यात ( वर्णन से रहित ) और शुद्ध देव है, इनके अतिरिक्त और कहीं कोई नहीं है । जो इस प्रकार जानता है वह विष्णुरूप हो जाता, वह विष्णु के समान हो जाता है। विद्वान लोग यजुर्वेदोक्त इस श्रेष्ठ तत्व का अध्ययन करते हैं ॥ २ ॥ ॐ मित्यग्रे व्याहरेत् । नम इति पश्चात् । नारायणा- येत्युपरिष्टात् । ॐ मित्येकाक्षरम् ॥ नम इति द्वे अक्षरे । नारायणायेति पञ्चाक्षराणि । एतद्वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदम् । यो ह वै नारायणस्याष्टाक्षरं पदमध्येति । अनपब्रुवः सर्वमामु- रेति । विन्दते प्राजापत्यं रायस्पोषं गौपत्यं ततोऽमृतत्वमश्नुते ततोऽमृतत्वमश्नु इति । एतत्सामवेदशिरोऽधीते ॥ ३ ॥ प्रत्यगा- नन्दं ब्रह्मपुरुषं प्रणवस्वरूपम् । अकार उकारो मकार इति ।
५३६ ] [ नारायणोपनिषत् ता अनेकधा समभवत्तदेतदोमिति वमुक्त्वा मुच्यते योगी जन्म- संसारबन्धनात् । ॐ नमो नारायणायेति मन्त्रोपासको वैकुण्ठ- भुवनं गमिष्यति । तदिदं पुण्डरीकं विज्ञानघनं तस्मात्तडिदाभ- मात्रम् । ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो मधुसूदनः । ब्रह्मण्यः पुण्डरीकाक्षो ब्रह्मण्यो विष्णुरच्युत इति । सर्वभूतस्थमेकं वै नारायणं कारणपुरुष मकारणं परं ब्रह्मोम् । एतदथर्वशिरोऽधी- ते ॥ ४॥ प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायम- धीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत्सायं प्रातरधीयानो पापोऽपापो भवति । मध्यंदिनमादित्याभिमुखोऽधीयानः पञ्च- महापातकोपपातकात्प्रमुच्यते । सर्ववेदपरायणपुण्यं लभते । नारायणसायुज्यमवाप्नोति श्रीमन्नारायणसायुज्यमवाप्नोति य एवं वेद । आरम्भ में 'ॐ' का उच्चारण करना, उसके पीछे नमः उच्चारण करना, और अन्त में 'नारायणेति' का उच्चारण करना । 'ॐ' में एक अक्षर है, 'नमः' में दो अक्षर हैं, और 'नारायणेति' में पाँच अक्षर हैं। इस प्रकार यह नारायण का आठ अक्षर का मन्त्र होता है, इसका जप और ध्यान करने से मनुष्य अकालमृत्यु से बचकर पूर्ण आयु को भोगता है । उसे प्रजा ( स्त्री पुत्र आदि ), धन सम्पत्ति की और गौ आदि पशुओं की प्राप्ति होती है । अन्त में वह अमृतत्व को प्राप्त होता है । सामवेद के इस शिरोभाग का विद्वज्जन अध्ययन करते हैं । 'अ'कार, 'उ'कार और 'म'कार युक्त यह प्रत्यक् (ॐ) आनन्द रूप, ब्रह्मपुरुष रूप और प्रणव स्वरूप है । यह अनेक प्रकार से सम- मात्रा है, इसको 'ॐ' करते हैं और इसके जप से योगीजन संसार के समस्त बन्धनों और बार-बार जन्म लेने से छूट जाते हैं । 'ॐ नमो नारायणेति' इस मन्त्र की उपासना करने वाला वैकुण्ठ धाम को जाता
नारायणोपनिषत् [ ५३७ है। यह पुण्डरीक (हृदय रूपी कमल) विज्ञान रूप है, इससे विद्युत की आभा प्रकट होती है। ब्रह्म को ही देवकी पुत्र कहा जाता है, वे ही मधुसूदन हैं, वे ही पुण्डरीकाक्ष हैं और वे ही विष्णु तथा अच्युत हैं। सर्व प्राणी मात्र में वे ही नारायण रहते हैं, वे कारण पुकार होते हुए भी कारण रहित हैं, वे ही परब्रह्म हैं। विद्वान लोग अथर्व वेद से इस शिरोभाग (सार भाग) का अध्ययन करते हैं ॥ ४ ॥ प्रातः समय इस मन्त्र का जप करने से रात्रि में जो पाप किये हों वे सब नष्ट हो जाते हैं और इसी प्रकार सायंकाल को जप करने से दिन के पाप दूर होते हैं। इस प्रकार प्रातः और सायं इसका जप करने से मनुष्य निष्पाप हो जाता है। दिन के मध्य (दोपहर) को सूर्य के सम्मुख इसका जप करने से पंच महापातकों और उपपातकों से छुटकारा हो जाता है। उसे सब वेदों के परायण का फल प्राप्त होता है और नारायण का सायुज्य प्राप्त होता है। इस प्रकार जानने से नारायण से साक्षात्कार होता है ॥ ५ ॥ ॥ नारायणोपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—
नारायणोपनिषत्
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। ब्रह्म हम दोनों (गुरु-शिष्य) की साथ ही रक्षा करो, हम दोनों का साथ ही पालन करो, हम दोनों एक साथ ही पराक्रम करें, हम दोनों का अध्ययन पराक्रमी हो, दोनों किसी का द्वेष न करें। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥
ॐ अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत प्रजाः सृजेयेति। नारायणात्प्राणो जायते। मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्यो- तिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणीं। नारायणाद्ब्रह्मा जायते। नारायणद्रुद्रो जायते। नारायणादिन्द्रो जायते। नारायणात्प्र- जापतिः प्रजायते। नारायणाद्द्वादशादित्या रुद्रा वसवः सर्वाणि छन्दासि नारायणादेव समुत्पद्यन्ते। नारायणात्प्रवर्तन्ते। नारायणे प्रलीयन्ते। एतदृग्वेदशिरोऽधीते ॥१॥ अथ नित्यो नारायणः। ब्रह्मा नारायणः। शिवश्च नारायणः। शक्रश्च नारायणः। कालश्च नारायणः दिशश्च नारायणः। विदिशश्च नारायणः। ऊर्ध्वं च नारायणः। अधश्च नारायणः। अन्त- र्बहिश्च नारायणः। नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। निष्कलङ्को निरञ्जनो निर्विकल्पो निराख्यातः शुद्धो देव एको नारायणो न द्वितीयोऽस्ति कश्चित्। य एवं वेद स विष्णुरेव भवति स विष्णुरेव भवति। एतद्यजुर्वेदशिरोऽधीते ॥२॥
सूर्योपनिषत् [ ५३६ सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । सूर्याद्वै खल्विमानि भूतानि जायन्ते । सूर्याद्यज्ञः पर्जन्योऽन्नमात्मा ॥ ३ ॥ नमस्त आदित्य । त्वमेव प्रत्यक्षं कर्मकर्ताऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्माऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षं विष्णुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं रुद्रोऽसि । त्वमेव प्रत्यक्षमृगसि । त्वमेव प्रत्यक्ष यजुरसि । त्वमेव प्रत्यक्षं सामासि । त्वमेव प्रत्यक्षमथर्वाऽसि । त्वमेव सर्वं छन्दोऽसि ॥ ४ ॥ • आदित्याद्वायुर्जायते । आदित्याद्भूमिर्जायते । आदित्य- दापो जायन्ते । आदित्याज्ज्योतिर्जायते । आदित्याद्व्योम दिशो जायन्ते । आदित्याद्देवा जायन्ते । आदित्याद्वेदा जायन्ते । आदित्यो वा एष एतन्मण्डलं तपति । असावादित्यो ब्रह्म । आदित्योऽन्तःकरणमनोबुद्धिचित्ताहङ्काराः । आदित्यो वै व्यानः समानोदानोऽपानः प्राणः । आदित्यो वै श्रोत्रत्वक्चक्षूरसन- घ्राणः । आदित्यो वै वाक्पाणिपादपायूपस्थाः । आदित्यो वै शब्दस्पर्शरूप रसगन्धाः । आदित्यो वै वचनादानागमनविसर्गा- नन्दाः । आनन्दमयो विज्ञानमयो विज्ञानमय आदित्यः ॥ ५ ॥ अब सूर्य-सम्बन्धी अथर्ववेदीय मन्त्रों की व्याख्या की जाती है । इस मन्त्र के ऋषि ब्रह्मा, छन्द गायत्री, देवता सूर्य हैं । 'हंसः' 'सोऽहं' अग्निनारायण युक्त बीज तथा हृल्लेखा शक्ति है । कीलक वियत् आदि सृष्टि से संयुक्त है । इसका विनियोग चारों प्रकार की पुरुषार्थ-सिद्धि में करते हैं । छः स्वरों पर प्रतिष्ठित बीज सहित षडाङ्ग रक्तकमल पर स्थित, सात अश्वों से युक्त रथ पर आरूढ़, हिरण्यवर्ण, चार भुजाओं में दो कमल, वरमुद्रा और अभयमुद्राधारी कालचक्र के विधायक सूर्य को इस भांति जानने वाला ही ब्राह्मण है, ॥ १ ॥ जो सूर्य नारायण प्रणव के अर्थभूत सत्-चित्-आनन्दमयं तथा भूः भुवः स्वः रूप से त्रैलोक्य रूप
५४० ] [ सूर्योपनिषत्
हैं, उन्हीं विश्व-रचयिता के महान् तेज का हम चिन्तन करते हैं। वे भगवान हमारी बुद्धियों के प्रेरक हैं ॥ २ ॥ सूर्य सम्पूर्ण स्थावर जङ्गम के आत्मा हैं। इन्हीं से इन भूतों की उत्पत्ति होती है। उन्हीं से यज्ञ, मेघ और आत्मा आविर्भूत होते हैं ॥ ३ ॥ हे आदित्य ! हम तुम्हें नम- स्कार करते हैं। तुम्हीं कर्म और कर्त्ता हो, तुम्हीं ब्रह्मा और विष्णु हो। तुम्हीं रुद्र एवं ऋक्, यजु, साम और अथर्व हो। तुम सम्पूर्ण छन्द रूप हो ॥ ४ ॥ आदित्य से वायु, भूमि, जल, ज्योति, आकाश और दिशाएँ उत्पन्न होती हैं। उन्हीं से देवता प्रकट होते हैं। उन्हीं से वेदों की उत्पत्ति है। इस ब्रह्माण्ड को आदित्य ही तपाते हैं। वही ब्रह्म हैं। वही अन्तःकरण रूप हैं। वही पाँचों प्राण के रूप में प्रतिष्ठित हैं। वही पंचेन्द्रिय के रूप में कार्य करते हैं। वही पंच कर्मेन्द्रिय हैं। ज्ञानेन्द्रियों के पञ्च विषय भी वही हैं। कर्मेन्द्रियों के पाँच विषय आदित्य ही हैं। वे ही ज्ञान-विज्ञान से युक्त एवं आनन्दमय हैं ॥ ५ ॥
नमो मित्राय भानवे मृत्योर्मा पाहि। भ्राजिष्णवे विश्व- हेतवे नमः । सूर्याद्भवन्ति भूतानि सूर्येण पालितानि तु । सूर्ये लयं प्राप्नुवन्ति यः सूर्यः सोऽहमेव च ॥ चक्षुर्नो देवः सविता चक्षुर्न उत पर्वतः । चक्षुर्धाता दधातु नः ॥ आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि । तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् । सविता पुरस्तात् सविता पश्चात्तात् सवितोत्तरात्तात् सविताऽधरात्तात् । सविता नः सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायुः ॥६
यः सदाऽहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति स वै ब्राह्मणो
सूर्योपनिषत् [ ५४१ ॐ इत्येकाक्षरं ब्रह्म । घृणिरिति द्वे अक्षरे । सूर्य इत्यक्षरद्वयम् । आदित्य । इति त्रीण्यक्षराणि । एतस्यैव सूर्यस्याष्टाक्षरो मनुः ॥७॥ यः सदाऽहरहर्जपति स वै ब्राह्मणो भवति स वै ब्राह्मणो भवति । सूर्याभिमुखो जप्त्वा महाव्याधिभयात् प्रमुच्यते । अलक्ष्मीर्नश्यति । अभक्ष्यभक्षणात् पूतो भवति । अगम्यागमनात् पूतो भवति । पतितसंभाषणात् पूतो भवति । असत्संभाषणात् पूतो भवति । मध्याह्ने सूर्याभिमुखः पठेत् । सद्योत्पन्नपञ्चमहा- पातकात् प्रमुच्यते । सैषा सावित्री विद्यां (द्या) न किंचिदपि न कस्मैचित् प्रशंसयेत् । य एतां महाभागः प्रातः पठति स भाग्यवान् जायते । पशून् विन्दति । वेदार्थं लभते । त्रिकाल- मेतज्जप्त्वा ऋतुशतफलमवाप्नोति । हस्तादित्ये जपति स महामृत्युं तरति स महामृत्युं तरति य एवं वेद । इत्युपनिषत् ।८। मित्र देवता और भगवान् सूर्य को नमस्कार है। भगवन् ! मृत्यु से मेरी रक्षा करो ! विश्व के कारण रूप एवं तेजस्वी सूर्य को नमस्कार है । सूर्य से ही सब चराचर प्राणियों की उत्पत्ति है । वे ही उनका पालन करते हैं तथा अन्त में सब जीव उन्हीं में लीन हो जाते हैं। जो सूर्य हैं, वही मैं हूँ। सविता देव हमारे चक्षु हैं। सब के धारण करने वाले सूर्य हमारे नेत्रों को देखने की शक्ति प्रदान करने वाले बनें । 'हम आदित्य को जानते हैं। इस सहस्ररश्मि वाले भगवान् भास्कर का ध्यान करते हैं। वे सूर्य हमें प्रेरणा दें।' पीछे-आगे, इधर-उधर सब ओर सविता देव हैं । वे सविता देव हमारे निमित्त सब कुछ उत्पन्न करें। वे हमें दीर्घायु दें। ॐ रूप एकाक्षर मन्त्र ब्रह्म है। 'घृणि' और 'सूर्य' दो-दो अक्षरों के मन्त्र हैं। 'आदित्य' में तीन अक्षर हैं। इन सब के योग से सूर्य नारायण का अष्टाक्षर महामन्त्र हो जाता है ॥ ७ ॥ इस
५४२ ] [ सूर्योपनिषत् मन्त्र को नित्य प्रति जपने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। सूर्य की ओर मुख करके जाप करने से घोर रोग से छुटकारा मिलता है। दरिद्रता दूर होती और पाप नष्ट होते हैं। मध्याह्न काल में सूर्याभिमुख जप करने से हाल में उत्पन्न हुए पञ्च महापापों से मुक्त होता है। इस सावित्री विद्या की कहीं कुछ प्रशंसा न करे। प्रातःकाल पाठ करने वाले की भाग्यवृद्धि होती है। उसे पशु, धन आदि के साथ ही वेदार्थ ज्ञान की उपलब्धि होती है। त्रिकाल जप से सैकड़ों यज्ञों का फल मिलता है। सूर्य के हस्त नक्षत्र पर रहते हुए इसका जप करने वाला महामृत्यु से पार होता है तथा इस प्रकार जानने वाला भी महामृत्यु को लाँघ जाता है। ॥ सूर्योपनिषद् समाप्त ॥
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
भावनोपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्ताक्षर्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ शान्तिपाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें। महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥ श्री गुरुः परम कारणभूता शक्तिः ॥ १ ॥ केन ! नवरन्ध्ररूपो देहो नवशक्तिमयं श्रीचक्रम् । वाराही पितृरूपा कुरुकुल्ला बली देवता माता । पुरुषार्थाः सागराः । देहो नवरत्नद्वीपः । आधारनवमुद्राः शक्तयः । त्वगादिसप्तधातुभिरनेकैः संयुक्ताः संकल्पा कल्पतरवः । तेजः कल्पकोद्यानम् । रसनया भाव्यमाना मधुराम्लतिक्तकटुकषायलवणरसा षडृतवः । क्रिया- शक्तिः पीठम् । कुण्डलिनी ज्ञानशक्तिर्गुहम् । इच्छाशक्तिर्महात्रि- पुरसुन्दरी ज्ञाता होता । ज्ञानमर्घ्यम् ज्ञेयं हविः । ज्ञातृज्ञान- ज्ञेयानामभेदभावनं श्रीचक्रपूजनम् । नियतिसहितशृङ्गारादयो नव रसा अणिमादयः । कामक्रोधलोभमोहमात्सर्यपुण्यपापमया
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
५४४ ] [ भावनोपनिषत् ब्राह्माद्यष्टशक्तयः । पृथिव्यापस्तेजोवाय्वाकाशश्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वा- घ्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थविकाराः षोडश शक्तयः । वचनादान- गमनविसर्गानन्दहानोपादानोपेक्षाबुद्धयोऽनङ्गकुसुमादिशक्तयोऽष्टौ । अलम्बुसा कुहूविश्वोदरी वरुणा हस्तिजिह्वा यशस्वत्यश्विनी गान्धारी पूषा शङ्खिनी सरस्वतीडा पिङ्गला सुषुम्ना चेति चतुर्दश नाड्यः सर्वसंक्षोभिण्यादिचतुर्दशारदेवताः । प्राणापानव्यानोदान- समाननागकूर्मकृकरदेवदत्तधनंजया दश वायवः सर्वसिद्धि प्रदाऽऽ- दिवहिर्दशारदेवताः । एतद्वायुतशसंसर्गोपाधिभेदेन रेचकपूरकशो- षकदाहकपावका अमृतमिति प्राणमुख्यत्वेन पञ्चविधोऽस्तिं । मनुष्याणां मोहको देहको भक्ष्यभोज्यलेह्यचोष्यपेयात्मकं चतुर्विध- मन्नं पाचयंति । एता दश धनकलाः सर्वज्ञत्वाद्यन्तर्दशारदेवताः । शीतोष्णसुखदुःखेच्छासत्वरजस्तमोगुणा वशिन्यादिशक्तयोऽष्टौ । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्चतन्मात्राः पञ्च पुष्पबाणा मन इक्षु- धनुः । वश्यो बाणो रागः पाशो द्वेषोऽङ्कुशः । अव्यक्तमहत्तत्वा- हंकारकामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिन्योऽन्तस्त्रिकोणाग्रगा देवताः । पञ्चदशतिथिरूपेण कालस्य परिणामावलोकनं पञ्चदश नित्या श्रद्धाऽनुरूपाधिदेवता । तयोः कामेश्वरी सदानन्दघना पूर्णा स्वात्मैक्यरूपा देवता ॥ २ ॥ श्री गुरु ही सर्व प्रधानभूत शक्ति हैं । (गुरु शब्द का अर्थ है गु अर्थात् अपने अज्ञान को रु अर्थात् अपने ज्ञान से जो नष्ट करदे ।) (इन्हीं की कृपा से ईशत्व की प्राप्ति होती है)। १। किस कारण से देह में श्रीचक्रत्व सिद्ध होता है ? नौ छेदों से युक्त शरीर है और विमल से लेकर ईशान तक नौ शक्तियों से युक्त श्रीचक्र है। इसकी माता कुरु कुल्ला देवी तथा वाराही पिता के रूप में हैं। पुरुषार्थ उद्योग (परिश्रम) चारों पुरुषार्थ, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ही इसके चार समुद्र हैं । देह ही नवरत्न द्वीप है। इस द्वीप की आधारभूत शक्तियाँ योनिमुद्रा आदि
भावनोपनिषत् ] [ ५४५ सर्व संक्षोभिणी पर्यन्तवर्णित महात्रिपुरसुन्दरी आदि नौ हैं। त्वचा, आदि सात धातुओं से मुक्त संकल्प-विकल्प ही कल्पवृक्ष है। उस परमात्मा से भिन्न प्रतीयमान तेज स्वरूप-सा जीव ही उद्यान है। जीभ के द्वारा आस्वादित किये जाने वाले मधुर, अम्ल, तिक्त (खट्टा, तीखा) कड़वा, कषैला और नमकीन रस छः ऋतुयें हैं। क्रिया नामक जो शक्ति वही पीठ है। कुण्डलिनी रूप ज्ञान शक्ति ही घर है। इच्छा शक्ति ही महा- त्रिपुरसुन्दरी नामक आराध्य भगवती है। जानने वाला, ही हवन करने वाला, ज्ञान ही अर्घ्य एवं जानने लायक वस्तुयें ही हविरूप (हवन करने का द्रव्य) हैं। ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय को अभेद मानना ही श्रीचक्र का पूजन है। नियति (भाग्य) से मुक्त शृङ्गार, वीर, करुणा आदि नौ रस ही अणिमा, महिमा, गरिमा आदि दश सिद्धियां हैं। काम, क्रोध, लोभ, मद, मात्सर्य पुण्य तथा पाप से युक्त ब्राह्मी आदि आठ शक्तियां हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, कान, त्वचा, आंख, जीभ, नाक, वाणी, हाथ, मूलमूत्रेन्द्रियां आदि विकार ही सोलह शक्तियां हैं। वाचनादान, गमन, विसर्ग, आनन्द, दान, उपादान, उपेक्षा, बुद्धि तथा अनङ्ग कुसुम आदि आठ शक्तियां हैं। आलम्बुसा, कुहू, विश्वोदरी, वरुणा, हस्तिजिह्वा, यशस्विनी, अश्विनी, गान्धारी पूषा, शंखिनी, सरस्वती, इडा, पिङ्गला, सुषुम्ना ये चौदह नाड़ियां सर्व संक्षोभिणी आदि चौदह देवतात्मक हैं। प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, धनञ्जय ये दश वायु सर्व सिद्धिप्रद आदि बाह्यमुख दशारदेवता प्रधान हैं इन दश वायुओं के सम्पर्क एवं स्थान भेद से, रेचक, पूरक, शोषक, दाहक, प्लावक अमृत ये पांच रूप में वायु प्रधान हैं अर्थात् इन पाँच नाम से ये वायु प्रधानतया गृहीत होते हैं, तथा मनुष्यों के मोहक, तथा दाहक होते हुए चबाये जाने वाले, चाटे जाने वाले, चूसे जाने वाले तथा पिये जाने वाले इन चार प्रकार के अन्न को पकाते हैं। ये दश अग्नि की कला स्वरूप वायु ही सर्वज्ञत्व आदि अन्तर्दशारदेवतात्मक हैं। शीत, उष्ण, सुख, दुःख,
५४६ ] [ भावनोपनिषत् इच्छा, सत्त्व, रज, तम आदि ही वशिनी आदि आठ शक्तियां हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि पंच तन्मात्रायें ही पाँच पुष्पों के बाण हैं और मन ही ईख का बना धनुष है (अर्थात् मन से ये रूपादि फेंके जाते हैं।) वश में होना ही वाण है, राग (प्रेम) ही पाश (बन्धन) है, द्वेष ही अंकुश है। अव्यक्त, महत्तत्व, अहंकार, कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी आदि आन्तरिक त्रिकोण के अग्रस्थित देवता हैं। पन्द्रह तिथियों के रूप से काल के परिणाम को देखना, पन्द्रह नित्य श्रद्धानुरूप अधिदेवता हैं। उनमें (वज्रेश्वरी तथा भगमालिनी में) आद्या प्रधान कामेश्वरी हैं जो कि सत्, चित्, आनन्द घनस्वरूप हैं। तथा परमा मैंक रूपादेवता हैं ॥ १ ॥ (सारांश यह हुआ कि इन आयु के वशीकरण से रूपादि को वश में रखने से कुण्डलिनी, जीव, आत्मा आदि के ज्ञान को भली भाँति प्राप्त कर सर्वत्र एकभाव-भावना ही भावनोपनिषद है जो कि मोक्ष का खुला द्वार है ) ॥ २ ॥ सलिलं सौहित्यकारणं सत्त्वं कर्तव्यमकर्तव्यमिति भावना- युक्त उपचारः । अस्ति नास्तीति कर्तव्यता उपचारः । बाह्या- भ्यन्तःकरणानां रूपग्रहणयोग्यताऽस्त्वित्यावाहनम् । तस्य बाह्या- भ्यन्तःकरणानामेकरूपविषयग्रहणमासनम् । रक्तशुक्लपदैकीकरणं पाद्यम् । उज्ज्वलदामोदानन्दासनं दानमर्घ्यम् । स्वच्छं स्वतः- सिद्धमित्याचमनीयम् । चिच्चन्द्रमयीसर्वाङ्गस्रवणं स्नानम् । चिदग्निस্বরূপपरमानन्दशक्तिस्फुरणं वस्त्रम् । प्रत्येक सप्तविंश- तिधा भिन्नत्वेनेच्छाज्ञानक्रियाऽऽत्मब्रह्मग्रन्थिभद्रसतन्तुब्रह्मनाडी ब्रह्मसूत्रम् । स्वव्यतिरिक्तवस्तुसङ्गरहितस्मरणं विभूषणम् । स्वच्छस्वपरिपूर्णानुस्मरणं गन्धः । समस्तविषयाणां मनसः स्थैर्येणानुसंधानं कुसुमम् । तेषामेव सर्वदा स्वीकरणं धूपः । पवनावच्छिन्नोर्ध्वज्वलनसच्चिदुल्काऽऽकाशदेहो दीपः । समस्त- यातायतवर्ज्यं नैवेद्यम् । अवस्थात्रयैकीकरणं ताम्बूलम् ! मूला-
भावनोपनिषत् ] [ ३४७ धारादाब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं ब्रह्मरन्ध्रादामूलाधारपर्यन्तं गतागतरूपेण प्रादक्षिणम् । तुर्यावस्था नमस्कारः । देहशून्यप्रमातृतानिमज्जनं बलिहरणम् । सत्वमस्ति कर्तव्यमकर्तव्यमौदासीन्यनित्यात्म- विलापनं होमः । स्वयं तत्पादुका निमज्जनं परिपूर्णध्यानम् ॥३॥ सलिल तथा गुह मन्त्रात्मक देवताओं का एकीकरण रुद्र जो सत्व ही कर्तव्य है इस भावना से युक्त ही इसका उपचार है (पूजा) है । ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं है, यह जो कर्तव्यता यह भी उपचार है । ब्रह्म तथा आभ्यन्तर के कारणों की रूप ग्रहण की योग्यता ही यही आवाहन है । उसका बाह्य तथा आभ्यन्तर कारणों का एक रूप विषयों का ग्रहण करना ही आसन है । केवल-कुम्भक से सुषुम्ना प्रवेश के अनन्तर मूलाधार तथा भौंहों के मध्य में स्थित प्रत्येक ओर पर-नाम के लाल तथा सफेद पदों का एकीकरण ही पाद्य है । अपने शिष्यों को यह उपदेश करना कि ब्रह्माभिन्न सदोज्वल दामोदानन्द रूप से स्थिति हमेशा करनी चाहिये यह अर्घ्य है । स्वयं स्वच्छ तथा स्वतः सिद्ध ही आचमनी है । चिद्रूप चन्द्रमयी के सर्वाङ्गों का स्मरण ही स्नान है । चिद् अग्नि स्वरूप परमात्मक शक्ति का स्फुरण ही (प्रकाशित होना) वस्त्र है । इच्छा आदि तीन शक्तियों के त्रिगुणात्मक होने से प्रत्येक के जो सत्ताईस भेद तथा इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया शक्ति स्वरूप ब्रह्मग्रन्थि मन्द्रस्स नाड़ी सुषुम्ना यही ब्रह्मसूत्र हैं । क्योंकि यही ब्रह्म की द्योतिका हैं । अपने से भिन्न वस्तु का स्मरण न करना ही आभूषण है । स्वच्छ स्वरूप जो ब्रह्म उससे भिन्न कुछ नहीं हैं यही स्मरण करना गन्ध है । सब विषयों का मन की स्थिरता से अनुसन्धान ही फूल हैं और उन्हीं को स्वीकार करना धूप है । वाय्वात्मक (वायु युक्त) योग के समय प्राण अपान की एकता से सुषुम्ना में सत्, चित्, आनन्द, उल्कारूप जो (प्रकाश है) आकाश देह है वही दीप है । अपने से भिन्न सभी विषयों में मन की गति का जाना-आना रुक जाना (न होना) ही नैवेद्य है । तीनों
५४८ ] [ भावनोपनिषत् अवस्थाओं का एकीकरण ही पान है । मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्त तथा ब्रह्मरन्ध्र से मूलाधार बार-बार गतागत करना ( आना-जाना ) ही प्रदक्षिणा है । चतुर्था अवस्था में स्थित रहना ही नमस्कार है । देह की जड़ता में डूबना (अर्थात् आत्मा को चैतन्य मानकर देह को जड़ मानकर स्थित रहना ही ) बलि है । अपनी आत्मा सत्व स्वरूप है, यह निश्चित करके कर्तंग्य, अकर्त्तव्य, उदासीनता, नित्यात्मक, विलापन (अत्म-चिन्तना- सक्ति) ही यज्ञ (होम) है। तथा स्वयं उस परब्रह्म की पादुकाओं में डूवे रहना ही परिपूर्ण ध्यान है। सारांश यह हुआ कि जैसे पूजा के लिये धूप, दीप, गन्ध, नैवेद्य, दक्षिणा, नमस्कार, प्रदक्षिणादि आदि अपे- क्षित होती हैं वैसे ही परब्रह्म की प्राप्ति के लिये ऊपर बताई गई वस्तुओं का साधन कर लेना ही तद्तद् धूप दीप आदि हैं। इन्हीं से वह ब्रह्म दृष्टिगोचर हो जाता है ॥ ३ ॥ एवं मुहूर्त्तत्रयं भावनापरो जीवन्मुक्तो भवति । तस्य देवताऽऽत्मैक्यसिद्धिः । चिन्तितकार्याण्ययत्नेन सिध्यन्ति । एव शिवयोगीति कथ्यते ॥ ४ ॥ इस प्रकार तीन मुहूर्त भी भावना पर जो रहता है वह जीवन्मुक्त होता है । वह ब्रह्मं के स्वरूप हो जाता है, तथा चाहे हुए काम बिना यत्न के ही सिद्ध हो जाते हैं, और वही शिवयोगी कहलाता है ॥ ४ ॥ ॥ भावनोपनिषद् समाप्त ॥
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चतुर्वेदोपनिषत्
ॐ अथातो मनोपनिषदमेव तदाहुः । एको ह वै नारायण आसीत् । न ब्रह्मा न ईशानो नापो नाग्निः न वायुः नेमे द्यावा- पृथिवी न नक्षत्राणि व सूर्यः । स एकाकी नर एव । तस्य ध्याना- न्तस्तस्थस्य ललाटात् स्वेदोऽपतत् । ता इमा आपः । ता एते नो हिरण्मयमन्नम् । तत्र ब्रह्मा चतुर्मुखोऽजायत । स ध्यातपूर्वा- मुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिः गायत्रं छन्द ऋग्वेदः । पश्चिमामुखो भूत्वा भूरिति व्याहृतिस्त्रैष्टुभं छन्दः यजुर्वेदः । उत्तरामुखो भूत्वा भुवरिति व्याहृतिर्जगतं छन्दः सामवेदः । दक्षिणामुखो भूत्वा जनदिति व्याहृतिरानुष्टुभं छन्दोऽथर्ववेदः ॥ १ ॥
हाँ तो इसे महोपनिषत् ही कहा जाता है। सर्वप्रथम एक नारा- यण ही था। न तो ब्रह्मा ही न ईशान (शिव) ही था, और न वायु पृथ्वी, आकाश, नक्षत्र एवं सूर्य में से कोई था। वह अकेला नर ही था। ध्यान में स्थित उस नर के मस्तक से पसीना गिरा। वही यह जलराशि है। यही वह हमारे सुनहरे अन्न हैं। वही ब्रह्मा चार मुख वाला हुआ। उसने पूर्वाभिमुख होकर 'भूः' इस व्याहृति गायत्री छन्द एवं ऋग्वेद, पश्चिमा- भिमुख होकर 'भूः' इस व्याहृति त्रिष्टुप छन्द एवं यजुर्वेद, उत्तराभिमुख होकर 'भुवः' इस व्याहृति जगती छन्द तथा सामवेद, और अन्त में दक्षिणा- भिमुख होकर जनद् इस व्याहृति अनुष्टुप छन्द तथा अथर्ववेद का उच्चारण किया ॥ १ ॥
सहस्रशीर्षं देवं सहस्राक्षं विश्वसम्भवम् । विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ॥२ विश्वमेवेदं पुरुषं तं विश्वमुपजीवति । ऋषिं विश्वेश्वरं देवं समुद्रं तं विश्वरूपिणम् ॥३ पद्मकोशप्रतीकाशं लम्बत्याकोशसन्निभम् ।
Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
५५० ] [ चतुर्वेदोपनिषत् हृदये चाप्यधोमुखं सतस्यत्यैशीतकराभिश्च ॥४ तस्य मध्ये महानग्निर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखः । तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ॥५ तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः । स ब्रह्मा स ईशानः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । ६ हजारों शिर वाले हजारों आँखों वाले, विश्व की उत्पत्ति करने वाले परमदेव जो कि सर्वत्र व्यापक हैं हमेशा सर्वत्र विद्यमान एवम् नारायण, हरि आदि शब्दों से प्रसिद्ध हैं । उस ऋषि स्वरूप संसार के स्वामी समुद्र- शायी विश्वरूप परम-पुरुष का आश्रय लेकर ही यह संसार जीता है। कमलकोश के समान आकाश की तरह हृदय में अधोमुख होकर लटका है जो अपनी शक्तियों से सर्व कुछ करता है। उसके बीच में महान् अग्नि- जिनकी ज्वाला चारों ओर लपट मारती है एवम् चारों मुख वाली (लप- कने वाली) है। उसके बीच में ही वह्निशिखा है जो कि अणीय के ऊपर स्थित है। उस शिखा के मध्य में ही परमात्मा स्थित है कि स्वयं ही ब्रह्म शिव अक्षर (ब्रह्म) एवम् परम प्रभुः स्वयं प्रकाश है ॥२-६॥ य इमां महोपनिषदं ब्राह्मणोऽधीते अश्रोत्रियः श्रोत्रियो भवति । अनुपनीतः उपनीतो भवति । सोऽग्निपूतो भवति । स वायुपूतो भवति । स सूर्यपूतो भवति । स सोमपूतो भवति । स सत्यपूतो भवति । सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवति । सर्वैषु तीर्थेषु स्नातो भवति । तेन सर्वैः ऋतुभिरिष्टं भवति । गायत्र्याः षष्टि सहस्राणि जप्तानि भवन्ति । इतिहासपुराणानां सहस्राणि जप्ताति भवन्ति । प्रणवानामयुतं जप्तं भवति । आचक्षुषः पङ्क्तिं पुनाति आसप्तमात् पुरुषं पुनाति । जाप्येन अमृतत्त्वं च गच्छति अमृतत्त्वं च गच्छति इत्याह भगवान् हिरण्यगर्भः ॥ ७ ॥ जो ब्राह्मण इस महोपनिषद् को पढ़ता है वह यदि अश्रोत्रीय हो तो श्रोत्रीय (कर्मकाण्डी हो जाता है। अनुपनीत हो तो उपनीत (यज्ञोप- वीती) होता जाता है। वह अग्नि-पवित्र, वायु-पवित्र, सूर्य-पवित्र, सोम-
पवित्र, सत्य से पवित्र माना जाता है, हो जाता है। उसे सभी देव जानते हैं। उसने सभी तीर्थों का स्नान कर लिया, तथा सभी यज्ञ भी कर चुका । उसने तो गायत्री के साठ हजार जप कर लिए । इतिहास तथा पुराणों के हजारों जप वह कर चुका । दस हजार ॐकार का जप वह कर चुका । वह पुरुष अपनी दृष्टमात्र से मनुष्यों की पंक्तियों को (हजारों मनुष्यों को) पवित्र कर देता है। सातवीं पीढ़ी तक के मनुष्यों को पवित्र कर देता है एवम् जो इसे पढ़ता है वह अमृतत्व को निश्चित ही प्राप्त कर लेता है, ऐसा भगवान् हिरण्यगर्भ ने कहा है ॥७॥ देवा ह वै स्वर्गं लोकमायंस्ते देवा रुद्रमपृच्छंस्ते देवा ऊर्ध्वबाहवो रुद्रं स्तुवन्ति । भूस्तवादिर्मध्यं भुवस्ते स्वस्ते शीर्षं विश्वरूपोऽसि ब्रह्मैकस्त्वं द्विधा त्रिधा शान्तिस्त्वं हुतमहुतं दत्त- मदत्तं सर्वमसर्वं विश्वमविश्वं कृतमकृतं परमपरं परायणं च त्वम् । अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवा नमस्याम धूर्तेरमृतं मृत मर्त्यं च सोमसूर्यपूर्वजगदधीतं वा यदक्षरं प्राजापत्यं सौम्यं सूक्ष्मं ग्राहं ग्राहेण भावं भावेन- सौम्यं सौम्येन सूक्ष्मं सूक्ष्मेण ग्रसति तस्मै महाग्रासाय नमः ॥ ८ ॥ देवता स्वर्ग लोक में आये तथा हाथ उठाकर रुद्र की स्तुति करते हुए उनसे पूछा (कहा) तेरा आदि भूः, मध्य भुवः, शिर स्वः है, तू विश्व- रूप है, तू ही एक ब्रह्म है। द्विविध, त्रिविध शक्तिहुत (होम किया गया) अहुत, दिया, न दिया, सर्वं (सब कुछ) असर्व, विश्व (संसार) अविश्व, किया न किया, पर, अपर परायण सब तू ही है। हम सोम पान अमृत होवें, हमें ज्ञान प्राप्त हो, हम देव आपको नमस्कार करते हैं, अमृत, मृत, मर्त्य, सोम, सूर्य, पूर्व संसार, अधीत या जो अक्षर (अविनाशी) प्राजा- पत्य, सौम्य सूक्ष्म है उसे ग्राह को ग्राह से, भाव को भाव से, सौम्य को सौम्य से, सूक्ष्म को सूक्ष्म से ग्रसित करते हैं। उस महाग्रास को (ग्रसित करने वाले को) नमस्कार है ॥ ४ ॥ ॥ चतुर्वेदोपनिषद् समाप्त ॥